राज काज में क्या है खास, जानें 

तलाश अदब टीम की 

राज काज में क्या है खास, जानें 

पिछले दिनों भगवा वाली पार्टी के एक बड़े नेता ने कार्यकर्ताओं के मन को क्या टटोला, कइयों की नींद हराम कर दी।

निराशा के निशान :

पिछले दिनों भगवा वाली पार्टी के एक बड़े नेता ने कार्यकर्ताओं के मन को क्या टटोला, कइयों की नींद हराम कर दी। तीस-बत्तीस साल से एड़ियां रगड़ने वाले भाइयों ने रो-रोकर अपनी दुर्दशा का बखान किया। अगल-बगल में बैठे सत्ता और संगठन के कर्ताधर्ता समझ नहीं पाए कि कहानी को कैसे यू टर्न दिया जाए। उन्होंने कोशिश भी कि लेकिन नेताजी उनके मन की बात को भांप चुके थे। भारी कसमसाहट के बाद आखिर भगवा के एक स्थानीय युवा नेता से नहीं रहा गया। आखिरकार वे फट ही पड़े। इसके लिए उन्हें रोना भी पड़ा। नेताजी के दिल्ली जाने के बाद खुसर- फुसर भी खूब हुई। कहने वालों ने इसे निराशा के निशान तक करार दे दिया। बोले यह युवाओं की आवाज नहीं बल्कि बोर्ड और निगमों में पद लेने से वंचित रहे एक प्रत्याशी का खेल है। दुखड़ा सुनाने वाले भैया उनके कट्टर समर्थकों में से एक हैं।

संकट हाथ वालों का :

मरु प्रदेश में इन दिनों सबसे ज्यादा संकट में हाथ वाले भाई लोग हैं। वे अटारी वाले भजनजी भाई साहब के तुरुप के पत्ते को न तो निगल पा रहे हैं और नहीं उगल पा रहे। किसी के सामने खुल कर जुबान भी नहीं खोल पा रहे। और तो और खुद की जाजम पर भी एक साथ बैठने से पहले अगल-बगल वालों को घूर कर देख रहे हैं। अब देखो न सवा दो साल बाद भी सदर का जहाज हवा में हिचकोले लेते नजर आ रहा है। सदर भी कुछ ज्यादा ही युवा नजर आने की कोशिश में जुटे हैं, जिनका मन पिंकसिटी में ही रमता है। अब हाथ वाले भाई लोगों को कौन समझाए कि शहरों के साथ गांवों की सरकार के चुनावों में ज्यादा सफलता दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। यदि ऐसा हुआ, तो पार्टी एक बार फिर अपनी हार के मुहाने पर खड़ी दिख रही है।

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चर्चाओं में बाबा :

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सूबे में कोई न कोई हमेशा चर्चा रहता है, चाहे वह पॉलिटिशियन हो या फिर आॅफीसर। लेकिन अब बाबाओं ने सबको पीछे छोड़ दिया। यह हालत तो तब है, जब इन दिनों चर्चित बाबाओं का सूबे से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में खुसरफुचर करते हैं कि मराठा के बाद अब मरु प्रदेष में भी कई बाबाओं पर नजरें हैं, चूंकि गुजरे जमाने में अवधूत के गिरि और जय के रामदास ने अपनी टीआरपी बढाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उनकी मानें तो सूबे में भी कोई न कोई बाबा फेमस होने की लाइन में है। इन चचाके बाद खादी वाले कई नेताओं की भी नींद उड़ी हुई है।

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तलाश अदब टीम की :

सूबे में राज को एक ऐसी टीम की तलाश है, जो अदब के साथ काज करने में माहिर हो। चर्चा है कि इसके लिए पुराने घोड़ों की तलाश कर उनका मन भी टटोला जा रहा है। कुछेक ने ना में गर्दन हिलाई तो दो-चार ने वक्त की नजाकत को भांप दो हफ्ते का वक्त मांग लिया। इस काम में जुटी टीम के लीडर की सोच भी बड़ी अदब की है। उनकी राय है कि नालायक बट काबिल हो तो चलेगा, केवल ईमानदारी के तमगे से सुस्ती से कतई पार पड़ने वाली नहीं है। उनके तर्क से हम भी सौ फीसदी सहमत है।

एक जुमला यह भी :

सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि एक जुटता के मंत्र को लेकर है। राज के मुखिया मंत्र को सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, मगर उसका कोई असर नहीं दिख रहा। कई गुटों में बंटी सूबे की भाजपा के नेता अपनी-अपनी ढपली और अपना अपना राग अलाप रहे हैं। इनमें से दोनों गुटों के झण्डे सिविल लाईन्स में लहराते हैं। झण्डों के फेर में फंसे कमल वाले भाई लोगों को चिंता सता रही है कि मकर सक्रांति को दूसरों की पतंग की डोर काटने के चक्कर में एक जुटता का मंत्र कहीं दूर की कौड़ी साबित न हो जाए।

-एल. एल. शर्मा 
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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