जंगलों की कीमत पर भविष्य के सपने

जीवन की सुरक्षा का प्रश्न

जंगलों की कीमत पर भविष्य के सपने
भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास की तेज रफ्तार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है।

भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास की तेज रफ्तार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। एक ओर देश विश्वस्तरीय आधारभूत संरचना, बंदरगाह, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर और खनन परियोजनाओं के माध्यम से आर्थिक शक्ति बनने का सपना देख रहा है, वहीं दूसरी ओर इन्हीं परियोजनाओं की कीमत हमारे जंगल, नदियां, मैंग्रोव, वन्यजीव और स्थानीय समुदाय चुका रहे हैं। हाल ही में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति द्वारा विशाल वन क्षेत्र को राष्ट्रीय राजमार्ग और बंदरगाह संपर्क परियोजना के लिए स्वीकृति देना इसी विरोधाभास का ताज़ा उदाहरण है। इसे राष्ट्रीय राजमार्गों और महानगरों से जोड़ने के लिए बहु-लेन एक्सप्रेसवे तथा संपर्क मार्ग विकसित किए जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि इससे व्यापार, निर्यात, रोजगार और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलेगी।

संकट और विकराल होगा :

इस परियोजना के लिए हजारों हेक्टेयर वन भूमि और गैर-वन भूमि के उपयोग परिवर्तन को स्वीकृति दी गई है। इसमें निजी वन क्षेत्र तथा मैंग्रोव भूमि भी शामिल है। हजारों पेड़ों की कटाई होगी, अनेक घर ध्वस्त किए जाएंगे, तालाब, कुएं और बोरवेल नष्ट होंगे। जिन क्षेत्रों में यह परियोजना प्रस्तावित है, वहां मुख्यतः पर्णपाती वनस्पतियां और मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र पाए जाते हैं। ये केवल पेड़ों के समूह नहीं, बल्कि जीवन, जलवायु और जैव विविधता के आधार स्तंभ हैं। सबसे गंभीर चिंता यह है कि परियोजना क्षेत्र वन्यजीवों से समृद्ध क्षेत्र के निकट स्थित है। समीपस्थ वन्यजीव अभयारण्य की पारिस्थितिक संवेदनशील सीमा परियोजना स्थल से बहुत दूर नहीं है। इन क्षेत्रों में कई वन्यजीव पाए जाते हैं। सड़कें, खनन और औद्योगिक गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्गों को बाधित करती हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। भारत पहले ही हाथी, तेंदुआ और बाघों के साथ बढ़ते संघर्ष का सामना कर रहा है। यदि जंगल सिकुड़ते गए तो यह संकट और विकराल होगा।

चिंता का विषय बन चुका है :

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आज पर्यावरणीय स्वीकृतियों का स्वरूप भी चिंता का विषय बन चुका है। अनेक परियोजनाओं को राष्ट्रीय महत्व के नाम पर शीघ्र स्वीकृति प्रदान की जा रही है। प्रश्न यह नहीं है कि देश को विकास चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि विकास का मॉडल क्या हो? क्या विकास का अर्थ केवल कंक्रीट, बंदरगाह, राजमार्ग और खनन है? या फिर ऐसा विकास, जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संसाधन सुरक्षित रखे? भारत में पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर वन भूमि का उपयोग परिवर्तन हुआ है। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में रणनीतिक परियोजनाएं, महाराष्ट्र का वाधवन बंदरगाह, ओडिशा में खनन के लिए विशाल वन क्षेत्र, मध्यप्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और गोवा में भूमि अधिग्रहण ये सभी संकेत देते हैं कि देश का प्राकृतिक भूगोल तेजी से बदल रहा है।

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वैज्ञानिकों की चेतावनी :

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जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जलवायु नियंत्रक, जल स्रोतों के संरक्षक और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। वनों की कटाई का सीधा प्रभाव जलवायु परिवर्तन पर पड़ता है। भारत पहले ही भीषण गर्मी, अनियमित मानसून, अचानक बाढ़, सूखा, चक्रवात और धूल भरी आंधियों जैसी चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर रहा है। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं। तटीय क्षेत्रों में समुद्री कटाव और चक्रवातों की तीव्रता में वृद्धि हो रही है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि प्राकृतिक कार्बन सिंक अर्थात् जंगल समाप्त होते रहे, तो तापमान वृद्धि को नियंत्रित करना असंभव हो जाएगा। विशेष रूप से मैंग्रोव वनस्पतियां तटीय क्षेत्रों की जीवन रेखा होती हैं। ये समुद्री तूफानों से रक्षा करती हैं, कार्बन अवशोषित करती हैं और समुद्री जैव विविधता को सुरक्षित रखती हैं।

आत्मघाती निर्णय :

मुंबई, सुंदरबन और कच्छ के अनुभव बताते हैं कि जहां मैंग्रोव नष्ट हुए, वहां बाढ़ और समुद्री क्षरण का खतरा बढ़ेगा। ऐसे में मैंग्रोव क्षेत्र को सड़क और बंदरगाह परियोजनाओं के लिए समाप्त करना दीर्घकालीन दृष्टि से आत्मघाती निर्णय हो सकता है। परियोजनाओं के समर्थक अक्सर प्रतिपूरक वनीकरण का तर्क देते हैं। कहा जाता है कि जितने पेड़ काटे जाएंगे, उतने दूसरे स्थान पर लगाए जाएंगे। लेकिन क्या सदियों पुराने प्राकृतिक जंगलों की भरपाई कृत्रिम वृक्षारोपण से संभव है? एक विकसित वन केवल पेड़ों का समूह नहीं होता; उसमें मिट्टी, सूक्ष्म जीव, पक्षी, वन्यजीव, जलधाराएं और जटिल पारिस्थितिक संबंध होते हैं।

दीर्घकालीन सोच आवश्यक :

शहरी नियोजन में प्राकृतिक जल निकायों और हरित क्षेत्रों को संरक्षित रखा जा सकता है। परंतु इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालीन सोच आवश्यक है। दुर्भाग्य से वर्तमान समय में पर्यावरणीय विमर्श को अक्सर विकास विरोधी कहकर खारिज कर दिया जाता है। जो लोग जंगल बचाने की बात करते हैं, उन्हें प्रगति में बाधक बताया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि पर्यावरण संरक्षण ही स्थायी विकास की बुनियाद है। यदि जल, जंगल और जमीन सुरक्षित नहीं रहेंगे तो आर्थिक विकास भी टिकाऊ नहीं होगा। भारत का इतिहास जन आंदोलनों की प्रेरणादायक मिसालों से भरा है। उत्तराखंड का चिपको आंदोलन, राजस्थान का खेजड़ली बलिदान और नर्मदा बचाओ आंदोलन यह बताते हैं कि जब जनता प्रकृति की रक्षा के लिए खड़ी होती है, तो नीतियों को बदलना पड़ता है।

जीवन की सुरक्षा का प्रश्न :

इन आंदोलन ने यह संदेश दिया कि जंगल केवल संसाधन नहीं, जीवन हैं। वास्तविक विकास वही है जो आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों का सम्मान करे। यदि आज हम जंगल काटकर राजमार्ग बनाएंगे, तो कल उन्हीं राजमार्गों पर जलवायु आपदाओं का बोझ बढ़ेगा। यदि मैंग्रोव नष्ट होंगे, तो तटीय शहर चक्रवातों और समुद्री जलवृद्धि के सामने असुरक्षित हो जाएंगे। यदि पहाड़ों को अंधाधुंध काटा जाएगा, तो भूस्खलन और आपदाएं बढ़ेंगी। समय गया है कि भारत अपनी विकास नीति का पुनर्मूल्यांकन करे। जंगलों को बचाना केवल पर्यावरण प्रेमियों का एजेंडा नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन की सुरक्षा का प्रश्न है।

-डॉ. रिपुन्जय सिंह

यह लेखक के अपने विचार हैं।

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