पॉडकास्ट के नए रूप में आज भी जी रहा रेडियो
श्रुति और ध्वनि परंपरा
आकाशवाणी शब्द पर क्षणभर ठहर कर विचार करें तो इसमें एक समूची सभ्यतागत कल्पना छिपी मिलती है। आकाश से अवतरित होने वाली वाणी, वह स्वर जिसका कोई भौतिक स्रोत दृष्टिगोचर नहीं होता, जो अदृश्य से उतरकर मनुष्य के श्रवण तक पहुंचता है। भारतीय चिंतन में यह अवधारणा नवीन नहीं थी। पुराणों और उपनिषदों में शब्द को ब्रह्म का ही एक रूप माना गया है, नाद को सृष्टि का आदि तत्व कहा गया है और देवताओं की अशरीरी वाणी की कल्पना सदियों से भारतीय मानस में रची-बसी रही है। जब 1927 में आधुनिक तकनीक ने इस पौराणिक बिंब को यथार्थ धरातल पर उतारा, तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह आविष्कार आगे चलकर एक पराधीन राष्ट्र की सामूहिक चेतना गढ़ने का माध्यम बनेगा। 23 जुलाई को स्मरण किया जाने वाला राष्ट्रीय प्रसारण दिवस इसलिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस क्षण का उत्सव है जब मनुष्य का स्वर पहली बार देश और काल की सीमाओं को लांघकर एक साथ अगणित श्रोताओं तक पहुंचने में समर्थ हुआ। इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने उस दिन बंबई से जो प्रसारण आरंभ किया, वह भले ही सीमित साधनों और सीमित श्रोताओं तक सिमटा रहा हो, किंतु उसमें भविष्य की वह सामर्थ्य अंतर्निहित थी जो आगे चलकर करोड़ों भारतीयों की साझा स्मृति रचने वाली थी।
बहुभाषिक चेतना का वाहक :
1930 में निजी कंपनी के परिसमापन के पश्चात जब शासन ने प्रसारण सुविधाओं का दायित्व स्वयं ग्रहण किया, तो यह माध्यम राजकीय उत्तरदायित्व बन गया, केवल वाणिज्यिक उपक्रम नहीं रहा। 1936 में ऑल इंडिया रेडियो और 1957 में आकाशवाणी नामकरण होने तक यह संस्था क्रमशः भारत की बहुभाषिक चेतना की वाहक बनती चली गई। किंतु इस संस्थागत विकास से कहीं अधिक मर्मस्पर्शी वह क्षण है जब 1947 में जवाहरलाल नेहरू का 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' भाषण रेडियो तरंगों के सहारे राष्ट्र के कोने-कोने तक पहुंचा। उस रात्रि करोड़ों भारतीय, जिन्होंने परस्पर एक दूसरे को कभी देखा तक नहीं था, एक ही स्वर को श्रवण करते हुए एक साथ स्वतंत्रता के उस पावन क्षण में प्रविष्ट हो रहे थे। यही रेडियो का सर्वोपरि सामर्थ्य है, यह दृश्य के अभाव में भी एकत्व की रचना कर सकता है। जहां चित्र के अवलोकन हेतु एकाग्रता अपेक्षित है, वहीं ध्वनि खेत में श्रम करते हुए, चूल्हे के समीप बैठे हुए, अथवा पथ पर चलते हुए भी साथ रह सकती है। यही कारण है कि स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात के दशकों में कृषि उपज के मूल्य बताने से लेकर स्वास्थ्य और शिक्षा संबंधी जानकारी पहुंचाने तक, आकाशवाणी ने उस भारत को भी अपने आंचल में समेटा जहां साक्षरता और विद्युत दोनों दुर्लभ थीं।
श्रुति और ध्वनि परंपरा :
भारतीय परंपरा में यह प्रवृत्ति सर्वथा नवीन नहीं है। वेदों को श्रुति की संज्ञा दी गई, अर्थात वह ज्ञान जो केवल श्रवण से अग्रसर होता रहा, बिना लिपि के, बिना दृश्य के, केवल स्वर की स्मृति के सहारे पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित होता रहा। आनंदवर्धन ने काव्यशास्त्र में ध्वनि सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए कहा था कि उत्कृष्ट काव्य का सार शब्दों के शाब्दिक अर्थ में नहीं, अपितु उनसे व्यंजित होने वाली प्रतिध्वनि में निहित होता है। रेडियो ने मानो आधुनिक तकनीक के सहारे उसी श्रुति और ध्वनि परंपरा को नवीन युग में पुनर्जीवित किया, जहां ज्ञान पुनः श्रवण के कर्म से गुजरकर मनुष्य तक पहुंचने लगा। रेडियो की यह अदृश्यता ही उसका सर्वप्रमुख तात्विक गुण है। दूरदर्शन और आज के दृश्य माध्यम दर्शक को एक सुनिश्चित छवि सौंप देते हैं, जबकि रेडियो श्रोता की कल्पनाशक्ति को मुक्त छोड़ देता है। जब कोई उद्घोषक समाचार वाचन करता है अथवा कोई गायक गीत गाता है, तो श्रोता अपने अंतर्मन में उसका मुखमंडल, उसका परिवेश स्वयं रचता है। यह सहभागिता, कल्पनाशीलता को दिया गया निमंत्रण, दृश्य माध्यमों में प्रायः विलुप्त हो जाता है। इसके साथ ही रेडियो में एक प्रकार की जनतांत्रिक समता भी विद्यमान है।
एफएम प्रसारण का आरंभ :
आज जब हम प्रौद्योगिकी संचालित मनोरंजन और यांत्रिक चयन के युग में जी रहे हैं, तब रेडियो का यह जनतांत्रिक स्वभाव और भी मूल्यवान प्रतीत होता है। नवीन माध्यम प्रत्येक व्यक्ति को उसकी निजी रुचि के अनुरूप पृथक-पृथक सामग्री परोसते हैं, जिससे एक साझा सार्वजनिक अनुभव निरंतर खंडित होता जा रहा है। रेडियो इसके विपरीत आज भी एक साझा समय, एक साझा तरंग पर अगणित श्रोताओं को एकत्र करने का सामर्थ्य रखता है। यह संयोग भी उल्लेखनीय है कि भारत में एफएम प्रसारण का आरंभ भी इसी 23 जुलाई की तिथि को, 1977 में चेन्नई से हुआ था, अर्थात प्रथम प्रसारण के ठीक पचास वर्ष पश्चात उसी दिवस रेडियो ने प्रौद्योगिकी का एक नवीन अध्याय उद्घाटित किया। सामुदायिक रेडियो केंद्र आज भी दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा और जागरूकता का दायित्व निभा रहे हैं, तो 'मन की बात' जैसे कार्यक्रम उसी परंपरा को अग्रसर करते हैं जिसकी नींव 1927 में पड़ी थी, जहां शासनाध्यक्ष का स्वर सीधे नागरिक तक पहुंचता है। आपदा और आपातकाल के क्षणों में, जब विद्युत और अंतरजाल सेवाएं अवरुद्ध हो जाती हैं, तब भी बैटरी संचालित एक लघु रेडियो यंत्र भरोसे का अंतिम आश्रय बना रहता है। शतवर्षीय होने की दहलीज़ पर खड़ा भारतीय रेडियो आज भी हमें यही स्मरण कराता है कि आकाश से अवतरित होने वाली वाणी अब भी उतनी ही मूल्यवान है, केवल उसके माध्यम रूपांतरित हुए हैं।
-देवेन्द्रराज सुथार
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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