राज काज में क्या है खास, जानें

बेहाल हैं दो लाल

राज काज में क्या है खास, जानें

भगवा वाली मैडम ने अपना मुंह क्या खोला, कई भाई साहबों की नींद उड़ गई।

नींद उड़ी भाई साहबों की :

भगवा वाली मैडम ने अपना मुंह क्या खोला, कई भाई साहबों की नींद उड़ गई। उडे़ भी क्यों नहीं, मैडम में जो कुछ बोला, वह दिल से बोला है और हार्ड कोर वर्कर्स की वकालात की है। सबसे ज्यादा नींद तो उन लोगों की उड़ी है, जो हाथ से हाथ छोड़कर कमल की सुगंध लेने आए हैं और अपने हुनुर से दिल्ली दरबार में नंबर दो वाले भाई साहब से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले हार्ड कोर वर्कर्स में चर्चा है कि घर का पूत कुंवारा डोले, पड़ोसी के फेरे, वाली कहावत चरितार्थ करने से नुकसान के सिवाय कुछ भी हाथ लगने वाला नहीं है। चूंकि जो खुद के घर वालों के सगे नहीं, उनसे उम्मीद करना ठीक नहीं। अब मैडम के इशारे को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।

बेहाल हैं दो लाल :

सूबे में इन दिनों भगवा वाले दल में जो उबाल आया हैं, उसको लेकर कई बड़े भाई साहबों के ललाट पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी है। वे तो चैन से खा पा रहे हैं और नहीं पी पा रहे हैं। गोलमाल के चक्कर में दिल्ली दरबार की नजरों से छोटी-मोटी कुर्सी तक हासिल नहीं कर सकें। जब से मोटा भाई के साथ छोटा भाई के पास रिपोर्ट कार्ड पहुंचा है, तब से राज के दो लाल तो दिन रात भाई साहब के आशीर्वाद की दुआई देते नहीं थकते। अब इनको कौन समझाए कि गोलमाल को लेकर गुजराती बंधुओं के उवाच ने तो मराठी बाबू तक का मुंह बंद कर दिया था।

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मालाओं को लेकर तनी भौहें :

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फूल मालाओं पर हक को लेकर खादी और खाकी वालों के बीच भौहें तन गई। तनातनी भी लाजमी है, चूंकि खादी वाले इन पर सिर्फ अपना हक जताते हैं। दूसरा कोई उन पर हक जताए तो उनका हाजमा बिगड़ जाता है। खाकी वाले एक साहब पिछले दिनों तूफानी दौरे पर निकले, तो जगह-जगह उनका खादी वालों की तरह स्वागत सत्कार हुआ। उन्हें फूल मालाओं से लादा गया, यहां तक कि उनके साथ फोटो खिंचवाने तक की होड़ मची। यह सुन इलाका के नेताजी का हाजमा बिगड़ गया और आनन-फानन में राज के कानों तक बात पहुंचाई कि राज का काज करने वालों को यह शोभा नहीं देता। लिहाजा इस पर आगे के लिए ब्रेक लगाया जाए। अब राज का काज करने वालों में चर्चा है कि आखिर मालाओं पर हक किसका है।

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ळम नहीं तो कोई नहीं :

सूबे में इन दिनों हाथ वाली पार्टी में एक संदेश तेजी से फेल रहा है। संदेश भी हम नहीं तो कोई नहीं का है। ढाई साल से कोई तालमेल नहीं बैठते देख दुखी हार्ड कोर वर्कर्स ने संदेश के सहारे यह सोच कर पॉलिटिक्स शुरू की, कि शायद कोई सुलह हो जाए, पर दोनों और से कोई भी सुलह को तैयार नहीं हैं। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में बतियाते हैं कि सूबे में मजबूत विपक्ष कहां गायब हो गया। आखिर राज के रत्नों पर नजर रखने वाला तो कोई हो, जिनकी बीस अंगंलिया घी में डूबी हुई है।

एक जुमला यह भी :

सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि वर्दी और बिना वर्दी वालों के अंतर को लेकर है। बड़ी चौपड़ से चालू हुआ यह जुमला पीएचक्यू होता हुआ, सचिवालय तक जा पहुंचा। जुमला है कि कानून का काम कानून की रक्षा करना होता है, लेकिन सूबे में तो लगता है, जैसे कानून खुद ही प्रॉपर्टी डीलिंग में उतर आया हो। कहीं कब्जे की कहानी, कहीं नोटिस का खेल और कहीं समझौते की न्यू डेफिनेशन। सब कुछ इतना व्यवस्थित है कि कोई प्राइवेट कंपनी भी शरमा जाए।

-एल. एल. शर्मा

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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