राज काज में क्या है खास, जानें
चर्चा में भाई साहब की चुप्पी
रील बनाम रुल :
सूबे में इन दिनों रील बनाम रुल को लेकर चर्चा जोरों पर है। चर्चा है कि एक जमाना था, जब सरकारें विपक्ष से घबराती थी, अब ट्रेडिंग हैशटैग से चौकन्नी हो जाती है। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में बतियाते है कि अब जेन-जी ने बता दिया कि डेमोक्रेसी में अब सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि रील भी असर करती है। देश पर राज करने वालों ने सोचा होगा कि मामला दो-चार ट्वीट में ठंडा पड़ जाएगा, लेकिन यहां तो रील, स्टोरी और वायरल वीडियो ने ऐसा मोर्चा खोला कि नीति की फाइलों को भी यू-टर्न लेना पड़ गया। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि आज की पीढ़ी धरना कम और डेटा ज्यादा देती है। उसकी उंगली सिर्फ मोबाइल स्क्रीन पर ही नहीं चलती, सत्ता की नब्ज पर भी पड़ जाती है। अब देखो ना, राज को बैकफुट पर आना पड़ा। पॉलिटिक्स का न्यू मैथमेटिक्स भी यही है कि जहां कभी चुनावी रैलियां माहौल बनाती थी, अब एक वायरल पोस्ट पूरी पटकथा बदल देती है। डेमोक्रेसी का नया मुहावरा शायद यही है कि जनता जनार्दन अब जनता आॅनलाइन भी है।
तडफडाहट हुई तेज :
सूबे में हाथ वाले कुछ भाई लोगों में अचानक तडफडाहट बढ़ गई। बढ़े भी क्यों नहीं, इन दिनों दिल्ली में बैठी बहन-भाई की जोड़ी ने किनारा जो कर लिया। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर आने वाले हार्ड कोर वर्कर्स भी बतियाते हैं कि कुछ बडेÞ लोग दिल्ली में जगह पाने के लिए काफी तडफ रहे हैं। इसके लिए वे रात-दिन पसीने भी बहा रहे हैं, लेकिन दिल्ली वाले हैं कि उनको भाव ही नहीं दे रहे। भाव इसलिए नहीं दे रहे हैं कि मरु प्रदेश के कुछ नेताओं की वजह से हाथ वाले राजकुमार और भावी पीएम को कई बार नीचा तक देखना पड़ा। इसलिए तो कुछ लोगों को मैसेज तक दे दिया कि अपने-अपने घर बैठने में भलाई है। अब इस मैसेज के मायने को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
चर्चा में भाई साहब की चुप्पी :
भगवा वालों के एक खेमे में नागपुर वाले भाई साहब की चुप्पी को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे है। भारती भवन में भी इस चुप्पी को लेकर बैठकों में चिन्तन मंथन हुए बिना नहीं रहता है। चर्चा है कि देश में इतना सबकुछ होते हुए भी एक महीने से बड़े ठिकाने वाले भाई साहब का मौन धारण करना समझ के बाहर है। एक विचारधारा से जुड़े राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में खुसरफुसर करते हैं कि ठिकानेदार की इस चुप्पी का असर दीपावली से पहले दिखाई दिए बिना नहीं रहेगा। चूंकि भाई साहब ने समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि विचारधारा से हटकर चलने में नुकसान के सिवाय कुछ भी हाथ लगने वाला नहीं है। सो भाई लोगों को दसवें महीने का बेसब्री से इंतजार है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि फाइलों का फास्ट और फैसलों का स्लो मोड को लेकर है। जुमला है कि सूबे की ब्यूरोक्रेसी इन दिनों कुछ ऐसी दिखा रही है, जैसे हर फाइल ने योग सीख लिया हो, पहले गहरी सांस, फिर लंबा ध्यान और उसके बाद ही अगला कदम। पब्लिक सोचती है कि काम आज होगा, लेकिन फाइल कैलेंडर देखकर मुस्करा देती है कि इतनी भी क्या जल्दी है। दिलचस्प बात यह है कि मीटिंग्स की स्पीड बुलेट ट्रेन जैसी और फैसलों की चाल ऊंटगाड़ी जैसी लगती है। आदेश निकलते हैं, स्पष्टीकरण आते हैं, फिर संशोधन और फिर समीक्षा, मानों हर फाइल को प्रशासनिक पीएच.डी. करनी हो। अफसरों की कलम भी बड़ी समझदार है, वह तभी दौड़ती है, जब उसे पूरा भरोसा हो कि अब कोई सवाल नहीं पूछेगा। आखिरकार बेचारी पब्लिक यही समझ पाती है कि सूबे की ब्यूरोक्रेसी में टाइम ही सुपर बॉस है, बाकी सब उसके अधीन है। यहां काम रुकता नहीं, बस विचाराधीन होकर थोड़ा लम्बा विश्राम कर लेता है।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार है)

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