परीक्षाओं में पारदर्शी व्यवस्थाओं से बढ़ा भरोसा

युवाओं में विश्वास लौटा 

परीक्षाओं में पारदर्शी व्यवस्थाओं से बढ़ा भरोसा

राजस्थान में सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर वर्षों से जो असंतोष, अविश्वास और आशंका का माहौल बना हुआ था, वह अब तेजी से बदल रहा है।

राजस्थान में सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर वर्षों से जो असंतोष, अविश्वास और आशंका का माहौल बना हुआ था, वह अब तेजी से बदल रहा है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भर्ती से जुड़ी ताजा पहल और आरएएस जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में अपनाई गई पारदर्शी व्यवस्थाएं इस बदलाव का ठोस प्रमाण हैं। हाल ही में राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा 1,41 लाख चयनित अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट सार्वजनिक करना उस मानसिकता का संकेत है, जिसमें सरकार और चयन संस्थाएं अब परीक्षार्थियों को भरोसा देना चाहती हैं। ग्रेड.4 भर्ती प्रक्रिया के तहत डाक्यूमेंट्स वेरिफिकेशन के लिए चयनित अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड की गई हैं। अभ्यर्थी अपने मोबाइल नंबर और ओटीपी के जरिए न केवल अपनी बल्कि अन्य चयनित उम्मीदवारों की ओएमआर शीट भी देख सकते हैं।

पारदर्शिता के नए मानक :

सामान्यतः भर्ती परीक्षाओं में उम्मीदवार अपने ही प्रदर्शन की सीमित जानकारी तक सिमटे रहते हैं, लेकिन यहां चयन बोर्ड ने तुलना और आत्ममूल्यांकन का अवसर भी दिया है। स्क्रूटनी प्रक्रिया और 15 दिन की समय सीमा यह दर्शाती है कि बोर्ड प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना चाहता है। ओएमआर शीट को एक महीने तक उपलब्ध रखना, हस्ताक्षरों को मास्क करना और हर बार लॉगिन अनिवार्य करना जैसे कदम पारदर्शिता और सुरक्षा के संतुलन को साधते हैं।इसी क्रम में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित आरएएस भर्ती ने भी शुद्धता और पारदर्शिता के नए मानक स्थापित किए हैं। रिकॉर्ड समय में परिणाम जारी करना और पहली बार यूपीएससी की तर्ज पर सभी अभ्यर्थियों के नाम व अंक सार्वजनिक करना उस भरोसे को लौटाने की कोशिश है, जो वर्षों से डगमगा गया था।

सरकार का दावा :

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इस बदलाव के पीछे स्पष्ट राजनीतिक संकल्प और प्रशासनिक दृढ़ता है। सरकार का दावा कि हमारी परीक्षा व्यवस्था पारदर्शी, निष्पक्ष और पूरी तरह लीक फ्री होगी, अब दावे से आगे बढ़कर व्यवहार में दिखने लगा है। पिछले एक दशक में पेपर लीक ने देशभर में सरकारी भर्तियों की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई। कश्मीर से केरल और गुजरात से पश्चिम बंगाल तक शायद ही कोई राज्य इससे अछूता रहा हो। राजस्थान में तो स्थिति और भी गंभीर रही। राज्य लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन बोर्ड और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड सबकी साख पर सवाल उठे। मेहनती युवाओं के बीच यह धारणा बनने लगी कि सफलता मेहनत से नहीं, बल्कि पैसों और सिफारिश से तय होती है। शिक्षा माफिया ने परीक्षाओं को संगठित बाजार में बदल दिया। लाखों रुपए लेकर प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने के नेटवर्क बने।

निपटने का संकल्प :

डिजिटल तकनीक, साइबर अपराध और अंतरराज्यीय गिरोहों ने परीक्षा तंत्र की हर कमजोरी का फायदा उठाया। नतीजा यह हुआ कि वर्षों की तैयारी करने वाले युवा हताशा और अवसाद के शिकार होने लगे। इसी पृष्ठभूमि में पिछले दो वर्षों में राजस्थान में जो परिवर्तन हुआ है, वह उल्लेखनीय है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में सरकार ने पेपर लीक को महज कानूनी अपराध नहीं, बल्कि भर्ती व्यवस्था की जड़ में बैठी बीमारी मानकर उससे निपटने का संकल्प लिया। सबसे पहले व्यापक मॉनिटरिंग ढांचा तैयार किया गया। मुख्य सचिव से लेकर जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक तक, सभी को परीक्षा सुरक्षा की स्पष्ट जिम्मेदारी सौंपी गई। यह पहली बार हुआ कि भर्ती परीक्षाओं की सुरक्षा केवल आयोगों तक सीमित न रहकर पूरे प्रशासन और पुलिस की प्राथमिकता बनी। इससे जवाबदेही बढ़ी और लापरवाही की गुंजाइश कम हुई।

गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई :

पेपर लीक गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई में राजस्थान पुलिस की भूमिका निर्णायक रही। एसओजी और एटीएस ने संगठित नेटवर्क पर प्रहार करते हुए छोटे दलालों से लेकर बड़े मास्टरमाइंड तक को गिरफ्तार किया। साइबर अपराधियों, कोड चुराने वालों और प्रश्नपत्रों की खरीद बिक्री में शामिल लोगों को बेनकाब किया गया। कई मामलों में परीक्षा घोषित होने से पहले ही गिरोहों को धर दबोचा गया। यह रोकथाम आधारित पुलिसिंग अब राजस्थान मॉडल के रूप में राष्ट्रीय चर्चा का विषय है। सुधारों का दूसरा अहम चरण पूरी भर्ती प्रक्रिया का पुनर्गठन रहा। प्रश्नपत्र निर्माण, प्रिंटिंग प्रेस, परिवहन, सीलिंग और परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा, हर चरण का गहन ऑडिट किया गया। सीसीटीवी निगरानी, संवेदनशील केंद्रों का वर्गीकरण, डबल लॉक व्यवस्था और एआई आधारित निगरानी ने सुरक्षा को लगभग अभेद्य बना दिया। इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह है कि पिछले दो वर्षों में राज्य में एक भी बड़ा पेपर लीक सामने नहीं आया।

युवाओं में विश्वास लौटा :

फर्जी दस्तावेजों पर भी सख्ती दिखाई गई। फर्जी विश्वविद्यालय बंद किए गए, फर्जी डिग्री और दिव्यांग प्रमाण पत्र गिरोह पकड़े गए। प्रमाण पत्र जारी करने वाले अधिकारियों और चिकित्सकों पर कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब सिस्टम की मिलीभगत स्वीकार्य नहीं होगी। जाति प्रमाण पत्र, विधवा या तलाकशुदा होने जैसे संवेदनशील सामाजिक दस्तावेजों की जांच भी अब पूरी कठोरता से की जा रही है। संयुक्त टीमों द्वारा फर्जी दावों का खुलासा होने से वास्तविक पात्रों को न्याय मिला। हस्तलिपि मिलान, लाइव फोटो और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी तकनीकों ने सॉल्वर गैंग की संभावनाओं को लगभग समाप्त कर दिया है। युवाओं में यह विश्वास लौटा है कि सफलता का रास्ता अब मेहनत से होकर जाता है, सौदेबाजी से नहीं। राजस्थान का अनुभव बताता है कि पेपर लीक जैसी जटिल समस्या का समाधान संभव है। बशर्ते नेतृत्व दृढ़ हो, प्रशासन सजग हो और पुलिस सक्रिय।

-के. के. विश्नोई
उद्योग राज्य मंत्री, राजस्थान
(यह लेखक के अपने विचार हैं) 

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