पर्यावरणीय संकट और बहुआयामी वैश्विक चुनौती
अत्यधिक मौसम घटनाएं
विश्व आज अभूतपूर्व वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है। आर्थिक अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल परिस्थितियां वैश्विक शासन व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2026 के अनुसार अत्यधिक मौसम अगले दशक का सबसे बड़ा वैश्विक जोखिम है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता से जुड़ा बहुआयामी प्रश्न है। इस रिपोर्ट में 1300 से अधिक विशेषज्ञों के विचारों के आधार पर वैश्विक जोखिमों का विश्लेषण किया गया है। अत्यधिक मौसम की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता को सबसे बड़ा दीर्घकालिक खतरा माना गया है। रिपोर्ट बहुपक्षीय सहयोग, हरित प्रौद्योगिकी और सतत विकास को समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है जो स्पष्ट करती है कि विश्व दो समानांतर संकटों का सामना कर रहा है।
वैश्विक स्थिरता कमजोर :
तात्कालिक आर्थिक-राजनीतिक टकराव, जो वैश्विक स्थिरता को कमजोर कर सकता है व दीर्घकालिक जलवायु संकट, जो मानव अस्तित्व और विकास मॉडल को चुनौती दे रहा है। यदि वैश्विक समुदाय सहयोग, बहुपक्षवाद और सतत विकास की दिशा में समन्वित प्रयास नहीं करता, तो ये दोनों जोखिम एक-दूसरे को और अधिक जटिल बना देंगे। 21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य केवल सैन्य या राजनीतिक संघर्षों से नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति, तकनीकी प्रभुत्व और संसाधनों के नियंत्रण से भी निर्धारित हो रहा है। इस स्थिति को भू-आर्थिक टकराव कहा जाता है। अगले दशक में शीर्ष जोखिम जलवायु परिवर्तन की तीव्रता से होगा। ग्रीनहाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन ने पृथ्वी के औसत तापमान को औद्योगिक क्रांति पूर्व स्तर से लगभग 1.1–1.3°C तक बढ़ा दिया है व आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति ने हर वर्ष रिकॉर्ड तोड़ तापमान, असामान्य वर्षा और तीव्र चक्रवात देखने को मिल रहे हैं जिससे विश्व स्तर पर जलवायु आपदाओं से अरबों डॉलर की आर्थिक क्षति हो रही है।
कृषि उत्पादन घटता है :
अवसंरचना नष्ट होती है, कृषि उत्पादन घटता है, बीमा लागत बढ़ती जा रही है इससे मानव सुरक्षा पर प्रभाव पड़ा है जैसे जल संकट, खाद्य असुरक्षा, स्वास्थ्य समस्याएं व जलवायु शरणार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई है। अत्यधिक मौसम के कारण आपूर्ति शृंखलाएं बाधित होती हैं, ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है और वैश्विक व्यापार पर असर पड़ता है। कमजोर और गरीब समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। विस्थापन और असमानता बढ़ती है। अन्य जोखिमों के साथ अंतर्संबंध-अत्यधिक मौसम अन्य वैश्विक जोखिमों को भी बढ़ाता है जैसे-खाद्य संकट, जल संकट, राजनीतिक अस्थिरता, प्रवासन संकट व आर्थिक मंदी। इस प्रकार यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि बहुआयामी वैश्विक चुनौती है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। औद्योगिकीकरण और जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है।
हिमनद पिघल रहे हैं :
इससे समुद्र स्तर बढ़ रहा है, हिमनद पिघल रहे हैं और चरम मौसमी घटनाएं बढ़ रही हैं। रिपोर्ट यह चेतावनी देती है कि यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा उनमें जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, हरित वित्त और सतत निवेश, सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल द्वारा इन उपायों से कई देशों ने आपदा क्षति में कमी और ऊर्जा संक्रमण में सफलता भी प्राप्त की है। भू-आर्थिक टकराव की अवधारणा वह स्थिति है जब राष्ट्र अपनी आर्थिक नीतियों और संसाधनों का उपयोग राजनीतिक या रणनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए करते हैं। इसमें व्यापार युद्ध, आयात-निर्यात प्रतिबंध, आर्थिक प्रतिबंध, आपूर्ति शृंखला का हथियारीकरण, तकनीकी निर्यात नियंत्रण, मुद्रा और वित्तीय प्रणाली का रणनीतिक उपयोग शामिल है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था कमजोर हो रही है। क्षेत्रीय आर्थिक ब्लॉक मजबूत हो रहे हैं। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और आर्थिक राष्ट्रवाद उभर रहा है।
वैश्विक व्यापार में गिरावट :
इन प्रवृत्तियों से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं प्रभावित हो रही हैं जिनमें आर्थिक प्रभाव के तहत वैश्विक व्यापार में गिरावट होना, निवेश अनिश्चितता आना, मुद्रास्फीति में बदलाव आना व आपूर्ति बाधाएं है। सामाजिक प्रभाव से रोजगार संकट आता है व असमानता में वृद्धि होती है। राजनीतिक प्रभाव का असर क्षेत्रीय तनाव बढ़ाता है और कूटनीतिक संबंधों में गिरावट आती है। विकासशील देशों के प्रभाव से भारत जैसे देशों के लिए भू-आर्थिक टकराव दोहरी चुनौती प्रस्तुत करता है जिनमें निर्यात आधारित उद्योग प्रभावित होते हैं, ऊर्जा और खाद्यान्न आयात महंगा होता है और विदेशी निवेश में अनिश्चितता आती है इसलिए आत्मनिर्भरता, आपूर्ति विविधीकरण और रणनीतिक साझेदारी आवश्यक हो जाती है। अत्यधिक मौसम बदलाव अगले दशक का सबसे बड़ा वैश्विक जोखिम बढ़ा सकता है।
अत्यधिक मौसम घटनाएं :
अत्यधिक मौसम घटनाएं जैसे बाढ़, तूफान व चक्रवात, शीत लहर, सूखा, गर्म हवाऐं, जंगल की आग आदि जलवायु परिवर्तन के कारण अधिक बार और अधिक तीव्रता से हो सकते हैं। जिनका वैश्विक प्रभाव आर्थिक दृष्टिकोण से अरबों डॉलर की क्षति ला सकता है, कृषि उत्पादन में गिरावट आ सकती है व बीमा लागत में वृद्धि आ सकती है। सामाजिक दृष्टि से विस्थापन, जल संकट, खाद्य असुरक्षा पर असर पड़ सकता है। पर्यावरणीय बदलाव से जैव विविधता पर असर,समुद्र स्तर में वृद्धि व पारिस्थितिक तंत्र का अधिक विनाश हो सकता है। भू-आर्थिक टकराव और अत्यधिक मौसम दोनों मिलकर वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं। इसमें अल्पकाल में आर्थिक अस्थिरता लानी होगी और दीर्घकाल में पर्यावरणीय विनाश अपनाना पड़ेगा। यदि वैश्विक समुदाय सहयोग, नवाचार और सतत विकास को प्राथमिकता देता है, तो इन जोखिमों को अवसर में बदला जा सकता है जो भविष्य की सुरक्षा के लिए आर्थिक कूटनीति और जलवायु नेतृत्व का संतुलन अनिवार्य है।
-डॉ. रिपुन्जय सिंह
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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