अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन साधने की कोशिश
प्रधानमंत्री की यात्रा
पिछले सप्ताह ओस्लो में आयोजित भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन, आठ बहुपक्षीय समझौतों के साथ संपन्न हुआ।
पिछले सप्ताह ओस्लो में आयोजित भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन, आठ बहुपक्षीय समझौतों के साथ संपन्न हुआ। सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की। नार्डिक क्षेत्र में उत्तरी यूरोप के डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नार्वे और स्वीडन देश शामिल हैं। यह देश भले ही जनसंख्या और क्षेत्रफल की दृष्टि से छोटे हों, लेकिन इनकी भूमिका तकनीक, नवाचार, हरित विकास, मानव विकास सूचकांक और वैश्विक कूटनीति में अहम है। ऐसे में प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को मजबूत करने और नई दिशा देने में अहम रही। नॉर्डिक देश दुनिया में हरित ऊर्जा और सतत विकास के मॉडल माने जाते हैं।
भारत का सहयोग :
भारत भी वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किए हुए है। ऐसे में इन देशों के अनुभव भारत के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। इन देशों के साथ भारत का सहयोग केवल व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमता, जलवायु परिवर्तन और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों तक विस्तारित हो रहा है। डेनमार्क पवन ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है। तो नॉर्वे जलविद्युत और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में विश्व स्तर पर अव्वल है।
इस यात्रा का उद्देश्य :
स्वीडन और फिनलैंड हरित तकनीक तथा कार्बन न्यूट्रल उद्योगों में आगे है। भारत को अपनी बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं के साथ पर्यावरण को संतुलित बनाना है। इन देशों की कंपनियां नवाचार और उच्च गुणवत्ता के लिए जानी जाती हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की इस यात्रा का उद्देश्य भारत को भरोसेमंद निवेश गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करना भी रहा। यात्रा ऐसे अवसर पर हुई जब दुनिया के अधिकांश देश एक धु्रवीयता की बजाय बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
रूस और यूक्रेन जंग :
एक ओर रूस और यूक्रेन के बीच चार साल से अधिक समय से जंग जारी है। तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच युद्ध के फिर से भड़क उठने की आशंकाएं हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की ओर से नाकाबंदी लगाई हुई है। ईरान इस मार्ग से गुजरने वाले हर व्यापारिक जहाज पर टोल वसूली करने पर अड़ा है। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकेबंदी कर रखी है। इसकी वजह से पूरे विश्व में ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला ठप पड़ी है। कच्चे तेल और गैस के दामों में भी अस्थिरता बनी हुई है।
तेजी से आगे बढ़ना :
ऐसे में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के हरसंभव प्रयासों में जुटा है। खैर, सम्मेलन में नॉर्डिक देशों ने अगले पंद्रह वर्षों में भारत में सौ अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। बदले में भारत ने इन देशों की रक्षा कंपनियों को रक्षा उद्योग गलियारे में सौ फीसदी विदेशी निवेश की पहुंच प्रदान करने का वादा किया है, जो भारत की विदेश नीति में आ रहे व्यापक बदलाव को दर्शाता है। जिसके जरिए भू-आर्थिक और प्रौद्योगिक आधारित साझेदारियों की ओर तेजी से आगे बढ़ना चाहता है।
भारत और नॉर्डिक क्षेत्र :
भारत और नॉर्डिक क्षेत्र के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 19 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है जबकि 700 से अधिक नॉर्डिक कंपनियां पहले से ही भारत में काम कर रही हैं। ऑफशोर विंड, कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तथा सॉवरिन वेल्थ कैपिटल में नॉर्वे की ताकत भारत की कार्बन घटाने की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करती है। नॉर्वे का 2 ़1 लाख करोड़ डॉलर का सॉवरिन वेल्थ फंड, जो दुनिया का सबसे बड़ा है, पहले से ही कई भारतीय कंपनियों में 34 अरब डॉलर से अधिक का निवेश रखता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण :
इसके साथ, बारह समझौते हुए जिनमें स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप, अंतरिक्ष अनुसंधान समझौता प्रमुख है। नीदरलैंड के साथ सत्रह और स्वीडन के साथ छह समझौते हुए। द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने और एआई कॉरिडोर स्थापना प्रमुख है।
नॉर्डिक देशों की यात्रा का एक बड़ा पहलू आर्कटिक क्षेत्र से भी जुड़ा है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र का रणनीतिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है। नई समुद्री व्यापारिक राहें खुल रही हैं और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच की प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। भारत ने अपनी आर्कटिक नीति भी जारी की है। वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु अध्ययन और समुद्री मार्गों के विकास में मदद मिल सकती है।
प्रधानमंत्री की यात्रा :
भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री की यात्रा का उद्देश्य भारतीय स्टार्टअप्स और नॉर्डिक तकनीकी कंपनियों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना भी है। इस यात्रा को चीन के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। यूरोप के कई देश चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहते हैं। भारत एक लोकतांत्रिक और स्थिर साझेदार के रूप में उभर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन :
भारत और नॉर्डिक देशों के बीच सहयोग अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन बनाने में सहायक हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र सुधार, जलवायु वित्त, आतंकवाद विरोध और मुक्त व्यापार जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के हित काफी समान दिखाई देते हैं। भारत अब केवल पारंपरिक शक्तियों तक सीमित नहीं रहना चाह रहा बल्कि तकनीक, हरित विकास और नवाचार में अग्रणी देशों के साथ दीर्घकालिक साझेदारी स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
-महेश चंद्र शर्मा
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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