राज काज में क्या है खास, जानें
इंतजार लिस्ट का
गणित चालू आहे :
सूबे में जब से भगवा वाले भाई लोगों में दो-दो हाथ हुए हैं, तब से हाथ वाले भाई लोग भी दिन-रात गणित में उलझे हुए हैं। हाथ वालों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। वे न तो चैन से सो पा रहे हैं और नहीं बैठ पा रहे हैं। उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें दिखाई देने लगी हैं। दिल्ली वाली मैम और राजकुमार भी एकदम चुप्पी साधे हुए हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में चर्चा है कि उनके नेताओं के गणित से समझ में आ गया है कि सूबे की सरकार को गिराने से उनको सिर्फ नुकसान के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं लगेगा, बल्कि पार्टी में दो फाड़ जरूर होगी। एक साल पहले जल्दबाजी में छेड़ी जंग को थामने में ही अपनी भलाई है।
नस-नस में भावुकता :
सूबे के एक भाई साहब इन दिनों काफी चर्चा में हैं। ऐसा कोई चौराहा और चौपड़ नहीं है, जहां भाई साहब की चर्चा नहीं होती। साढे चार दशक से ज्यादा राजनीति कर चुके भाई साहब भी कोई छोटे-मोटे नहीं बल्कि अगुणी के जिले दौसा से ताल्लुकात रखते हैं और पॉर्लियामेंट से लेकर सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के पंच बन चुके हैं। पचास के दशक में जन्मे भाई साहब काफी भावुक है। जब वे भावुक होते हैं, तो न वे स्थान देखते हैं और नहीं समय। इस बार जून के महीने में कुछ ज्यादा ही भावुक हो गए और एमएलएशिप से मोह भंग करने तक का ऐलान कर दिया। अब भाई साहब काफी परेशान हैं, चूंकि इसी सप्ताह उनको आलाकमान के सामने हाजिर होकर सच बोलना है। इस आफत से बचने के लिए भाई साहब पचवारा में देवरे ढोक रहे हैं। वर्कर्स ने उनको समझा दिया है कि अगर अब भावुकता में फिर से इस्तीफा दे दिया और वह मंजूर हो गया, तो वे न घर के रहेंगे और नहीं घाट के। चूंकि बिना सिम्बल के दुबारा चुनाव जीतना उनके वश की बात नहीं है, सो आलाकमान के सामने जाने से कन्नी काटने में ही भलाई है।
बदला-बदला राज :
पिछले कुछ दिनों से राज कुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा है। उसका काज करने वालों की चाल-ढाल और हाव-भाव भी बदल गए हैं। जो ढाई साल से शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते थे, वो भी देखते ही गले मिलते दिख रहे हैं। सचिवालय में खिंची लक्ष्मण रेखा भी लांघी जा रही है। माजरा कुछ समझ में नहीं आया, तो हमने भी इधर-उधर सूंघासांघी की। राज के एक रत्न ने राज खोला तो हम भी हंसे बिना नहीं रह सके। पिछले दिनों राज को मिली गुप्तचरों की रिपोर्ट में कई पन्नों में लाल स्याही के निशान हैं। कुछ मुंहफट गुप्तचरों ने तो खरी-खरी भी सुनाई कि दाया हुआ सांड ज्यादा ढकारें लेता है। सूबे में 115 सीटें आने से कुछ भाई लोगों को अपच होने लगी है। सो वो भी 2013 वाले राज से एक कदम आगे ही चल रहे हैं। यूं ही चलता रहा तो सब कुछ आपके सामने है। तभी से राज भी बदला-बदला सा नजर आने लगा है।
इंतजार लिस्ट का :
सूबे की राजनीति में कैबिनेट रिसफलिंग को लेकर एक बार फिर शगूफा उठा है। शगूफा भी पिंकसिटी से लेकर लालकिले वाली नगरी तक दौड़ रहा है। रिसफलिंग को लेकर हर कोई अपने हिसाब से मायने निकाल रहा है। निकाले भी क्यों नहीं, राजधर्म आड़े जो आ रहा है। दिल्ली तक की भाग दौड़ में एक बात का खुलासा हुआ है कि आलाकमान को एक सूची का इंतजार है। सूची के लिए सूबे के नेताओं से भी पूछताछ हुई, पर उनके पास भी नहीं पहुंची। राज का काज करने वालों में खुसर-फुसर है कि आलाकमान को दस महीने से उस सूची का इंतजार है, जिसमें अंसतुष्ट खेमे की ओर से मंत्री बनाया जाना है। कन्फ्यूजन के चलते सूची फाइनल नहीं हो पा रही, चूंकि रोजाना नाम जोड़ने और हटाने से ही फुर्सत जो नहीं है। हम बताय देते है कि दिल्ली वाले तो पहले रिसफलिंग में राज के रत्नों की संख्या 24 से 28 करने के मूड में है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि संतुष्ट और असंतुष्टों को लेकर है। दोनों खेमों के नेताओं की नींद उड़ी हुई है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले सालों पुराने हार्ड वर्कर्स बतियाते हैं, कि अब असंतुष्टों की हालत देखते लायक है, उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी है। कुछ वरिष्ठों ने राज के खिलाफ झण्डा तो उठा लिया, परन्तु अब सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को होता दिख रहा है। चूंकि यह राजनीति है, इसमें जो होता है, वह दिखता नहीं है, और दिखता है, वह होता नहीं है। कसमें और वादे भूलकर सब अपनी-अपनी बचाने के लिए देवरे धोक रहे हैं। लेकिन अटारी वाले बीएलजी भाई साहब की मंद-मंद मुस्कराहट के आगे बेबसी के सिवाय उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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