खत्म हो रहा दिल्ली में भूगर्भ जल

वर्षाजल से ही संभव

खत्म हो रहा दिल्ली में भूगर्भ जल
भारत में भूजल दोहन की स्थिति काफी भयावह है। देश में 267 जिलों में भूजल दोहन का स्तर 64 से लेकर 385 फीसदी है।

भारत में भूजल दोहन की स्थिति काफी भयावह है। देश में 267 जिलों में भूजल दोहन का स्तर 64 से लेकर 385 फीसदी है। संसद की लोक लेखा समिति ने केंद्र के जल शक्ति मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह राज्यों से भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने और भूजल संसाधनों की दीर्घकालिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने को कहे। देश के हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और दिल्ली के कई इलाके गंभीर स्थिति का सामना करते हुए डार्क जोन में चुके हैं। यहां भूजल दोहन सौ फीसदी से भी ज्यादा है। कुछ जिलों में यह स्थिति 385 फीसदी तक पहुंच गयी है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के इलाकों में भूजल रिचार्ज होने की दर से लगभग दस गुणे से भी ज्यादा दर से भूजल का दोहन हो रहा है। यदि यही हाल रहा तो आने वाले कुछेक वर्षों में ही यहां के भूगर्भ जल स्रोत पूरी तरह सूख जायेंगे। वैज्ञानिकों के अध्ययन इसके जीते जागते सबूत हैं।

भूजल दोहन के कारण :

भूजल स्तर में तेजी से गिरावट की मुख्य वजह कृषि कार्यों हेतु बढ़ता भूजल दोहन और बढ़ता प्रदूषण है। इससे जल की गुणवत्ता अत्यधिक प्रभावित हुयी है। अत्याधिक भूजल दोहन के कारण देश के 400 से ज्यादा जिलों के भूजल में फ्लोराइड,आर्सैनिक और नाइट्रेट जैसे जहरीले तत्व मौजूद हैं। इससे पीने का पानी गंभीर रूप से दूषित हो गया है जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें भयावह हो रही हैं। देश की राजधानी दिल्ली की हालत तो बेहद खराब है। यहां यमुना जल की कम हिस्सेदारी के कारण नये बसे इलाकों में भूजल ही पानी का मुख्य स्रोत रह गया है। यहां पानी की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का अवैध दोहन हो रहा है। नतीजतन राजधानी में भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है। हालात सबूत हैं कि दिल्ली का भूजल स्तर तेजी से पाताल में समा रहा है और लगभग खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। पिछले पांच सालों में ही यहां का भूजल स्तर साढ़े चार मीटर से नीचे चला गया है।

भूजल दोहन की स्थिति :

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रिपोर्ट के मुताबिक आज दिल्ली में भूजल दोहन की स्थिति बेहद गंभीर है। राजधानी के कुछेक इलाके ही अर्ध गंभीर की श्रेणी में हैं। जबकि औसतन हालात गंभीर हैं। बहुतेरे शोध अध्ययन इस बात के सबूत हैं कि देश की राजधानी अवैध भूजल दोहन के चलते तेजी से डे जीरो की ओर बढ़ रही है। यह सब वर्षाजल संचय संरक्षण में नाकामी का सबूत है। हकीकत यह है कि उचित वर्षाजल संचयन प्रणाली होने से लाखों लीटर पानी यूं ही बर्बाद हो जाता है। बरसाती पानी की सही जगह जमीन के नीचे है लेकिन पानी को योजनाबद्ध तरीके से जमीन के नीचे पहुंचाने की तो सरकार और ही स्थानीय निकायों के पास कोई ठोस योजना है।

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वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना :

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2013 में नगर निगम द्वारा आदेश जारी किया गया था कि नये घरों के निर्माण में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य है, लेकिन उस पर अमल आज भी सपना बना हुआ है। जबकि इस योजना पर जल बोर्ड के अनुसार पानी के बिलों पर दस फीसदी की छूट दी गयी है। लेकिन उसपर अमल आजतक नहीं हुआ है। दिल्ली सरकार दिल्ली में पानी की कमी को पूरी करने की खातिर बेहतर प्रबंधन पर जोर दे रही है। अब 520 ट्यूबवैल लगाये गये हैं। राजधानी के 77 तालाबों के कायाकल्प करने की तैयारी की जा रही है। राज्यपाल द्वारा जलसंचय अभियान की शुरुआत की जा रही है। विडम्बना यह है कि यह प्रयास अब जब गर्मी अपने चरम पर है। इसकी असली वजह भूजल संग्रहण की योजनाओं का फाइलों में ही सिमटी पड़ी रहना है।

वर्षाजल संचयन प्रणाली :

वर्षाजल संचयन प्रणाली लागू करने के बाबत कोर्ट ने भी आदेश जारी किये, लेकिन उसपर सख्ती से अमल आज भी नहीं हो रहा है।विडंबना यह है कि जलाशयों के पुनर्विकास, वर्षाजल संचयन प्रणाली की योजनाओं पर दिल्ली जल बोर्ड का मौन समझ से परे है। इस बाबत वह यह योजना दूसरे विभाग की होने,कभी फंड होने का बहाना बनाकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। यही नहीं जल संरक्षण को लेकर कभी भाटी माइंस तो कभी पल्ला बजीराबाद के बीच जलाशय बनाकर बाढ़ का पानी एकत्र कर रोकने की पहल हुयी। केंद्रीय भूजल बोर्ड ने भी कई अहम सुझाव दिये, लेकिन ज्यादातर योजनायें प्रस्ताव धरातल पर नहीं उतर पाये।

वर्षाजल से ही संभव है :

भूजल की यह बदहाली अकेले देश की राजधानी की ही नहीं है, एन सी आर के दूसरे गाजियाबाद, फरीदाबाद, नौएडा, गुरुग्राम आदि शहरों की भी है। आने वाले समय में देश के जयपुर, चेन्नई, हैदराबाद जैसे दूसरे शहरों की भी यही स्थिति होगी। डब्लू एच ओएसी एस और यू एन जैसे संगठन तो इस बारे में पहले ही चेता चुके हैं। भूजल के अत्यधिक दोहन और उसके प्रदूषण पर चिंता जाहिर करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने कहा है कि भूजल संरक्षण के लिए बने नियम जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रहे हैं। इसके बावजूद लोग जल संकट की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं। जबकि भूजल भंडारों की क्षतिपूर्ति केवल और केवल वर्षाजल से ही संभव है। जल संकट से मुक्ति का यही एकमात्र रास्ता है, जिससे हम धरती का पेट भर सकते हैं।

-ज्ञानेन्द्र रावत

यह लेखक के अपने विचार हैं।

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