विजय, बालेन और केजरीवाल : दक्षिण एशिया में आउटसाइडर राजनीति का नया चेहरा
शासन चलाने के लिए प्रशासन, नीति, वित्तीय अनुशासन और संगठन चाहिए
सी जोसेफ विजय ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर दक्षिण एशिया में आउटसाइडर राजनीति की बहस तेज की। पार्टी ने पहली बार में सत्ता हासिल की। विजय की तुलना अरविंद केजरीवाल और बालेंद्र शाह से हो रही।
तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने थलापति विजय के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बार फिर आउटसाइडर नेतृत्व की बहस तेज हो गई है। सी जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कषगम ने अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में द्रमुक-अन्नाद्रमुक के लंबे प्रभुत्व को चुनौती देते हुए सत्ता का रास्ता बना लिया। विजय ने चेन्नई में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उनके साथ नौ मंत्रियों ने भी शपथ ली। विजय की इस उछाल की तुलना अब दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह यानी बालेन शाह से की जा रही है। तीनों की राजनीति का मूल सूत्र एक जैसा दिखता है, परंपरागत राजनीतिक परिवारों से बाहर आना, पुरानी पार्टियों को चुनौती देना और युवा/ शहरी मतदाता के बीच बदलाव की भाषा बोलना। बालेन शाह इसका सबसे ताजा अंतरराष्ट्रीय उदाहरण हैं। पूर्व रैपर, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और काठमांडू के पूर्व मेयर शाह ने मार्च 2026 में नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। एपी के अनुसार वे 35 वर्ष की उम्र में नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने और उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में लगभग दो -तिहाई सीटें जीतीं। केजरीवाल का मॉडल इन दोनों से उम्र और समय के लिहाज से अलग है, लेकिन राजनीतिक शैली में समानता स्पष्ट है। अन्ना आंदोलन से निकले केजरीवाल ने 2012 में आम आदमी पार्टी बनाई, 2013 में दिल्ली की राजनीति में प्रवेश किया और शीला दीक्षित जैसी स्थापित नेता को हराकर सत्ता तक पहुंचे। आप स्वयं अपने गठन को इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से निकली राजनीतिक धारा बताती है। इन तीनों उदाहरणों में राजनीति सिर्फ संगठन की नहीं, प्रतीक की भी है। विजय ने फिल्मी लोकप्रियता को वोट में बदला, बालेन शाह ने रैप और मेयरशिप से बनी युवा छवि को राष्ट्रीय जनादेश में बदला और केजरीवाल ने भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन को पार्टी-संगठन में बदला। तीनों ने पुरानी राजनीति बनाम नया चेहरा की रेखा खींची।
फिर भी बड़ी चुनौती अब शुरू होती है। आउटसाइडर होना सत्ता पाने में मदद कर सकता है, लेकिन शासन चलाने के लिए प्रशासन, नीति, वित्तीय अनुशासन और संगठन चाहिए। जनता बदलाव के नाम पर सत्ता देती है, लेकिन टिकाऊ भरोसा परिणामों से बनता है। विजय और बालेन अभी परीक्षा की शुरुआत में हैं, केजरीवाल का अनुभव बताता है कि सिस्टम बदलने का नारा अंततः खुद सिस्टम के भीतर कठोर परीक्षण से गुजरता है।

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