राज काज में क्या है खास, जानें
नजरें कुर्सी पर
सूबे में इन दिनों कुछ बड़े साहब लोगों पर भी छपास रोग चढ़ा हुआ है।
साहबों को लगा छपास रोग :
सूबे में इन दिनों कुछ बड़े साहब लोगों पर भी छपास रोग चढ़ा हुआ है। ऐसा लगता है कि प्रशासन अब फाइलों से नहीं, कैमरे के एंगल से चल रहा है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि गुजरे जमाने में बड़े अफसर दौरे पर जाते थे, तो जनता की समस्या सुनते थे, और अब पहले ड्रोन उड़ता है, फिर रील बनती है और अंत में कहीं जाकर समस्या पर चर्चा होती है। कई साहब तो ऐसे भाव में वीडियो बनवाते हैं, मानो वे जिले के कलेक्टर नहीं, किसी ओटीटी सीरीज के हीरो हों। सड़क निरीक्षण भी स्लो मोशन में, मीटिंग भी बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ और गरीब को कंबल देते समय कैमरे की तरफ इमोशनल लुक अलग से। उधर अखबारों में रोज फोटो छप रही है कि साहब ने पौधा लगाया और साहब ने चाय पी तथा साहब ने जनता को देखा। बेचारी जनता भी अब समझदार हो गई है। वह जानती है कि विकास और वायरल में फर्क होता है। आखिर शासन इंस्टाग्राम की स्टोरी नहीं, जमीन पर दिखने वाला काम होता है।
गई भैंस पानी में :
सूबे में इन दिनों राज के कुछ रत्नों का चौघड़िया ठीक नहीं है। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। वे न तो ठीक से खा रहे हैं और नहीं पी रहे हैं। उनके चेहरों पर चिंता की लकीरें भी साफ दिखाई देने लगी हंै। बेचारों की सुनने वाला भी कोई नहीं है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकानेदार और रायपुर मारवाड़ वाले भाई साहब से कुछ उम्मीदें थी, परन्तु उनके पास भी मुस्कराने के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा। पिछले दिनों राज के रत्नों ने अपनी पीडा बताने के लिए एक जाजम पर खुसरफुसर भी की, लेकिन राज के तेवरों के सामने उनकी पार नहीं पड़ी। उन बेचारों को पता थोड़े ही था कि वे जिस साहब पर निशाना साध रहे हैं, वो राज की आंखों का तारा है। अब बेचारों की रही-सही आस भी पूरी हो गई, तो दुबला होना लाजमी है। अब डिनर के बहाने आपस में बतियाते रहते हैं कि जब उपर वालों के यहां ही सुनवाई नहीं है, तो गई भैंस पानी में।
नजरें कुर्सी पर :
राज का काज करने वाले कुछ बडे साहबों के लिए इस बार जेठ का महीना निकलना दूभर हो रहा है। सूर्य देव का उग्र रुप तो उनके पसीने छुड़ा ही रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा पसीने जोड़-बाकी और गुणा-भाग करने में आ रहा है। यह गणित सूबे की पब्लिक के वेलफेयर के लिए नहीं बल्कि चार महीने बाद खाली होने वाली सबसे साहब की खाली होने वाली कुर्सी के लिए लगाई जा रही है। सचिवालय में एसी की हवा में हर कोई अपने मन लायक साहब के लिए सवामणी बोल रहा है। और तो और लाइन में लगे साहबों की हर कोणों से समीक्षा करने में भी कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। कई स्याणे तो मैन बिल्डिंग में दूसरे माले पर बैठने वाले साहब अभी से रिझाने में व्यस्त है। एक साहब ने तो पूरा हिसाब लगा कर दिल्ली में बैठे साहब को फोन लगा कर बधाई तक दे दी।
एक जुमला यह भी :
पिंकसिटी में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि थोथे थानेदारों को लेकर हैं। डेढ साल पहले छापाखानों में दो दिन तक चर्चा में आए थोथे थानेदारों को भोली भाली पब्लिक भुला चुकी थी, लेकिन गवर्मेंट हॉस्टल के आसपास बने राजस्थानी गेटों को देखकर उनकी याद ताजा हुए बिना नहीं रहती। जुमला है कि इन गेटों और थोथे थानेदारों की घटना के बीच गहरा ताल्लुकात है।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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