राज काज में क्या है खास, जानें
कुछ तो गड़बड़ है
कोई बात किसी के गले उतरे या नहीं उतरे, यह सब सामने वाले पर निर्भर करता है, कि उसका गला कितना चौड़ा है, जिससे बातें आसानी से उतर सकें।
गले नहीं उतर रही बात :
कोई बात किसी के गले उतरे या नहीं उतरे, यह सब सामने वाले पर निर्भर करता है, कि उसका गला कितना चौड़ा है, जिससे बातें आसानी से उतर सकें। लेकिन हमारे सूबे में भगवा वाले कई नेताओं का गला इतना संकड़ा है कि कोई भी बात उनके गले ही नहीं उतरती, चाहे वह सौ टका सही हो। अब देखो न, बुध को एक वर्कर ने संगठन वाले भाई साहब को एक बात बताई, तो उनके गले नहीं उतरी। पार्टी के लिए सालों से पसीना बहा रहे हार्ड वर्कर की जुबान से निकला कि 28 महीने पहले तक सबकुछ हमारे पक्ष में था, लेकिन आज के हालात ने अपनी गणित बिगाड़ दी। अब वर्कर की बात को हवा में उड़ाने वाले भाई साहब के गले नहीं उतर रही।
फिर चर्चा बदलाव की :
सूबे में इन दिनों एक चर्चा फिर से जोरों पर है। इससे सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों का ठिकाना भी अछूता नहीं है। अटारी वाले भाई साहब के साथ दूसरे लीडर्स की जयपुर टू दिल्ली जर्नी के बाद चर्चा ने और भी जोर पकड़ लिया। चर्चा के बीच राज के कई खास रत्नों की नींद उड़ गई, तो लाइन में लगे कई भाइयों के पैर जमीं पर नहीं टिक रहे। चर्चा है कि कैबिनेट में रिसफलिंग के लिए माथापच्ची पूरी हो चुकी है, अब गुजराती बंधुओं के पास दिल्ली तक पहुंचे सवा दो साल के रिपोर्ट कार्ड में फिसड्डी रहे सात रत्नों की रवानगी और 12 की ताजपोशी हो सकती है। अब उन भाई साहबों की हालत खराब है, जो वास्तव में जमीं से जुड़कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के जुगाड़ के लिए न दिन देख रहे और न रात।
गलफांस बना एंक्रोचमेंट :
सूबे में इन दिनों एंक्रेचमेंट के मामले डीएलबी के साहब लोगों के गले की फांस बने हुए हंै। उनके न तो उगलते बन रहे हैं और न निगलते। वे कुछ करने की सोचते हैं, कि पॉलिटिकल एप्रोच आड़े आ जाती है। बेचारों की समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें। जिनको एंक्रोचमेंट हटाने का जिम्मा सौंपा गया है, वे खुद ही कई कदम आगे हैं। पिंकसिटी के हवामहल के द्वार के सामने वाले भवन से चर्चा निकल कर आ रही है कि बडेÞ एंक्रोचमेंट को लेकर एक्शन की फाइल तो चली थी, मगर आगे नहीं बढ़ पाई। कारण तो सबको पता है, मगर जानबूझकर चुप हैं। राज का काज करने वालों में खुसरफुसर है कि पेट वालों को दूर कर गोद वालों को तवज्जो दोगे, तो रिजल्ट भी उनके हिसाब से ही मिलेगा। अब हाथ से हाथ छुड़ा कर भगवा वालों के गले लगने वाले भाई लोगों ने भी कुछ सोच समझ कर ही कदम उठाया है। चूंकि उनको सूबे में चुनावी जंग से पहले वापस अपने पैरेंटल हाउस में लौटना है। उनके इस कदम को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
कुछ तो गड़बड़ है :
सूबे में इन दिनों भगवा वाले दल में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। तीन गुटों में बंटे लीडर अपने-अपने हिसाब से एक-दूसरे की खाई खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। दिल्ली वाले बडेÞ नेता भी अपनी फितरत के मुताबिक जान बूझकर चुप्पी साधे हैं। सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में चर्चा है कि इन दिनों जो कुछ चल रहा है, वह पार्टी के लिए कतई ठीक नहीं है। राज का काज करने वाले भी अपने हिसाब से चलने में ही भलाई समझ रहे हैं, सो हर गुट के लीडर को सलाम करते हैं। और बातों ही बातों में सामने वालों का मुंह बंद करने के लिए कागजों का पुलिन्दा तक थमा जाते हैं।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

Comment List