राज काज में क्या है खास, जानें
फिर अटकीं नियुक्तियां
टिकट की जुगाड़ :
सूबे में निकाय और पंचायत चुनावों की आहट क्या सुनाई दी, गांव की चौपाल से शहर की चाय की थड़ी तक दावेदारों की संख्या अचानक बढ़ गई। सालों तक मुंह फेर कर चलने वाले छुट्टभैये नेता भी अब जबरदस्ती गले पड़ते दिखाई दे रहे हैं। राज का काज करने वालों में खुसरफुसर है कि आरक्षण की लॉटरी ने कई पुराने सूरमाओं को ऐसी जगह खड़ा कर दिया, जहां टिकट का सपना अब जातीय गणित से लेकर वार्ड की किस्मत पर निर्भर है। प्रमुखों के पदों पर आरक्षण की तस्वीर सामने आने के बाद कई दावेदारों की धड़कनें और तेज हो गईं। अब देखो न, जिसके पास समर्थक है, वह टिकट मांग रहा है, और जिसके पास समर्थक नहीं है, वह समर्थकों की सूची बना रहा है। कोई संगठन में सक्रियता गिना रहा है, तो कोई पार्टी के बड़े नेताओं से अपनी पुरानी जान पहचान का हवाला देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। और तो और टिकट मिलने से पहले ही कई उम्मीदवारों ने तो जीत का जश्न मनाने की तैयारी तक कर ली। अब पार्टियों के बड़े नेता भी मुस्कराए बिना नहीं रहते, चूंकि एक टिकट पर दावेदार दस हैं और नाराज होने वालों की गिनती उससे भी ज्यादा। मनचलों के भी पौ-बारह हैं, जिनका नारा है कि पहले टिकट पक्का कराओ, फिर जनता को अपना बनाओ।
कुर्सी पर टिकीं नजरें :
सूबे में इन दिनों एक संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव की चर्चा जोरों पर है। चर्चा करने वाले अन्य कोई नहीं बल्कि सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर हैं। चर्चा करने वाले भी हार्डकोर वर्कर हैं। ठिकाने पर चर्चा है कि सूबे के सदर को संगठन की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिल्ली में कोई नई जिम्मेदारी दी जा सकती है। सियासी पंडितों के सामने इस कानाफूसी को खबर और खबर को फैसला बनाने से बचने के सिवाय कोई चारा नहीं है। लेकिन राजनीति में चर्चा भी कम दिलचस्प चीज नहीं होती। दिल्ली में अगर कोई कुर्सी खाली हो तो, सूबे के नेताओं की नजर अपने आप उधर उठ जाती है और पिंकसिटी में कुर्सी बदलने की आहट हो तो दावेदारों के फोन अचानक ज्यादा बजने लगते हैं।
फिर अटकीं नियुक्तियां :
भगवा वाले भाई लोगों के एक खेमे में फिर मायूसी छा गई। इधर-उधर भागादौड़ी कर बडी मुश्किल से पद के लिए हामी करवाई थी। इसके लिए सवामणी तक बोली थी, पर अब चन्द्रमा बिगड़ने से सारे किए धरे पर पानी फिरता नजर आ रहा है। उनको साफ संकेत दे दिए गए कि पहले निकाय और पंचायती चुनाव, बाकी सारे काम-धाम बाद में। अब उन बेचारों को कौन समझाए कि सब कुछ भाग्य से होता है, बल्कि पौने तीन साल बाद भी अटकाने का सवाल ही नहीं है। बेचारे कई भाई लोगों ने तो कई महीनों पहले ही कार्यभार संभालने के साथ ही मीडिया के सामने बढ़-चढ़कर बोलने की तैयारी तक कर ली थी। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि राजनीति में जो कहा जाता है, वो होता नहीं है, जो होता है, वो कहा नहीं जाता।
एक जुमला यह भी :
इन दिनों सूबे में शिक्षा के बड़े मंदिरों को लेकर एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि दोहरे सिस्टम को लेकर है। आजादी के बाद बने षिक्षा के एक बडे मंदिर पीजी में एक ही कोर्स की दो तरह की डिग्री हाथों में थमाई जाती है। एक सेमेस्टर सिस्टम की तो दूसरी पुरानी प्रणाली की। मंदिर में आने वाले बेचारे भक्तों को समझ में नहीं आ रहा कि सूबे के बाहर कौन सी डिग्री मान्य होगी। चूंकि उनको चिन्ता सता रही है कि दोयम दर्जे से कहीं यूजीसी के रुल्स, फ्यूचर के सपनों में रोडा बनने के साथ ही साख पर आंच न आ जाए।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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