राज काज में क्या है खास, जानें
बदलते तेवर
मुझे पीने का शौक नहीं :
सूबे में इन दिनों भगवा वालों के साथ ही हाथ वाले कई भाई लोगों का अलग ही शौक काफी चर्चा में है। चर्चा भी मारवाड़ से लेकर हाड़ौती और मेवाड़ से लेकर ढूंढ़ाड़ तक है। शहरी सरकारों के चुनाव में गमजदा ये भाई लोग न रात देख रहे हैं और नहीं दिन। उनकी आंखों का रंग और चाल-ढाल भी बदल-बदली सी नजर आती है। जो भाई लोग दिन-रात पार्टी के लिए जीने-मरने की कसमें खाते थे, वो ही पार्टी कैंडीडेट का नाम लेते ही भड़कते है। एट पीएम के बाद तो बेचारे 26 साल पहले बनी कुली फिल्म का गाना जोर जोर से गुनगुनाते हैं। गाना भी दूसरा नहीं बल्कि मुझे पीने का शौक नहीं, पीता हूं, गम भुलाने को। राज का काज करने वालों में खुसरफुसर है कि उनकी यह हालत और किसी ने नहीं बल्कि उनके ही लीडर्स ने की है, जो सालों तक उनसे बैल की तरह काम लेते रहे और किसी न किसी बहाने से जेब खाली कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी और टिकट देने की बारी आने पर कोई न कोई बहाना बना कर कन्नी काट गए।
बदलते तेवर :
तेवर तो तेवर ही होते हैं, कब बदल जाएं, कोई पता नहीं। अब देखो न, सूबे में राज करने वाले के ही तेवर बदले, तो बहुत कुछ बदल गया। भगवा वाली पार्टी के एक नेताजी ने तो ऐसे तेवर बदले कि न तो आगा सोचा और नहीं पीछा। उनके बदलते तेवरों का असर हाथ वाले भाई लोगों पर भी पड़ता दिखा तो, तुरंत सर्जरी कर दी गई। लेकिन भगवा वाले डॉक्टर साहब को तो अभी तक मर्ज ही समझ में नहीं आ रहा कि तेवर वाली बीमारी दाईं तरफ है या बाईं तरफ । राज का काज करने वालों में चर्चा है कि तेवर बदलने वाले नेताजी को भी समझ में आ गया कि अक्ल उम्र से नहीं बल्कि भचीड़ खाने से आती है। अब बेचारे को ढीला पड़ने के सिवाय कोई चारा भी तो नजर नहीं आ रहा, चूंकि जिनके पीछे तेवर बदले थे, वो खुद ही सबसे पहले पाला बदल कर अपना ही भला करने में लग गए।
अलग-अलग, जुदा-जुदा :
सूबे में हाथ वाले भाई लोगों का भी कोई सानी नहीं है। पौने तीन साल से ठाले बैठे भाई साहबों का दिमाग भी कोई न कोई खुराफात किए बिना नहीं रहता। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर आने वाले भाई लोगों का दिमाग दिन अलग-अलग और जुदा-जुदा चल रहा है। ठिकाने पर रोजाना आने वाले हार्ड कोर वर्कर्स आपस में बतियाते हैं कि भगवा वाले भाई साहब अलग-अलग हैं, तो हमारे हाथ वाले भी कम नहीं है, वे भी जुदा-जुदा है। लक्ष्मणगढ वाले भाई साहब से एक कदम आगे अलवर वाले भाई साहब है, तो जोधपुर भाई साहब की स्पीड कम होने का नाम नहीं नहीं ले रही। तिगडी के फेर में फंसे जयपुर वाले भाई साहब इन तीनों से ही जुदा है।
एक जुमला यह भी :
सूबे इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि न्याय के बडे मंदिर के पुजारियों से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि न्याय के सबसे बडे मंदिर के पुजारी चचाओंर् ससे दूर रहने की कोषिष करने में कोई कसर नहीं छोडते, मगर उसे पहले वाले पुजारी चर्चा में लाए बिना नहीं रहते। अब देखो न, बीते दिनों लालकिले वाली नगरी मंदिर के पुजारी ने चर्चा में लाने के लिए रात दिन एक कर दिए, वो तो भला हो मठाधीश का, जिन्होंने मामले का डायवर्जन करने के लिए गली निकाल ली।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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