निकाय चुनाव : शहरी गढ़ में कांग्रेस के सामने सेंधमारी की चुनौती, बोर्ड बनाने पर दोनों दलों की नजर
शहरी वोट बैंक सबसे बड़ी चुनौती
जयपुर। राजस्थान में निकाय चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस की तैयारियां तेज हो गई हैं। दोनों दल प्रत्याशियों के चयन में जुटे हैं। कांग्रेस इस बार अधिकांश निकायों में बोर्ड बनाने का दावा कर रही है, लेकिन प्रदेश के बड़े नगर निगमों का पिछला इतिहास उसके लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। जयपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और बीकानेर में अधिकांश मौकों पर भाजपा का दबदबा रहा है।
जयपुर में भाजपा का पलड़ा भारी : 1994 में नगर निगम बनने के बाद जयपुर में कांग्रेस को सीधे महापौर चुनाव में केवल 2009 में सफलता मिलीए जब ज्योति खंडेलवाल महापौर बनीं। 2020 में निगम दो हिस्सों में बंटने के बाद हेरिटेज में कांग्रेस समर्थित बोर्ड बनाए जबकि ग्रेटर में भाजपा का बोर्ड रहा।
उदयपुर में कांग्रेस का खाता नहीं खुला : उदयपुर में अब तक हुए छह चुनावों में हर बार भाजपा का महापौर बना। यहां कांग्रेस अब तक महापौर पद हासिल नहीं कर सकी।
जोधपुर में कांग्रेस को राहत : पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर में 1999, 2004 और 2009 में लगातार कांग्रेस के महापौर बने। 2020 में विभाजन के बाद जोधपुर उत्तर में कांग्रेस और दक्षिण में भाजपा का महापौर चुना गया।
कोटा और अजमेर में भी भाजपा आगे : कोटा में 1994 से 2020 तक भाजपा के चार और कांग्रेस के दो महापौर रहे। 2020 के विभाजन के बाद दोनों निगमों में कांग्रेस को सफलता मिली। अजमेर में 2007 के बाद केवल 2010 में कांग्रेस महापौर बना सकी।
बीकानेर में बदले समीकरण : बीकानेर में 2009 में कांग्रेस के भवानी शंकर शर्मा पहले निर्वाचित महापौर बने। इसके बाद 2014 और 2019 में भाजपा के बोर्ड बने।
शहरी वोट बैंक सबसे बड़ी चुनौती :
राजनीतिक विश्लेषक मनीष गोधा के अनुसार, भाजपा का शहरी क्षेत्रों में लंबे समय से मजबूत आधार रहा है। वहीं परिसीमन के बाद भाजपा को इसका लाभ मिलने की संभावना है। दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं का दावा है कि भाजपा सरकार के खिलाफ जनता में नाराजगी है और इस बार कांग्रेस शहरी गढ़ में सेंध लगाएगी।

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