राज काज में क्या है खास, जानें

अब जातीय ध्रुवीकरण

राज काज में क्या है खास, जानें
किसी के लिए पगफेरा शुभ होता है, तो किसी की रातों की नींद हराम हो जाती है। यह तो पगफेरा वाले साहब पर निर्भर करता है।

असर पगफेरे का :

किसी के लिए पगफेरा शुभ होता है, तो किसी की रातों की नींद हराम हो जाती है। यह तो पगफेरा वाले साहब पर निर्भर करता है। कुछ इसी तरह के पगफेरे का असर इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर दिखाई देता है। जब जब पांच नदियों वाले सूबे के सरदार जी का पग सूबे की धरती पर पड़ता है, तब तब कोई कोई भूचाल आए बिना नहीं रहता। आदेशों की पालना में हाथ जोड़कर खड़ा रहने वाला अदना सा वर्कर भी निर्णायक की भूमिका में दिखाई देने लगता है। सुख के हमनाम सरदार जी का पग सूबे के बाहर पडता है, तो सबकुछ शांत हो जाता है, कि मानो कुछ हुआ ही हो। सरदार जी के पगफेरे से दुखी कई गांधी टोपी वालों ने टोटके तक करने शुरु कर दिए। उनकी समझ में नहीं रहा कि सरदार जी फीडबैक ले रहे हैं कि अपनों की उतरवाने में जुटे हैं।

चर्चा में तीन बंदर :

इन दिनों सूबे में गांधी जी के तीन बंदरों की चर्चा जोरों पर है। इस चर्चा से गांव-गांव और ढाणी-ढाणी तक अछूता नहीं है। गुजरे जमाने में गांधी जी के तीन बंदर वाला जुमला खादी वालों पर सटीक बैठता था, पर अब खाकी वालों पर फिट है। चर्चा भीप ीएचक्यू से शुरू होकर सचिवालय के गलियारों तक पहुंच गई। यह चर्चा राज का काज करने वालों के लंच केबिनों में भी चटकारे लेकर सुनाई जा रही है। हमें भी स्टैच्यू सर्किल पर खाकी वाले साहब ने सुनाया। खाकी वालों में इन दिनों कोई सुनता है, कोई देखता है और नहीं कोई बोलता है। आईओ वो करते हैं, जो ऊपर वालों का आदेश होता है। यानी कि वे गूंगे, बहरे और अंधे के समान हैं। गांधी जी के तीन बंदरों वाली इस कहावत के भाई लोग कई तरह के मायने निकाल रहे हैं, जिन्हें समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।

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सर्वे ने उड़ाई नींद :

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पिछले दिनों आए एक सर्वे से सूबे के कई नेताओं की नींद उड़ी हुई है। उडेÞ भी क्यों , मामला फ्यूचर से ताल्लुक जो रखता है। सर्वे से भगवा वाले भाई लोगों की नींद उड़ना तो समझ में आता है, लेकिन हाथ वालों के चेहरे कुछ ज्यादा ही लटके हुए हैं। चेहरे लटकने का कारण भी साफ है कि राज की कुर्सी के सपने देखने वाले भाई लोगों ने दिल्ली वालों के कान भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, मगर सूबे की पब्लिक की राय को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं। अगर सर्वे पर अमल हुआ तो, कइयों के मंसूबों पर पानी फिरता नजर आएगा।

अब जातीय ध्रुवीकरण :

सूबे में इन दिनों कास्ट को लेकर चर्चा जोरों पर है। किसी भी गली और चौराहे पर कास्ट की बात हुए बिना नहीं रहती। सरकारी दफ्तरों में तो कास्ट के नाम पर मुंह खोले बिना फाइल की तरफ देखते तक नहीं। पार्टियों की बैठकों और चिंतन-मंथन का श्रीगणेश भी कास्ट वंदना से होता है। राज का काज करने वाले लंच कैबिनों में बतियाते हैं कि अब धर्म के धु्रवीकरण के बजाय जातीय धु्रवीकरण पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। इस दौड़ में सारे सिद्धांतों को पीछे रखकर भगवा वाले भाई लोग सबसे आगे हैं। हाथ वाले भाई लोगों पर कास्ट की राजनीति करने का आरोप लगाने वाली पार्टी ने भी टॉप लेवल के लिए कैंडीडेट्स के सेलेक्शन तक में मूल कैडर को भूल, जातीय धु्रवीकरण को पहली प्राथमिकता दी है।

-एल. एल. शर्मा

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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