विकास का सहभागी है मजदूर

कानूनों की प्रभावी पालना

विकास का सहभागी है मजदूर

आज मजदूर दिवस है। विश्व भर में इसे बड़े जोश-खरोश के साथ मनाया जाता है। हमारे देश में भी इस अवसर पर अनेक कार्यक्रमों के आयोजन होते हैं।

आज मजदूर दिवस है। विश्व भर में इसे बड़े जोश-खरोश के साथ मनाया जाता है। हमारे देश में भी इस अवसर पर अनेक कार्यक्रमों के आयोजन होते हैं। आखिर श्रमिकों के श्रम के बल पर समाज और देश की अर्थव्यवस्था जो टिकी हुई है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों से अपेक्षा रहती है कि वे श्रमिकों के वेतन, सामाजिक सुरक्षाओं से जुड़े अधिकारों और कामकाज के लिए बेहतर परिस्थितियां उपलब्ध कराने के निरंतर प्रयास करते रहें।

असंगठित मजदूर :

वर्ष 2025 में केंद्र सरकार की ओर से कराए गए एक श्रम सर्वेक्षण के अनुसार देश में नियमित वेतन, भविष्य निधि और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा सेवा पाने वाला कार्यबल करीब तेईस फीसदी था। अस्सी से नब्बे फीसदी कामगार ऐसे हैं, जो अभी भी असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। जो अधिकांश ठेकेदारों के अधीन काम करते हैं। रोजगार से जुड़ी तमाम जरूरी सहूलियतों से वे वंचित हैं। जीवन अलग जोखिमों से भरा रहता है।

स्वप्न बनी सुविधाएं :

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उनके वेतन में वृद्धि मुश्किल से चार फीसदी होती है। बड़ी संख्या में मजदूरों के पास लिखित अनुबंध, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और सुरक्षित कार्यस्थल नहीं हैं। रोजगार की गुणवत्ता और उसकी स्थिरता अभी भी चिंताजनक है। इन तमाम मुश्किलों के बावजूद पहले की तुलना में देश के मजदूरों की दशा में कुछ सुधार भी आया है, लेकिन जीवन स्तर में अपेक्षाकृत बदलाव नहीं पाया है।

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चार नई श्रम संहिताएं :

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मौजूदा केंद्र सरकार ने श्रमिकों के रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, डिजिटल पंजीकरण और श्रम कानूनों में समय-समय पर कई सुधार किए हैं। करीब उनतीस पुराने कानून को मिलाकर चार श्रम संहिताएं लागू की हैं। इनमें वेतन, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध और कार्यस्थलों की सुरक्षा शामिल हैं। इनका उद्देय नियमों को सरल बनाकर अधिक से अधिक श्रमिकों को सुरक्षा के दायरे में लाना है। हालांकि इस पर श्रमिक संगठनों ने कुछ आशंकाएं जताई हैं।

-श्रम ऐप :

इस ओर ध्यान दिलाने के मकसद से गिग वर्कर्स की ओर से देश व्यापी आंदोलन भी छेड़ा गया था। इस पर केंद्र सरकार ने डिजिटल प्लेटफार्म जैसे -श्रम ऐप के जरिए असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया है, ताकि उन्हें श्रम कल्याण से जुड़ी योजनाओं, बीमा, कौशल विकास और रोजगार अवसरों से जोड़ने में मदद मिले। इस कदम को असंगठित मजदूरों को पहचान देने की दिशा में एक बड़ा और सराहनीय कदम माना जा सकता है।

श्रम कल्याण योजनाएं :

केंद्र सरकार ने नए रोजगार सृजन की दृष्टि से 'प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना', ईपीएफ पंजीकृत कर्मचारियों और नियोक्ताओं के लिए प्रोत्साहन देने, सामाजिक सुरक्षा परियोजनाओं को मजबूत करने के लिए एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड आर्गेनाइजेषन के जरिए दावों में तेजी लाने, पीएम श्रम योगी मान-धन योजना के जरिए असंगठित श्रमिकों को पेंशन सुरक्षा देने, प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना, विकसित भारत ग्रामीण रोजगार योजना, रेहड़ी-पटरी वालों के लिए पीएम स्वनिधि योजनाएं शुरू की हैं।

जमीन पर उतारना होगा :

ऐसे में इन योजनाओं का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर उतारने के लिए प्रवर्तन तंत्र की निगरानी बढ़ाने उसे मजबूती देने, वेतन नीति का सावधानीपूर्वक समायोजन करने, लघु और मध्यम उद्योगों को सरकारी सहयोग और प्रोत्साहन देने, सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार और सुदृढ़ीकरण करने, नीति निर्माताओं को सीमा आधारित विसंगतियों को दूर करने, श्रम सुधारों को कौशल विकास, मानव पूंजी निवेश द्वारा पूरक बनाने, विभिन्न क्षेत्रों में नीतिगत एवं प्रशासनिक समन्वय और संस्थागत एकीकरण में सुधार करने की जरूरत है।

नोएड़ा आंदोलन ने झकझोरा :

सरकार ने भले ही मजदूरों के कल्याण के लिए कई अहम योजनाएं एवं घोषणाएं की हों, लेकिन पिछले दिनों उत्तर प्रदेष के नोएडा शहर में अचानक हुए उग्र मजदूर आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। यह आंदोलन केवल वेतन वृद्धि की मांग तक सीमित नहीं था, बल्कि यह मौजूदा औद्योगिक श्रम ढांचे में जमा असंतोष का विस्फोट था।

कड़ी मेहनत के बावजूद मुफ लसी :

हालांकि, आंदोलन की शुरुआत शांतिपूर्ण ढंग से हुई, लेकिन बाद में यह उग्र टकराव में बदल गया। जिसमें हुए पथराव से वाहनों को नुकसान पहुंचा और गिरफ्तारियां भी हुईं। इस आंदोलन के पीछे कम वेतन, बढ़ती महंगाई, लंबी कार्य अवधि, साप्ताहिक अवकाश नहीं देने, ओवरटाइम कार्य का भुगतान नहीं करने, असुरक्षित नौकरी से जुड़े कारक रहे। मौजूदा हालात में मजदूरों को जितना वेतन मिल रहा था मजदूर 18 से 20 हजार मासिक वेतन की मांग कर रहे थे। आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इसमें बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक शामिल थे। ये वे लोग हैं, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और अन्य राज्यों से रोजगार के लिए नोएडा आए हैं।

वेतन में 20 फीसदी वृद्धि :

बढ़ती महंगाई, मकान किराया, परिवहन और रसोई गैस की बढ़ी लागत ने श्रमिकों के जीवन पर सीधा असर डाला है। इससे उपजे तनाव के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के निर्देष पर गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद के लिए वेतन मजदूरी में लगभग 20-21 ीसदी वृद्धि की घोषणा की। अकुशल, अर्धकुशल और कुशल श्रमिकों के लिए नई दरें लागू की गईं।

कानूनों की प्रभावी पालना :

यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या केवल वेतनवृद्धि से समस्या हल हो पाएगी? वास्तविक मुद्दा श्रमिक गरिमा, सामाजिक सुरक्षा, स्थाई रोजगार और श्रम कानूनों के प्रभावी पालन का है। यदि कंपनियां अनुबंध आधारित रोजगार, कम वेतन और सीमित सुविधाओं के मॉडल पर चलती रहेंगी तो असंतोष बार-बार उभरेगा। ऐसे में औद्योगिक विकास मॉडल में श्रमिक हितों को केंद्र में रखना होगा। आर्थिक प्रगति तभी स्थाई होगी जब श्रमिकों को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि विकास का सहभागी माना जाए।

- महेश चंद्र शर्मा

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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