नारी शक्ति का दशक, विकसित भारत का उत्कर्ष

अभी भी चुनौतियां हैं

नारी शक्ति का दशक, विकसित भारत का उत्कर्ष
देश के किसी भी गांव, बस्ती या सुदूर इलाके में जाइए- हर घर की रसोई में एक जैसी बदली हुई हवा महसूस होगी- चूल्हे के जिस काले धुएं ने कभी नई दुल्हन की आंखों में आंसू भरे थे, उज्ज्वला की नीली लौ ने उसे विदा कह दिया है।

देश के किसी भी गांव, बस्ती या सुदूर इलाके में जाइए- हर घर की रसोई में एक जैसी बदली हुई हवा महसूस होगी- चूल्हे के जिस काले धुएं ने कभी नई दुल्हन की आंखों में आंसू भरे थे, उज्ज्वला की नीली लौ ने उसे विदा कह दिया है। जो मां कभी कोसों दूर से पानी ढोती थी, आज उसकी बेटी के पास हर घर जल का अपना नल है। खेत के पीछे की वह शर्मनाक मजबूरी अब इतिहास है- आंगन में स्वच्छ भारत का शौचालय गरिमा के साथ खड़ा है। सिर पर पक्की छत है और उसके मालिकाना हक पर पहली बार- घर की महिला का नाम लिखा है।

महिला सशक्तिकरण :

पर्स में जन-धन की पासबुक है और फोन में यूपीआई का ऐप है। यह किसी पोस्टर पर छपी कोई काल्पनिक तस्वीर नहीं, बल्कि मोदी सरकार के बारह वर्षों में महिला सशक्तिकरण का एक ऐसा सच है, जिसे देश की करोड़ों महिलाएं हर रोज़ जी रही हैं। यह उस दौर की दास्तान है जिसमें महिला नेतृत्व वाला विकास के विजन के साथ भारतीय नारी विकसित भारत की शिल्पकार बन रही है। इस बदलाव की विशालता को समझने के लिए एक दशक पीछे लौटिए। एक समय मातृ मृत्यु दर 212 थी।

जीवन का अधिकार :

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निर्भया जैसी घटना पर देश का आक्रोश सड़कों पर था, लेकिन व्यवस्था में नीतिगत इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती थी। महिला आरक्षण विधेयक 1996 से चार बार अधर में लटका रहा और ट्रिपल तलाक पर दशकों तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। चूल्हा सांसों में कालिख घोलता था। दूरस्थ हैंडपंप रोज़मर्रा की बेबसी का प्रतीक था, भारतीय नारी एक नई सुबह की प्रतीक्षा में अपने हिस्से की उम्मीद बचाए हुए थी, शुरुआत करते हैं सबसे पवित्र आंकड़े जीवन का अधिकार से।

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वैश्विक स्तर पर :

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देश में मातृ मृत्यु दर तेजी से घटकर 212 से 88 पर गई है। जहां वैश्विक स्तर पर मातृ मृत्यु दर में महज़ 48% की कमी आई, वहीं भारत ने 86% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की है। संस्थागत प्रसव 38.7% से बढ़कर 90.6% हो चुका है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना ने चार करोड़ से अधिक माताओं के बैंक खातों में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक सीधे हस्तांतरित कर सुरक्षित मातृत्व और स्वस्थ बचपन की नींव मजबूत की है। देश में बने 12 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालयों ने महिलाओं को गरिमा दी ’10.5 करोड़ से अधिक उज्ज्वला कनेक्शनों ने धुएं से मुक्ति दी।

महिलाओं के नाम पर :

आज 16 करोड़ से अधिक घरों तक नल का पानी पहुंच चुका है, जबकि 2014 में महज 17% परिवारों के पास यह सुविधा थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के लगभग 4 करोड़ घरों में से 73% घर महिलाओं के नाम पर हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार सरकारी रिकॉर्ड्स पर मां-बहनों का नाम गर्व से दर्ज है। गरिमा से स्वामित्व आया, और स्वामित्व ने निर्णय लेने का आत्मविश्वास दिया। आर्थिक भागीदारी का यह विस्तार बैंक खाते से शुरू होकर उद्यमिता तक पहुंचा हैलगभग 56 करोड़ जन-धन खातों में 56% खाते महिलाओं के नाम पर हैं।

इतिहास में अभूतपूर्व :

विश्व बैंक मानता है भारत ने एक दशक में खाता स्वामित्व के जेंडर गैप को शून्य पर ला दिया है, जो वैश्विक वित्तीय समावेशन के इतिहास में अभूतपूर्व है। मुद्रा योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक जमानत-मुक्त ऋणों में से 68% ऋण महिलाओं को मिले हैं। स्टैंड-अप इंडिया ने महिला उद्यमियों को 43,000 करोड़ रुपये से अधिक दिए हैं और दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 91 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है। निर्धारित समय से पहले 3 करोड़ बहनें लखपति दीदियां बन चुकी हैं।

शिक्षा और रोजगार :

यह बदलाव शिक्षा और रोजगार में भी स्पष्ट हैदेश में महिला श्रम शक्ति भागीदारी वर्ष 2017-18 के 23.3% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 41.7% हो गई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह भागीदारी 47.6% तक पहुंच चुकी है सुकन्या समृद्धि योजना के तहत अब तक 4.53 करोड़ खातों में 3.33 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा है उच्च शिक्षा में हमारा जेंडर समानता सूचकांक 1 के पार है और शिक्षा में बेटियों की भागीदारी 43% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक में से एक है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम :

यह परिवर्तन केवल अनुभवों में नहीं, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र हर रिपोर्ट एक ही दिशा की ओर इशारा करती है: भारतीय महिला के लिए पहुंच बढ़ी है और आत्मनिर्भरता का नया आसमान खुला है। इसी आर्थिक-सामाजिक चेतना का विस्तार राजनैतिक और लोकतांत्रिक भागीदारी में दिख रहा है। वर्ष 2019 के आम चुनावों में पहली बार महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। यह वैश्विक स्तर पर महिलाओं की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भागीदारी थीइसी के फलस्वरूप दशकों से लंबित नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद में ऐतिहासिक सर्वसम्मति से पास हुआ।

पंचायतों का नेतृत्व :

आज जमीनी स्तर पर 14.5 लाख से अधिक महिला प्रतिनिधि पंचायतों का नेतृत्व कर रही हैं। देश की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में भी महिलाएं राफेल उड़ा रही हैं और नौसेना की कमान संभाल रही हैं। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 ने ट्रिपल तलाक पर प्रभावी रोक लगाई, जिससे ऐसे मामलों में 82% की कमी आई है।देशभर में स्थापित 973 वन स्टॉप सेंटर्स पर संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी सहायता और काउंसलिंग मिल रही हैवुमन हेल्पलाइन-181 ने अब तक 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की मदद की है।

अभी भी चुनौतियां हैं :

मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, सक्षम आंगनवाड़ी ये नारी नेतृत्व वाले भारत की रीढ़ हैं। बेशक, महिला सशक्तिकरण की राह में अभी भी चुनौतियां हैं, जिन पर सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। इसके साथ ही, नारी शक्ति वंदन अधिनियम आगामी परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा में है। हमारे गणतंत्र के इतिहास में पहली बार भारतीय महिला अब नीति निर्धारण के पटल पर केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय सह-निर्माता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में वह अब राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सहयात्री है, सहभागी है और सूत्रधार भी।

- अन्नपूर्णा देवी

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री,

भारत सरकार

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