राज काज में क्या है खास, जानें
सत्ता के लिए जुगाड़
न्योते कई और टिकट एक :
राजस्थान में शहरी सरकारों के चुनाव की आहट क्या हुई, विधायकों की धड़कनें बढ़ गईं। असली परेशानी विपक्ष से ज्यादा उन अपनों से है, जिन्हें नेताजी पहले से चुनावी मैदान में उतरने का न्योता दे चुके हैं। राज का काज करने वालों की मानें तो नेताओं से किसी ने कहा कि आपकी टिकट पक्की समझो, तो किसी को भरोसा दिला रहे हैं कि आप चिंता मत करो, हाईलेवल तक बात हो गई। नेताओं की मुसीबत यह कि बात यहीं खत्म नहीं होती। इन भावी प्रत्याशियों ने भी नेताजी के भरोसे को हल्के में नहीं लिया और कई मौकों पर जेब ढीली कर दी। अब जब टिकट की बारी आई तो हिसाब-किताब सामने आने लगा। टिकट एक है और दावेदारों की फौज। विधायक जी के सामने धर्मसंकट यह है कि एक को टिकट दें, तो बाकी पूछेंगे कि हमारा कसूर क्या था और जिसे टिकट न मिले, वह शायद पुरानी मेहरबानियों की रसीद लेकर बैठ जाए। अब बेचारे नेताजी दिन में टिकट बांटने की राजनीति और रात में दिल की धड़कन गिनने की कवायद कर रहे हैं। चुनाव तो अभी दो सप्ताह दूर है, मगर विधायकों की टेंशन पॉलिंग शुरू हो चुकी है।
खौफ कॉकरोच का :
सूबे की सियासत में इन दिनों एक नई पार्टी ने राज और उसका काज करने वालों की नींद उड़ा रखी है। कॉकरोच नाम की यह पार्टी नाम से भले ही मजाकिया हो, लेकिन इसकी हलचल ने बडेÞ-बड़ों के माथे पर पसीना ला दिया है। कॉकरोच की खासियत ही यही है कि उसे जितना भगाओ, वह उतनी ही तेजी से किसी नए कोने से निकल आता है। राज भी सोच में है कि आखिर इनका इलाज क्या हो, बयानबाजी की स्प्रे छिड़कें या पॉलिटिक्ल फिनाइल का छिड़काव करें। अब देखो न, कॉकरोच पार्टी वाले भी पूरी तैयारी में हैं। उन्हें भरोसा है कि जिस तरह असली कॉकरोच मुश्किल हालत में भी जिन्दा रहने की कला जानते हैं, वैसे ही वे भी सियासत के हर स्प्रे से बच निकलेंगे। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में बतियाते हैं कि पॉलिटिक्स में वैसे भी इन दिनों मुद्दे कम और प्रयोग ज्यादा हो रहे हैं। ऐसे में कॉकरोच पार्टी ने कम से कम नेताओं को एक नया डर तो दे दिया है कि कहीं अगली बार वोटों के डिब्बे से भी कॉकरोच न निकल आए।
सत्ता के लिए जुगाड़ :
सूबे में जुगाड़ की परम्परा पीढ़ियों पुरानी है। हर कोई, साम, दाम, दंड और भेद से जुगाड़ के लिए दिन रात हाथ पैर मारता रहता है। हालत यह है कि अब तो सवारियां ढोने तक में जुगाड़ काम में लिया जाने लगा है। महाराणा प्रताप के नाम से चलने वाली एक संस्था के कर्ताधर्ताओं ने भी सत्ता पाने के लिए एक नया जुगाड़ ढूंढ़ा है। उन्होंने फिर से उन क्षेत्रों में चिंतन-मंथन करने का मानस बनाया है, जहां से कभी भी बन्नाओं को मैदान में नहीं उतारा गया। इन दिनों जैतारण, ओसियां, खींवसर, डेगाना और सिरोही इलाकों की सड़कों पर बन्नाओं से भरी महंगी कारों का काफिला गुजरना आम बात है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि प्रजेंट और एक्स प्रेसीडेंट की नई जुगलबंदी से ताल्लुक रखता है। नई जुगलबंदी भी हाथ वाले भाई लोगों के बीच है। जुमला है कि जब से जोधपुर वाले अशोक जी भाई साहब ने चौथी बार राज की कुर्सी पर बैठने का दावा किया है, तब से गुजरे जमाने में एक-दूसरे की आंखों में भी खटकने वाले सीनियर लीडर्स इन दिनों हाथ में हाथ डालकर घूमते दिखते हैं। अब कहने वालों का मुंह तो पकड़ा नहीं जाता, क्योंकि ये पॉलिटिक्स है, अपने स्वार्थ के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है, और न चाहते हुए भी दुश्मन को भी गले लगाना पड़ता है।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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