राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है साहित्य
सृजन तथा संघर्ष की भाषा
आतंकवाद, राष्ट्रवाद और उपभोक्तावाद के शोर में आजकल साहित्य का उद्देश्य एक गहरे संकट में है।
आतंकवाद, राष्ट्रवाद और उपभोक्तावाद के शोर में आजकल साहित्य का उद्देश्य एक गहरे संकट में है। संवेदना और समय का सच हाशिए पर खड़ा है। अकेला लेखक बाजार के चक्रव्यूह में फंसा है। तब से अब तक हमारे और साहित्य के बीच निश्चय ही बहुत कुछ बदल गया है। इस अर्थ में यह समय बेहद जटिल है और निर्मम है, क्योंकि साहित्य ने अपने लिए मानसिक अवस्थाओं और भावों का क्षेत्र चुन लिया हैं। हम जीवन में जो कुछ देखते हैं या जो कुछ हम पर गुजरती है, वही अनुभव और वही चोटें कल्पना में पहुंचकर साहित्य सृजन की प्रेरणा बनती है।
व्यक्तिवाद और आत्ममुग्धता :
कवि या साहित्यकार में अनुभूति की जितनी तीव्रता होती है उसकी रचना उतनी ही आकर्षक और ऊंचे दर्जे की होती है। लेकिन साहित्य में लेखक की स्थिति आज इसके ठीक उलट है तथा साहित्यकार न तो मीरां बाई की तरह राजपाट छोड़ रहा है और न ही अंधेरे बंद कमरों की खिड़कियां खोल रहा है। एक व्यक्तिवाद और आत्ममुग्धता से वह इस तरह पीड़ित है कि उसने अपने भीतर सुख सुविधाओं के सपनों का जाल बुन लिया है।
साहित्यकार की स्वतंत्र चेतना :
साहित्यकार की स्वतंत्र चेतना का क्षरण हो चुका है। अपने हक के पारिश्रमिक की जगह वह अपने पैसे देकर अपनी पुस्तकें छपवा रहा है। यह एक सच है कि मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य का जो उद्देश्य और प्रतिमान स्थापित किया था वह कुछ अपवादों को छोड़कर लेखक की संरचना से नदारद है। जिस तरह पुराने जमाने में समाज की लगाम मजहब के हाथ में थी। मनुष्य की आध्यात्मिकता और नैतिक सभ्यता का आधार धार्मिक आदेश था।
विचारधारा की टोपियां :
वह भय या प्रलोभन से काम लेता था, पुण्य पाप के मसले उसके साधन थे। आज इसी तरह की समझ के साथ लेखक प्रायः सभी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिदृश्य से गायब होता जा रहा है। उसने शुतुरमुर्ग की तरह कुछ ऐसा समझ लिया है कि मैदान छोड़कर भागने से ही दुनिया बदल जाएगी और किसी दूसरे के मरने से ही उसे स्वर्ग मिल जाएगा। एक ही विचारधारा की टोपियां पहनकर लेखक समुदाय अनेकानेक संगठनों, गुटों और श्रेणियों में विभाजित हो गया है।
एक विभाजित मानसिकता :
लेखक बिरादरी में विचारधारा और सामाजिक सरोकारों की जगह सब कुछ जोड़तोड़ में बदल गया है तथा लेखक संगठन भी प्रति क्रांति के उपनिवेश बन गए हैं। वस्तुतः प्रेमचंद ने साहित्य का उद्देश्य बताते हुए जिस महान अंर्तदृष्टि का एक लेखक के लिए भाषा, शिल्प और सामाजिक सौन्दर्यशास्त्र का तानाबना प्रस्तुत किया था और सज्जाद जहीर ने जिसे परवान चढ़ाया था वह पूरा सपना आज एक विभाजित मानसिकता के दौर से गुजर रहा है।
साहित्य की परिभाषा :
लेखक अब खुलकर बोलता नहीं है। इस तरह हमारे समय की सांस्कृतिक जागरूकता पूरी तरह खुली छत पर सो रही है और नींद में चल रही है। हम साहित्य की परिभाषा को जानते हुए जीवन की आलोचना क्यों नहीं लिख रहे हैं। साहित्य का उद्देश्य हमें यही तो बताता है कि भाषा साधन है, साध्य नहीं है। अब हमें आगे निकलकर शास्त्र और विज्ञान के प्रश्नों की विवेचना भी करनी चाहिए, क्योंकि लेखक अपनी संवेदना और अनुभूति के सरोकारों से बनता है और किसी के द्वारा बनाया नहीं जाता है।
विचारधाराएं और व्यवस्थाएं :
इसलिए ऐसा कोई मनुष्य नहीं है,जो असुंदर, अभद्र और मनुष्यता से रहित सामाजिक आर्थिक असमानता पर चोट नहीं करे, क्योंकि समाज ही लेखक की अदालत है और प्राकृतिक न्याय की पाठशाला है। शब्द की साधना ही उसका पहला फर्ज है। मुझे लगता है कि इस शताब्दी में जब सभी तरह की विचारधाराएं और व्यवस्थाएं अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं, तब लेखक को भी भीतरी और बाहरी संघर्ष यात्रा को धार देनी चाहिए।
विचार शक्ति का अभाव :
क्योंकि लेखक का तटस्थ रहना भी उसका एक अपराध है। लेखक को एक बार यह तय करना चाहिए कि वह किसके साथ है। साहित्य की विकास चेतना में महत्व इस बात का नहीं है कि आप कहां है अपितु महत्व इस बात का है कि आप क्या कर रहे हैं, यह हमारे समय की एक ऐसी दारूण कथा हैं जिसमें महानगर का लेखक ग्रामीण अंचलों के रचनाकारों की उपेक्षा कर रहा है और हॉलीवुड के दंगल में रंगमंच पिट रहा है। हम साहित्यकारों में कर्म शक्ति और विचार शक्ति का अभाव है।
महत्व और सम्मान :
हम नाम, यश, महत्व और सम्मान की छोटी छोटी लड़ाइयां लड़ रहे हैं। अपने समय को तो क्या,अपने गिरहबान तक को नहीं देख रहे हैं। अतः हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो और जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं, क्योंकि अब ज्यादा सोना मूर्खता का लक्षण है।
सृजन तथा संघर्ष की भाषा :
आज लेखक को समय की चेतावनी पढ़नी चाहिए, क्योंकि हमारा समाज और लेखक साहित्य के सभी आदर्श उद्देश्यों को अब भूलता जा रहा है तथा कौरव दल की तरह सामाजिक संस्कृति के सभी मोर्चों से विलुप्त होता जा रहा है। उसका कहीं कोई दखल नहीं है क्योंकि वह अपनी एकता और विश्वसनीयता को खोने पर आमादा है। विचारधारा की महाभारत में भगोड़ों की अराजकता है और आम रचनाकार सृजन तथा संघर्ष की भाषा छोड़कर सुविधा सम्पर्क और साधनों की बैसाखियां लेकर सामाजिक परिवर्तन और न्याय के पर्वत पर चढ़ रहा है।
राजनीति के आगे चलने वाली मशाल :
ऐसे में अपने आप से कभी पूछिए कि समय के इस वर्तमान में आप कितने प्रासंगिक हैं। ऐसे में साहित्य और आत्ममुग्ध नायिकाओं को बदलते समय के आइने में अपने यथार्थ को जानना चाहिए, क्योंकि पहचान, मान्यता, स्थापना और स्मरणीय बनने की उसकी साहित्यिक महत्वकांक्षा में शॉर्टकट का कहीं कोई स्थान नहीं है। इसलिए अमर कथाकर प्रेमचंद ने साहित्य का उद्देश्य बताते हुए यह कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।
-वेदव्यास
यह लेखक के अपने विचार हैं।

Comment List