अस्सी के दशक की ओर लौटता समाज

नए सपनों का अनूठा मिश्रण

अस्सी के दशक की ओर लौटता समाज
समय की धारा में मनुष्य हमेशा आगे बढ़ता है, लेकिन उसकी आत्मा अक्सर अतीत के गलियारों में लौट जाने को व्याकुल रहती है। इन दिनों सोशल मीडिया के जगमगाते पिक्सल्स में एक अजीब सी यादों भरी दुनिया तैर रही है।

समय की धारा में मनुष्य हमेशा आगे बढ़ता है, लेकिन उसकी आत्मा अक्सर अतीत के गलियारों में लौट जाने को व्याकुल रहती है। इन दिनों सोशल मीडिया के जगमगाते पिक्सल्स में एक अजीब सी यादों भरी दुनिया तैर रही है। आज के डिजिटल युग के नागरिक, जो एआई की अत्याधुनिक तकनीकों से घिरे हैं, अपनी तस्वीरों को जान-बूझकर धुंधला, हल्का पीला और 80 के दशक के एनालॉग कैमरे से खींचा हुआ रूप दे रहे हैं। साधारण से स्मार्टफोन से ली गई तस्वीर जब 80 के दशक के रेट्रो एआई फोटो ट्रेंड के फिल्टर से गुजरती है, तो उस पर एक विंटेज परत चढ़ जाती है। हेयरस्टाइल बदल जाते हैं, पहनावे में बेल-बॉटम, बड़े कॉलर वाले सूती कुर्ते या जैकेट्स आ जाते हैं और बैकग्राउंड में एक अजीब सा ठहराव नजर आने लगता है। इस बहती हवा में सिर्फ आम इंटरनेट यूजर्स ही नहीं, बल्कि देश के कई वरिष्ठ नेता और बॉलीवुड के सितारे भी शामिल दिख रहे हैं। एक क्लिक में कोई 80 के दशक का समानांतर सिनेमा का अभिनेता लगने लगता है, तो कोई दूरदर्शन के दौर का कोई पहचाना हुआ चेहरा। लेकिन सवाल यह है कि 2020 के दशक के मध्य में खड़ा, एआई की गति से भागता समाज आखिर 80 के दशक की इस परछाईं में क्या खोज रहा है? 80 का यह ट्रेंड हमें हमारी उस मानसिक संरचना के बारे में क्या बताता है, जो आज के तीव्रतम तकनीकी युग में भी स्मृतियों की धीमी आंच पर सिकना चाहती है?

इस ट्रेंड की शुरुआत :

इस ट्रेंड की शुरुआत कोई बहुत सोची-समझी योजना का परिणाम नहीं थी। यह चैटजीपीटी और गूगल के जेमिनी (नैनो बनाना टूल) जैसे एआई इमेज जनरेटर्स के उस नए एल्गोरिदम का परिणाम है, जिसने विंटेज फोटोग्राफी के टेक्सचर को पहचानना और प्रॉम्प्ट के जरिए किसी भी चेहरे को रेट्रो लुक देना बेहद आसान बना दिया। लगभग 1-2 महीने पहले जब कुछ कंटेंट क्रिएटर्स ने प्रयोग के तौर पर अपने वर्तमान रूप को 80 के दशक की 'पोलरॉइड' स्टाइल या बॉलीवुड के रेट्रो पोस्टर के रूप में पोस्ट किया, तो वह तेजी से वायरल हो गया। देखते ही देखते यह एक व्यक्तिगत कौतूहल से बढ़कर एक वैश्विक सांस्कृतिक घटना बन गया। यह ट्रेंड दरअसल आधुनिक इंसान के एक गहरे मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को उजागर करता है। इसे मनोविज्ञान की भाषा में 'नॉस्टैल्जिया' या अतीत की ओर लौटने की छटपटाहट कहते हैं। आज का जीवन हर पल जुड़ा हुआ, हर पल दिखाई देने वाला और थकान से भरा हुआ है। एचडी स्क्रीन हमारी हर झुर्री, हर कमी को इतनी बेरहमी से उभारती हैं कि इंसान अपनी ही वास्तविकता से थकने लगता है। 80 के दशक का वह विंटेज टेक्सचर (जिसमें ग्रेन जैसी बनावट होती थी, रंग थोड़े बिखरे हुए और धुंधले होते थे) आंखों को सुकून देता है। वह परफेक्ट दिखने के इस आधुनिक दबाव से मुक्ति दिलाता है।

समय की यादों में खो जाना :

Read More राज काज में क्या है खास, जानें

80 के दशक की तस्वीरों में एक तरह की स्वाभाविकता और रहस्य हुआ करता था। उस दौर में रील वाले कैमरे थे, जहां एक-एक फोटो खींचने से पहले इंसान अपनी मुद्रा सहेजता था और धोए जाने के बाद ही पता चलता था कि तस्वीर कैसी आई। उस दौर की अनिश्चितता में एक तरह का जादू था। आज एआई के जरिए लोग उसी जादू को फिर से जीने का प्रयास कर रहे हैं। जिस दौर को आज की युवा पीढ़ी ने देखा भी नहीं है, उस दौर के प्रति यह आकर्षण 'एनेमोया' कहलाता है—अर्थात उस समय की यादों में खो जाना जिसे आपने कभी जिया ही नहीं। लेकिन आखिर कैसा था 80 का दशक, जिसे हम इस कदर आदर्श बनाकर देख रहे हैं? 80 का दशक भारत और दुनिया दोनों के लिए ही भारी बदलावों और एक नए दौर की शुरुआत का समय था। वह दूरदर्शन का दौर था, जहां पूरा मोहल्ला एक ब्लैक एंड व्हाइट या नए-नए आए रंगीन टीवी के सामने इकट्ठा होकर 'रामायण', 'महाभारत' या 'बुनियाद' देखा करता था।

Read More विकास की कीमत चुकाता हिमालय

नए सपनों का अनूठा मिश्रण :

वैचारिक रूप से 80 का दशक सादगी और नए सपनों का अनूठा मिश्रण था। उस दौर के फैशन में एक बिंदासपन था उभरे हुए बाल, बड़े धूप के चश्मे, चौड़े कॉलर और रंग-बिरंगे कपड़ों का प्रयोग। वह इंटरनेट से पहले का आखिरी ऐसा दौर था, जहां लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय था। चिट्ठियां दिनों में पहुंचती थीं, लेकिन उनमें लिखा हर शब्द लंबे समय तक मन में रचा-बसा रहता था। जब आज का कोई बड़ा राजनेता या अभिनेता अपनी तस्वीर को 80 के दशक के सांचे में ढालकर साझा करता है, तो वह केवल एक एआई फिल्टर का उपयोग नहीं कर रहा होता। यह ट्रेंड लोगों को एक जुड़ाव का अहसास कराता है। मानव मनोविज्ञान का एक बुनियादी नियम है कि वह तनाव के समय में उस अतीत की शरण लेता है जो उसे सुरक्षित महसूस कराता है। आज जब एआई हमारे जीवन के हर हिस्से में पैठ बना रहा है, तो वही एआई हमें एक ढाल भी दे रहा है एक ऐसी ढाल जो हमें कुछ पलों के लिए उस दौर में ले जाती है जहां जीवन अधिक सरल, अधिक धीमा और शायद अधिक वास्तविक था। 80 का यह रेट्रो एआई ट्रेंड केवल एक फैशन या रील्स बनाने का बहाना भर नहीं है, यह एक भागते हुए युग का अपने ही अतीत को थामने का एक मासूम और डिजिटल प्रयास है।

-देवेन्द्रराज सुथार

यह लेखक के अपने विचार हैं

Related Posts

Post Comment

Comment List

Latest News

21 हजार लड्डुओं से सजेगी गणपति महाराज की झांकी, 14 सितंबर को छप्पन भोग 21 हजार लड्डुओं से सजेगी गणपति महाराज की झांकी, 14 सितंबर को छप्पन भोग
चांदपोल स्थित परकोटा गणेश मंदिर में तीन दिवसीय गणेश चतुर्थी महोत्सव की तैयारियां शुरू। 12 सितंबर को 21 हजार लड्डुओं...
उत्तर कोरिया ने जापान सागर की ओर दागीं बैलिस्टिक मिसाइलें, समुद्र में गिरने से पहले 250 किलोमीटर तक उड़ीं
उत्तराखंड में कैलाश मानसरोवर मार्ग पर कुलागाड़ पुल ध्वस्त : चीन सीमा से कटा संपर्क, यातायात बाधित
ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा बैठक आयोजित, क्लस्टर विकसित करने और ई-सरस मेले आयोजित करने पर जोर
लंपी रोग पर सरकार सख्त, जिलों को मिलेंगे पांच-पांच लाख रुपए
अस्सी के दशक की ओर लौटता समाज
श्राद्ध पक्ष की शुरुआत 26 सितम्बर से, 16 दिन नहीं होंगे मांगलिक कार्य