हास्य की शक्ति को कम करके नहीं आंके

परंपरा से कुछ सीखें 

हास्य की शक्ति को कम करके नहीं आंके

हंसी एक मानवीय गरिमा है और उसे उत्सव में बदलने की कला हर सभ्यता ने अपने-अपने ढंग से विकसित की है।

हंसी एक मानवीय गरिमा है और उसे उत्सव में बदलने की कला हर सभ्यता ने अपने-अपने ढंग से विकसित की है। एक अप्रैल उसी कला की एक अभिव्यक्ति है, भले ही उसकी जड़ें हमारी मिट्टी में नहीं हैं। इस दिन को लेकर दो प्रकार के लोग मिलते हैं, एक वे जो इसे निरर्थक विदेशी परंपरा कहकर खारिज कर देते हैं और दूसरे वे जो बिना सोचे विचारे इसमें डूब जाते हैं। दोनों के बीच एक तीसरा रास्ता भी है और वह रास्ता विवेक का है। यह दिन न तो सिरे से अस्वीकार करने योग्य है और न ही आंखें मूंदकर मनाने योग्य। इसे समझने की जरूरत है और समझकर मनाने में ही इसकी सार्थकता है। यह परंपरा सोलहवीं शताब्दी के यूरोप से आई है। फ्रांस में जब 1564 में नववर्ष की तिथि बदली तो जो लोग पुरानी परंपरा पर टिके रहे उनका मखौल उड़ाया गया और धीरे धीरे यह मखौल एक सामूहिक उत्सव में बदल गया। यह परंपरा औपनिवेशिक काल में भारत पहुंची और यहां की मिट्टी में इस तरह घुल मिल गई कि आज इसे विदेशी कहना कई लोगों को अटपटा लगता है। किंतु यह स्वीकृति अपने आप में एक सांस्कृतिक प्रश्न उठाती है कि क्या हम हर उस चीज को अपना लेते हैं जो बाहर से आती है और क्या हम अपनी परंपराओं के प्रति उतने ही उदार और उत्साही हैं।

हास्य की शक्ति :

हास्य की शक्ति को कम करके नहीं आंकना चाहिए। मनोविज्ञान यह प्रमाणित करता है कि हंसी मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लिए उतनी ही आवश्यक है जितना शरीर के लिए जल। जो समाज हंस नहीं सकता वह जीवित तो रह सकता है किंतु जीवंत नहीं रह सकता। इस दृष्टि से एक अप्रैल का वह पक्ष निश्चित रूप से स्वीकार्य और आनंददायक है जो लोगों को एक साथ हंसाता है, जो रिश्तों में हल्कापन लाता है और जो जीवन की गंभीरता के बोझ को एक दिन के लिए हल्का कर देता है। किंतु हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और एक अप्रैल का दूसरा पहलू उतना निर्दोष नहीं है जितना दिखता है। हास्य जब किसी की गरिमा की कीमत पर आता है तो वह हास्य नहीं रहता। हम यह देखते हैं कि इस दिन का निशाना प्रायः वही बनता है जो कमजोर है, जो नया है, जो सहज विश्वास करने वाला है। दफ्तर में नया आया कर्मचारी, घर का सबसे भोला सदस्य, मोहल्ले का वह व्यक्ति जिसकी सरलता को लोग उसकी कमजोरी समझते हैं। इस पैटर्न में एक सूक्ष्म क्रूरता छिपी है जिसे हम हंसी के शोर में नहीं सुन पाते। भारतीय दर्शन में अतिथि देवो भव का जो भाव है, दूसरे की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानने का जो संस्कार है, वह इस प्रकार के हास्य से मेल नहीं खाता। इसलिए हंसी और संवेदनशीलता के बीच का संतुलन बनाए रखना इस दिन की सबसे बड़ी मांग है।

परंपरा से कुछ सीखें :

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डिजिटल युग ने एक अप्रैल को एक नया और जटिल आयाम दे दिया है। आज इस दिन सोशल मीडिया पर जो होता है वह केवल व्यक्तिगत मजाक तक सीमित नहीं रहता। बड़ी कंपनियां इस दिन को एक विपणन अवसर के रूप में देखती हैं और करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाकर उपभोक्ताओं को अपने प्रचार का माध्यम बना लेती हैं। उपभोक्ता यह जानते हुए भी कि वह एक व्यावसायिक खेल का हिस्सा बन रहा है, प्रसन्नतापूर्वक उसमें भाग लेता है। यह आधुनिक उपभोक्तावाद की वह चतुराई है जो मनुष्य की हंसी को भी बाजार की वस्तु बना देती है। इससे भी बड़ी चिंता यह है कि इस दिन जानबूझकर फैलाई गई झूठी सूचनाएं उन लोगों तक भी पहुंचती हैं जो खेल के नियम से परिचित नहीं हैं और जो उन्हें सच मानकर आहत हो जाते हैं। भारत जैसे विशाल और विविध देश में जहां डिजिटल जागरूकता अभी भी असमान है, यह समस्या और गहरी हो जाती है। भारत की अपनी हास्य परंपरा पर एक बार फिर लौटना आवश्यक है, न इसलिए कि हम अतीत में जीएं बल्कि इसलिए कि उस परंपरा से कुछ सीखा जा सके।

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वह हंसी अमूल्य है :

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कबीर के दोहों में जो व्यंग्य था वह समाज की रूढ़ियों पर था, व्यक्ति की कमजोरी पर नहीं। तेनालीराम और बीरबल की बुद्धि राजा की मूर्खता को उजागर करती थी और इस प्रक्रिया में सत्ता से सत्य कहने का साहस था। लोककथाओं का विदूषक वह कहता था जो कोई सभासद नहीं कह सकता था और उसकी हंसी में एक नैतिक संदेश होता था। उस परंपरा में हास्य एक ऐसा अस्त्र था जो समाज को जगाता था, सुलाता नहीं था। यदि हम एक अप्रैल को भी उस भावना से जोड़ सकें तो यह दिन केवल छल का उत्सव नहीं रहेगा, बल्कि एक ऐसे सामूहिक आत्मावलोकन का अवसर बनेगा जिसमें हम खुद पर हंसना सीखें, व्यवस्था की विसंगतियों पर हंसें और उस हंसी से एक बेहतर समाज बनाने की प्रेरणा लें। जो हंसी सबको साथ लेकर चलती है, जो संबंधों को गहरा करती है और जो जीवन की कठिनाइयों के सामने मनुष्य को टिके रहने की शक्ति देती है, वह हंसी अमूल्य है और उसका उत्सव मनाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

-देवेन्द्रराज सुथार
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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