राज काज में क्या है खास, जानें
अच्छा-बुरा दौर
हमारे सूबे के ब्यूरोक्रेट्स भी कमाल के हैं और राज के खास हों, तो फिर कहना ही क्या, उनके पैर जमीन पर कम ही टिकते हैं।
कमाल के हैं ब्यूरोक्रेट्स :
हमारे सूबे के ब्यूरोक्रेट्स भी कमाल के हैं और राज के खास हों, तो फिर कहना ही क्या, उनके पैर जमीन पर कम ही टिकते हैं। मरु प्रदेश में राज की मंशा भांपने वाले ब्यूरोक्रेट्स की संख्या भी उंगलियों पर है, बाकी अपने काम से काम रखते हैं। अब देखो न, पहले वाले राज के खास रहे तुला राशि वाले साहब ने अपनी राय से जिलों की संख्या 50 करवा कर वाहवाही लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, उस समय उनकी टीआरपी बढ़कर टॉप लेवल तक पहुंच गई थी। तो इस राज में भी मेष राशि वाले साहब ने जोड़-बाकी और गुणा-भाग कर जिलों की संख्या 9 घटवा कर सुर्खियों में आने में कोई कसर नहीं छोड़ी। खुद की पब्लिसिटी के लिए देर रात तक खबरनवीशों तक बिना पूछे ही आगे बढ़कर खूब बोले। अब राज के हिसाब से रिजल्ट देने वाले ब्यूरोक्रेट्स की पॉवर को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
अच्छा-बुरा दौर :
इन दिनों सूबे में अच्छे-बुरे दौर को लेकर बहस छिड़नी शुरू हो गई। बहस करने वाले न कोई समय देख रहे और न स्थान। श्मशान तक में बहस करने में कंजूसी नहीं बरतते। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने के साथ ही भारती भवन भी इससे अछूता नहीं है। राज का काज करने वाले भी आधे से ज्यादा वक्त बहस में गुजार रहे हैं। बहस इस बात की है कि इस समय अच्छा दौर किसका चल रहा है। बड़ी चौपड़ से लेकर इंदिरा गांधी भवन तक बहस छिड़ी है कि मामला इन फेवर आॅफ भजन जी एण्ड अगेंस्ट एनी लीडर है, बीच में किसी का कोई लेना देना नहीं। जो एनी लीडर के पक्ष में हैं, वो सबके पास जाएंगे और जो अटारी वाले भाई साहब के फेवर में हैं, वो कहीं नहीं जाएंगे। अब उनको कौन समझाए कि राज में जो होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वो होता नहीं है।
संकट हाथ वालों का :
मरु प्रदेश में इन दिनों सबसे ज्यादा संकट में हाथ वाले भाई लोग हैं। वे अटारी वाले भजनजी भाई साहब के तुरुप के पत्ते को न तो निगल पा रहे हैं और नहीं उगल पा रहे हैं। किसी के सामने खुल कर जुबान भी नहीं खोल पा रहे। और तो और खुद की जाजम पर भी एक साथ बैठने से पहले अगल-बगल वालों को घूर कर देख रहे हैं। अब देखो न ढाई साल बाद भी सदर का जहाज हवा में हिचकोले लेते नजर आ रहा है। सदर भी कुछ ज्यादा ही युवा नजर आने की कोशिश में जुटे हैं, जिनका मन पिंकसिटी में ही रमता है। अब हाथ वाले भाई लोगों को कौन समझाए कि शहरों के साथ गांवों की सरकार के चुनावों में ज्यादा सफलता दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही। यदि ऐसा हुआ, तो पार्टी एक बार फिर अपनी हार के मुहाने पर खड़ी दिख रही है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि हार्ड कोर वर्कर्स को लेकर है। जुमला है कि गुजरे जमाने में भगवा वाली पार्टी के किसी फंक्सन में 100 वर्कर्स को बुलाया जाता था, तो केवल 20 आते थे। 13 साल पहले तक इनकी संख्या 30 तक हो गई। केन्द्र में भगवा वालों का राज आया, तो एकाएक इनकी संख्या बढकर 70 तक पहुंच गई। यूपी में राज आने के बाद 100 के बुलाने पर आने वालों की संख्या 500 तक पहुंच गई, लेकिन इस भीड़ में बेचारे वे 20 हार्डकोर वर्कर लास्ट लाइन में पहुंच गए। ये जो 480 इंपोर्टेड वर्कर, इतने सक्रिय हो गए, जैसे उनके दादा जनसंघ के समय संस्थापक सदस्य रहे हों। और बेचारे वो 20 शांत होकर घर बैठ गए, चूंकि वो न्यू इंपोर्टेड वर्कर्स की तरह नोटंकी कर नहीं सकते।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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