डिजिटल युग में अंधविश्वास को मिलती मजबूती
सोशल मीडिया के माध्यम से
धर्म मनुष्य को विवेकहीन नहीं, विवेकवान बनाने का माध्यम होना चाहिए। मुश्किल यह है कि जब इसमें चमत्कार और अंधविश्वास का घालमेल कर दिया जाता है तो व्यक्ति भीड़ में तब्दील हो जाता है। जयपुर स्थित मोती डूंगरी गणेश जी के सिंजारा महोत्सव के दौरान मेहंदी को लेकर उमड़ी भीड़ इसकी मिसाल है। भारत धर्म प्रधान देश है। यहां धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि जीवनशैली, संस्कार, परंपरा और सामाजिक संबंधों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। हाल ही में जयपुर के मोती डूंगरी गणेशजी मंदिर में सिंजारा महोत्सव के दौरान जो दृश्य सामने आया, वह इसी समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करता है। गणेशजी को अर्पित मेहंदी लेने के लिए मंदिर के बाहर हजारों लोगों की ऐतिहासिक भीड़ जमा हो गई। सोशल मीडिया पर वायरल रीलों और दावों में कहा गया था कि सिंजारा उत्सव पर मिलने वाली यह मेहंदी लगाने से कुंवारे युवक-युवतियों का विवाह हो जाता है। दावे का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। मंदिर प्रबंधन ने भी स्पष्ट किया कि विवाह होने संबंधी दावा सोशल मीडिया पर फैलाया गया है और इसका मंदिर से कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद राजस्थान ही नहीं दिल्ली, चंडीगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और कई अन्य स्थानों से लोग जयपुर पहुंच गए। यह घटना बताती है कि सोशल मीडिया के दौर में धार्मिक आस्था और अंधविश्वास किस तेजी से घुल मिल सकते हैं। धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को नैतिकता, संयम, करुणा, सत्य और आत्मानुशासन की ओर ले जाना है। आस्था व्यक्ति को कठिन समय में आशा देती है। पूजा और प्रार्थना मन को शांति दे सकती हैं।
सोशल मीडिया के माध्यम से :
धार्मिक परंपराएं सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करती हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब कोई यह दावा करने लगे कि किसी विशेष वस्तु को लगाने, खाने या छूने मात्र से निश्चित रूप से विवाह हो जाएगा, बीमारी ठीक हो जाएगी, संतान प्राप्त होगी या कोई समस्या समाप्त हो जाएगी। इस बात को समझना होगा कि धर्म व्यक्ति को अपने भीतर झांकना सिखाता है, जबकि अंधविश्वास उसे चमत्कार के भरोसे छोड़ कर अंधी सुरंग में धकेल देता है। पहले किसी अंधविश्वासी धारणा को फैलने में समय लगता था। अब एक छोटी-सी रील लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम भी ऐसी सामग्री को तेजी से आगे बढ़ाते हैं जो भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करे। चमत्कार, रहस्य, डर और ‘एक बार करके देखिए’ जैसे दावे स्वाभाविक रूप से लोगों का ध्यान खींचते हैं। यही कारण है कि किसी धार्मिक आयोजन की सामान्य परंपरा को भी चमत्कार से जोड़कर पेश करना बहुत आसान हो गया है। जयपुर की घटना इसका उदाहरण है। मेहंदी धार्मिक परंपरा का हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसे विवाह की गारंटी से जोड़ देना एक अलग बात है। जब यह संदेश सोशल मीडिया के माध्यम से फैलता है तो हजारों लोग तथ्य की जांच किए बिना उसे सच मान सकते हैं। यहीं डिजिटल साक्षरता की कमी सामने आती है। अंधविश्वास केवल अज्ञान से पैदा नहीं होता। कई बार इसके पीछे गहरी मानवीय विवशता होती है।
अंधविश्वास का कारण :
विवाह को लेकर चिंतित युवक-युवती, संतान की इच्छा रखने वाला दंपती, गंभीर बीमारी से जूझता परिवार, आर्थिक संकट में फंसा व्यक्ति या घरेलू विवाद से परेशान महिला या पुरुष को जब सामान्य रास्तों से समाधान नहीं मिलता तो चमत्कार की उम्मीद आकर्षक लगने लगती है। यही वह मोड़ है, जहां उसे ठगने वाले सक्रिय हो जाते हैं। अंधविश्वास का एक कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी भी है। यदि किसी व्यक्ति को बीमारी है तो इलाज डॉक्टर से होना चाहिए। यदि विवाह में समस्या है तो सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत कारणों पर विचार होना चाहिए। यदि आर्थिक परेशानी है तो रोजगार, वित्तीय योजना और सरकारी सहायता के रास्ते तलाशे जाने चाहिए। जब समस्या का वास्तविक समाधान कठिन और समय लेने वाला होता है, तब चमत्कार आसान रास्ता लगता है। यही मानसिकता अंधविश्वास को बढ़ावा देती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ धर्म या आस्था का विरोध करना नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि जहां तथ्य और प्रमाण की जरूरत है, वहां दावे को प्रमाण की कसौटी पर परखा जाए। एक व्यक्ति पूजा करे, प्रार्थना करे, धार्मिक परंपरा निभाए, यह उसकी आस्था है। समस्या तब पैदा होती है जब कोई कहे कि एक खास मेहंदी लगाने से विवाह निश्चित हो जाएगा या किसी विशेष ताबीज से बीमारी समाप्त हो जाएगी। ऐसी स्थिति में प्रमाण मांगना तर्कशीलता है, इसे किसी धर्म का विरोध नहीं माना जा सकता। लोगों को संकट से बचाने के लिए अंधविश्वास से लड़ाई जरूरी है। इसके लिए सरकार कानून को प्रभावी बनाए। साथ ही धार्मिक संस्थाएं भी जागरूकता फैलाने के काम में मदद करें। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भ्रामक दावों पर अंकुश लगाएं और मीडिया अंधविश्वास पर चोट करे। धर्म को अपने अस्तित्व के लिए चमत्कार के सहारे की जरूरत नहीं होती।
-ज्ञान चंद पाटनी
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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