राज काज में क्या है खास, जानें
पैदा हुई गलतफहमी
सूबे की राजनीति इन दिनों पूरी तरह भक्तिकाल में प्रवेश कर चुकी है।
नेताओं की बदली दिनचर्या :
सूबे की राजनीति इन दिनों पूरी तरह भक्तिकाल में प्रवेश कर चुकी है। मंत्रीमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों की सुगबुगाहट ने नेताओं की दिनचर्या बदल दी है। जो नेता पब्लिक के बीच विकास की बातें कर रहे थे, वे अब मंदिरों, धामों और आकाओं के दरबारों में ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। कोई बालाजी के धोक लगा रहा है, तो कोई दिल्ली दरबार में हाजरी लगा रहा है। हर लीडर को भरोसा है कि इस बार उपर से उसका नाम तय है, फर्क सिर्फ इतना है कि किसी का उपर भगवान है और किसी का संगठन। समर्थकों ने भी सोशल मीडिया पर बधाइयों की पोस्ट पहले से ही तैयार कर रखे हैं, मानों शपथ ग्रहण बस मौसम विभाग की घोषणा भर बाकी है। तीन गुटों में बंटे बड़े नेताओं की दिल्ली यात्राओं के बाद राजनीति का यह आध्यात्मिक मौसम बड़ा दिलचस्प बन गया। यह आस्था, महत्वाकांक्षा और गणित तीनों साथ चलते है। आखिर कुर्सी भी आजकल किसी वरदान से कम थोड़े ही है।
चर्चा में अच्छे दिन :
हमारे सूबे के पीएम ने तेल बचाने की अपील क्या की, कई लीडर्स में सुर्खियों में आने की हौड मच गई। दिखावे के लिए कोई बस में सफर कर रहा है, तो कोई रेल में। बीकाजी वाले भाई साहब ने तो ई-रिक्शा की सवारी कर सूर्खियां लूट ली। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि सूबे में साहब की अपील का सबसे ज्यादा असर खाकी वालों पर हुआ, जो अब बदमाशों को साइकल से पकड़ेगी। लगता है अपराधियों के अच्छे दिन खत्म और पंचर वालों के चालू हो गए और तो और पुलिस की रणनीति भी पर्यावरण मित्र हो गई, ना पेट्रोल का खर्च और ना ही गाड़ी का टेंशन। बस एक हाथ में डंडा और दूसरे में घंटी। अब पब्लिक भी कह सकेगी कि पुलिस वाकई ग्राउंड लेवल पर काम कर रही है।
बेशर्म और बेईमान मित्र :
सूबे में इन दिनों बेशर्म और बेईमान मित्रों को लेकर काफी खुसरफुसर है। हो भी क्यों ना, मामला शिक्षा महकमा संभालने का अनुभव रखने वाले दो लीडर्स से ताल्लुक रखता है। नीट पेपर लीक प्रकरण में शिक्षा महकमे के अनुभवी हाथ वाले भाई साहब ने जाति और खास होने का दावा किया, तो हलचल होना स्वाभाविक था। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में खुचरफुसर किए बिना नहीं रहे और तो और अभी शिक्षा का जिम्मा संभाल रहे भगवा वाले भाई साहब ने भी टिप्पणी करने में कोई कंजूसी नहीं की। हाड़ौती वाले भाई साहब ने लक्ष्मणगढ़ से ताल्लुक रखने वाले गोविन्दजी को खुद का बहुत अच्छा मित्र भी बता दिया और बेशर्म और बेईमान का तमगा भी दे दिया।
पैदा हुई गलतफहमी :
गलतफहमी तो गलतफहमी है, यह किसी के भी हो जाती है और जिसके हो जाती है, वह जल्दी से दूर भी नहीं होती है, चाहे कोई भी कितने ही जतन कर लें। अब देखों ना, ढाई साल में ही हमारे सूबे के कई ब्यूरोक्रेट्स के गलतफहमी पैदा हो गई, राज ने भी दिन-रात कई जतन कर लिए, लेकिन वह निकलने का नाम ही नहीं ले रही। कुछ ब्यूरोक्रेट्स को गलतफहमी यह हो गई कि अटारी वाले भाई साहब के राज में हमने इतना बढ़िया काम कर लिया कि अगली लिस्ट में उनको बढ़िया कुर्सी मिलने से कोई नहीं रोक सकता। अब इनको कौन समझाए कि कुर्सी मिलने का पैमाना काम ही होता, तो कई अच्छे ब्यूरोक्रेट्स टीम से बाहर नहीं होते, चूंकि राज के रत्नों की पारखी नजरों में भी तो फिट बैठने की काबिलियत हो।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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