होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली में प्रचलित भ्रान्तियां एवं वास्तविक तथ्य
स्थायी छुटकारा मिल जाता है
होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली के भीष्म पितामह, मील के पत्थर व जनक डॉ. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सेमुअल हैनीमेन जी की 271वीं जयंती, सम्पूर्ण होम्योपैथिक जगत में विश्व होम्योपैथिक दिवस के रूप में मनाई जा रही है।
होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली के भीष्म पितामह, मील के पत्थर व जनक डॉ. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सेमुअल हैनीमेन जी की 271वीं जयंती, सम्पूर्ण होम्योपैथिक जगत में विश्व होम्योपैथिक दिवस के रूप में मनाई जा रही है। यह एक सर्व कालिक, सुग्राही, जानी मानी चिकित्सा पद्धति है, जो की आज के समय में किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, जिसने पूरे विश्व में कोरोना काल की विषम व दुरूह परिस्थितियों में भी अपनी सफलता का डंका बजवाया, परचम फहराया व लोहा मनवाया है। यद्धपि होम्योपैथी एक स्थायी, सुरक्षित, सम्पूर्ण व पूर्णतया भरोसेमंद चिकित्सा पद्धति है व पूरे विश्व में लगभग 81 देशों के 50 करोड़ से ज्यादा लोग इस पर भरोसा करते हैं व इसे आम आदमी की चिकित्सा पद्धति कहा जाता है जो सहज, सरल व सस्ती होने के साथ जीवन दायिनी व संजीवनी भी है।
स्थायी छुटकारा मिल जाता है :
सामान्यतः इसका कोई भी दुष्कर व विपरीत प्रभाव नहीं होता तथा रोगी द्वारा बताई गई बीमारी व लक्षणों के इतिहास व रोग को जान कर उसका सफलता पूर्वक इलाज किया जाता है जो कि, खिलाड़ियां, बच्चों, बुजुर्गो, गर्भवती महिलाओं, बच्चों, युवाओं पर कारगर है व श्ल्य चिकित्सा की कई गम्भीर बीमारियों में भी कारगर हैं। होम्योपैथी ऐसी बीमारीयों व लक्षणों का विशेष रूप से ईलाज करने में सहायक है जिनका मूल कारण अज्ञात होता है। होम्योपैथी किसी रोग का नहीं बल्कि सम्पूर्ण रोगी का ईलाज करती है। मरीज के गुण, अवगुणों व लक्षणों को प्रधानता दी जाती है। होम्योपैथिक चिकित्सा प्रणाली ने सम्पूर्ण चिकित्सा के क्षेत्र में सफलतापूर्वक अपनी एक अलग व मजबूत पहचान बना ली है। ये पद्धति पूर्णत सत्यता पर आधारित है व बहुत अच्छे सफलता के अनुभव करवाती है तथा कुशल व पंजीकृत चिकित्सक से ईलाज करवाने पर मरीज को पूर्ण रूप से व जड़ से बीमारी से स्थायी छुटकारा मिल जाता है।
होम्योपैथी चिकित्सा प्रणाली :
आज भी सस्ती व हानि रहित होम्योपैथी चिकित्सा प्रणाली जरूरतमंदो, गरीबों व असहायों के लिए रामबाण व वरदान साबित हुई है। विगत लगभग 229 वर्षों से ये सर्वत्र सफलता पूर्वक आज के आधुनिक युग में अपना प्रचार-प्रसार कर रही है मगर इसके इतर आज भी इस पद्धति के लिए कई मिथक, भ्रांतियां, के बारे में विस्तार पूर्वक व तथ्यपरक रूबरू करवाया है :- विशेष परिस्थितियों व आपातकाल में मरीज दूसरी पद्धतियों को व उनकी औषधियों को अपना सकता है व तदुपरांत पुनः होम्योपैथिक चिकित्सा आरम्भ कर सकता है व कुछ विशेष किस्म के मरीजों में तो दो-तीन पैथी की दवाईयां एक साथ चल सकती हैं। सामान्यतः हर केस में ऐसा नहीं होता, मरीज कई बार पुराने कई रोगों के साथ दूसरी विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों से परेशान होकर आता है, अतः कभी बीमारियों व विशेषकर त्वचा जनित बीमारीयों में रोग व लक्षण दब जातें हैं व सुसुप्त व छिपी हुई अवस्था में चले जाते हैं तो ईलाज के दौरान कई बार दबे हुए/छिपे हुए लक्षण पुनः अपने आप उभर आतें हैं, मगर उनके पूर्णतया निकल जाने के बाद व होम्योपैथिक इलाज से रोगी पूर्णतया ठीक हो जाता है।
बीमारी व रोगानुसार :
मुख्य परहेज इसमें बीमारी का व रोगानुसार बताया जाता है ना की विशेष व सम्पूर्ण चीजों का, होम्योपैथिक दवाईयां जीभ के द्वारा अवशोशित होती है इसलिए मुख्य परहेज सिर्फ ये है कि हर डोज/दवाई के सेवन के समय से 10 मिनट पूर्व व 10 मिनट बाद जीभ का साफ होना अत्यावश्यक है। इन छोटी-छोटी गोलियों में शक्कर की मात्रा, काफी कम व अल्पतम के बराबर होती है फलस्वरूप कोई नुकसान नहीं होता फिर भी विशेष परिस्थितियों में ऐसे मरीजों को दवाई तरल अवस्था/ मात्र द्रव को पानी में मिलाकर दिया जाता है। दवाईयां उदासीन, निष्क्रिय व एल्कोहल की अल्पमात्रा से बनायी जाती हैं,जिसमें एल्कोहल का प्रभाव खत्म हो जाता है जो कि पूर्णतया हानि रहित होता है। ये ही एक मात्र पद्धति है जिसमें सभी होम्योपैथिक दवाईयों का प्रयोग व परीक्षण, स्वस्थ मनुष्यों पर करके उनसे प्राप्त लक्षणों को इस चिकित्सा का आधार बनाया जाता है व परीक्षण हर आयु व वर्ग के नर व नारी पर किया जाता है। ये पूर्णतया प्रमाणिक दवाईयां होती है जो स्वस्थ्य मनुष्यों पर प्रमाणिक है व उन पर सिद्ध की जाती हैं व दवाईयों का प्रमाणीकरण होने के बाद ही उन्हें प्रयोग में लाया जाता है। ऐसा नहीं है सभी लक्षणों की यदि सही पहचान कर ली जाये तो गोली, गोली की तरह काम करती है व इसमें मरीजों से प्राप्त लक्षणों के आधार पर दवायी दी जाती है बस लक्षण की सही पहचान व दवाई का सही चयन होना चाहिए।
अपातकालीन परीस्थितियों में :
ज्यातर बीमारीयों में रोगी होम्योपैथिक चिकित्सक के पास पुरानी/असाध्य व कई बीमारीयों में लंबे इतिहास के साथ उपचार के लिए आता है, अतएव उसके इलाज में काफी अधिक समय लगता है व कई बीमारीयों में तो दूसरी पैथी की दवाईयों के दुष्प्रभाव को भी हटाना पड़ता है अतः समय लगना स्वभाविक है। कई त्वरित बीमारियों जैसे- खांसी, सर्दी, जुकाम, बुखार, एलर्जी, पेटदर्द, सिरदर्द, पित्ती, त्वचा जनित बीमारियां में तुरंत, त्वरित असर दिखता है। गोलियां, तरल अवस्था व और भी दूसरी अवस्थाओं में मिलती हैं जो कि कुछ देखने में समान हो सकती हैं,मगर इस पद्धति में प्रत्येक रोगी के लिए उसकी दवाई का चयन उसके रोग के आधार पर ना होकर उसके लक्षणों, स्वभाव व व्यक्तित्व के आधार पर किया जाता है। हर मरीज का व्यक्तित्व अलग होता है अतः समान रोग निदान होने पर भी हर एक रोगी की दवाई भिन्न-भिन्न होती हैं। ट्रोमा-सर्जरी, एक्सीडेंट व अपातकालीन परीस्थितियों के संदर्भ में कोई दूसरी पद्धति हो सकता है ज्यादा कारगर हो मगर गंभीर बीमारीयों के ईलाज में होम्योपैथी भी काफी अच्छा असर दिखाती है। यह त्वचा, फेंफड़े, जोड़ो, पथरी, अस्थमा व ऑटो इम्यून डिसऑर्डर जैसी बीमारीयां तथा इन जैसी कई अन्य बीमारीयों में भी काफी उपयोगी व सफल सिद्ध हुई है। होम्योपैथी का सम्पूर्ण कोर्स अंग्रेजी भाषा माध्यम द्वारा ही उत्तीर्ण किया जाता है, इसके लिए उपाधिधारी तथा मंडल द्वारा पंजीकृत चिकित्सक होना जरूरी है। ये गोलियां निष्क्रिय व निष्क्रिया शील एल्कोहल द्वारा बनायी जाती है फलस्वरूप ये एक त्वरित चालक व क्रियाशील वाहक की तरह काम करती हैं।
-प्रो. राजीव सक्सेना
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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