राज काज में क्या है खास, जानें
माया मिली, न राम
चर्चा में जातीय शतरंज :
भगवा वाले भाई लोगों सूबे की पॉलिटिक्स में इस बार अपर हाउस इलेक्शन के लिए ऐसा जातीय शतरंज बिछा दिया कि हाथ वाले दल के रणनीतिकारों की पेशानी पर पसीना और माथे पर गणित दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं। भगवा वालों ने एक चाल में किसान पुत्र और देवनारायण वंशजों को साधकर हाथ वालों के सामने ऐसा सवाल रख दिया है, जिसका जवाब राजनीतिक विज्ञान की किसी भी किताब में नहीं मिलता। अब हाथ वाले भाई लोगों की दुविधा है कि प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी पर किसको बिठाए। हालात ऐसे हैं, जैसे शादी में एक ही मिठाई बची हो और दो रिश्तेदार उस पर बराबर हक जता रहे हो। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि हाथ वालों का नेतृत्व इन दिनों जातीय कैलकुलेटर लेकर बैठा है, जिसमें जोड़-घटाव से ज्यादा कौन रुठेगा का कॉलम खुला रहता है। भगवा वाले भाई लोग मंद-मंद मुस्करा रहे और हाथ वाले भाई लोग माथापची कर रहे हैं। कुल मिलाकर राज्यसभा की सीट से ज्यादा रोमांस अब पीसीसी चीफ की कुर्सी के इर्द गिर्द दिखाई दे रहा है, जहां हर फैसला समर्थन से कम और संतुलन साधने की कला से ज्यादा तय होगा।
ना, बाबा ना :
समय बड़ा बलवान है, समय-समय की बात, कोई समय दिन बड़ा, तो कोई समय रात, वाली कहावत इन दिनों राज का काज करने वाले लोगों पर सटीक बैठ रही है। अब देखों ना, 15 दिन पहले तक राज का खास बनने के लिए काज करने वालों में होड सी मच गई थी, लेकिन जब से खासमखास माने जाने वाले साहब लपेटे में आए हैं, तभी से नंबर वन की लाइन में लगे साहब लोग भी अब चार कदम पीछे खडेÞ नजर आते हैं और तो और सीएमओ में नहीं जाने तक के नित नए बहाने ढूंढ रहे हैं। जब से फोन रिकॉर्ड होने की चर्चा होने लगी है, उनके हावभाव भी बदले-बदले से लग रहे हैं। किसी मसखरे नंबर वन की बात छेड़ी, तो साहब ने खुद को दसवें पायदान से कम बताकर ही दम लिया।
माया मिली, न राम :
सफेद कोट वाले धरती की भगवानों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि सात दिन तक ताल में ताल मिलाकर चलने के बाद भी उनके हाथ कुछ नहीं आएगा। ताल की आवाज गुलाबीनगरी से ब्रजनगरी तक भी सुनाई दी। कोशिष तो लाल किले तक पहंचने की थी, मगर कुछ लोगों की जिद ने सारा गुड़ गोबर कर दिया। आम आदमी को दवा-दारु देने की शपथ लेने वाले भाई लोग अब खुद जस्टिस के लिए तरस रहे हैं। और तो और खाकी के साथ खादी वाले भी बतियाते हैं कि इस बार आया ऊंट, पहाड़ के नीचे। राज के रत्न ने भी चिंतन-मंथन की आड में सारी हेकड़ी निकाल दी। सफेद कोट वाले धरती के भगवान, अभी भी नहीं समझे, तो फिर उनका उपर वाला ही मालिक है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि ई-फाइलिंग से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि सूबे में इन दिनों बड़े साहब लोगों की रातों की नींद उड़ी हुई है। बेचारों को चमक नींद में सोने की आदत सी पड़ गई है। जब भी आंख खुलती है, तो हाथ मोबाइल की तरफ ही जाता है। उनकी इस आदत से उनके घर वाले तक परेशान है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि जब से राज के मुखिया ने ई-फाइलिंग के निपटारों में टाइमिंग सेट किया है, तब से ही बेचारे रात को भी कई बार अपनी एसएसओ आईडी को खोलते हैं। पिछले दिनों एक आईएएस और एक आरएएस अधिकारी के बीच चार घंटे से ज्यादा एक फाइल को फुटबाल बनाने का खेल चला। आखिरकार तड़के चार बजे दोनों ने फाइल को बाबूजी के खाते में डाल कर चैन की नींद सोने में अपनी भलाई समझी। अब इस चमक नींद की बीमारी का कारण समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं )

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