नए आपराधिक कानूनों के साथ न्याय की नई परिभाषा
केन्द्रित न्याय का सशक्त स्वरूप
पुलिस स्थापना दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि यह दिन भारत की पुलिस व्यवस्था के निरंतर विकास, सुधार और जनसेवा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
पुलिस स्थापना दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि यह दिन भारत की पुलिस व्यवस्था के निरंतर विकास, सुधार और जनसेवा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इस वर्ष यह अवसर इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि देश में लागू हुए नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 भारतीय न्याय प्रणाली में एक युगांतरकारी परिवर्तन का सूत्रपात कर रहे हैं। नए आपराधिक कानूनों के निर्माण और क्रियान्वयन की प्रक्रिया में देशभर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी क्रम में राजीव कुमार शर्मा, पुलिस महानिदेशक, राजस्थान की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। अपने लंबे प्रशासनिक अनुभव, कानून व्यवस्था की गहरी समझ और व्यवहारिक दृष्टिकोण के आधार पर उन्होंने इन नवीन आपराधिक कानूनों के प्रारूप को अधिक व्यावहारिक, प्रभावी और जमीनी जरूरतों के अनुरूप बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
औपनिवेशिक विरासत से आधुनिक न्याय :
नए कानूनों ने 150 वर्षों से अधिक पुराने भारतीय दंड संहिता, 1860 को प्रतिस्थापित करते हुए भारतीय सोच और मूल्यों पर आधारित न्याय प्रणाली की नींव रखी है। जहां पहले कानूनों की संरचना औपनिवेशिक मानसिकता से प्रभावित थी, वहीं अब उन्हें सरल, संक्षिप्त और समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया गया है। 511 धाराओं वाले पुराने ढांचे को घटाकर 358 धाराओं में समेटते हुए न केवल इसे अधिक व्यवस्थित किया गया है, बल्कि 20 नए अपराध जोड़कर वर्तमान समय की चुनौतियों को भी इसमें शामिल किया गया है। कई अपराधों में सजा और जुर्माने को बढ़ाकर कानून की निवारक क्षमता को भी मजबूत किया गया है। नए प्रावधानों में अपराधों को केवल परिभाषित ही नहीं किया गया, बल्कि उन्हें समाज की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप पुनर्स्थापित किया गया है। अब मॉब लिंचिंग जैसे जघन्य अपराधों को स्पष्ट रूप से चिन्हित कर कठोरतम दंड का प्रावधान किया गया है। आतंकवादी कृत्यों की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के सभी आयामों को समाहित किया गया है। राजद्रोह जैसे औपनिवेशिक शब्द को हटाकर देशद्रोह के रूप में पुनर्परिभाषित किया गया है, जो भारत की एकता और अखंडता को सीधे संबोधित करता है। छीनाझपटी जैसे अपराधों को भी गंभीर श्रेणी में लाकर यह संदेश दिया गया है कि आम नागरिक की सुरक्षा सर्वोपरि है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में सख्त दंड का प्रावधान इस दिशा में एक मजबूत कदम है।
न्याय प्रक्रिया में गति और दक्षता :
न्याय में देरी को न्याय से वंचित होना माना जाता है और इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। अब मामलों में आरोप तय करने की समय सीमा निर्धारित की गई है और निर्णय देने की प्रक्रिया को भी समयबद्ध बनाया गया है, जिससे वर्षों तक लंबित रहने वाले मामलों की समस्या कम होगी। छोटे मामलों के लिए समरी ट्रायल की व्यवस्था न्यायालयों पर भार कम करेगी और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से पूछताछ एवं सुनवाई की सुविधा न्याय को तकनीकी रूप से अधिक सुलभ और तेज बनाएगी। नए कानूनों में नागरिकों को केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली में सक्रिय भागीदारी का अवसर भी दिया गया है। अब कोई भी व्यक्ति कहीं से भी ई एफआईआर दर्ज करा सकता है, जिससे क्षेत्राधिकार की बाध्यता समाप्त हो गई है। एफआईआर की निःशुल्क प्रति प्राप्त करना, जांच की प्रगति की समयबद्ध जानकारी पाना और पीड़ितों के लिए मुफ्त चिकित्सा एवं मुआवजे का प्रावधान, ये सभी कदम आमजन के विश्वास को मजबूत करते हैं। गवाह संरक्षण योजना के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया है कि न्याय प्रक्रिया में सहयोग करने वाले व्यक्ति भयमुक्त होकर सामने आ सकें।
केन्द्रित न्याय का सशक्त स्वरूप :
नए आपराधिक कानूनों का सबसे मानवीय पक्ष यह है कि इनमें पीड़ित को केंद्र में रखा गया है। अब न्याय केवल अपराधी को दंडित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित को सम्मान और अधिकार देने पर भी समान रूप से ध्यान दिया गया है। मुकदमा वापस लेने से पहले पीड़ित की सुनवाई अनिवार्य करना, महिला पीड़िता के बयान के लिए संवेदनशील प्रावधान और समयबद्ध चिकित्सा जांच,ये सभी उपाय न्याय को अधिक संवेदनशील और मानवीय बनाते हैं। पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भी व्यापक बदलाव किए गए हैं। तलाशी और जब्ती के दौरान वीडियोग्राफी अनिवार्य कर दी गई है, जिससे कार्यवाही की निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके। गिरफ्तारी के मामलों में भी संतुलन लाते हुए वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति को आवश्यक बनाया गया है। इन सुधारों से पुलिस और जनता के बीच विश्वास का रिश्ता और मजबूत होगा। हर साल 16 अप्रैल को भारत में पुलिस बल की स्थापना और उनके योगदान को याद करने के लिए पुलिस स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस दिन पुलिस विभाग अपने कर्तव्यों में उत्कृष्टता दिखाने वाले अधिकारियों और कर्मियों को सम्मानित करता है। भारत की न्याय प्रणाली अब उस दिशा में अग्रसर है, जहां हर नागरिक को समय पर न्याय मिले, हर पीड़ित को सम्मान मिले और हर संस्था जवाबदेह बने।
-प्रकाश चंद्र शर्मा
यह लेखक के अपने विचार हैं।

Comment List