अतिक्रमणों ने घोंट डाला साहबी नदी का दम, अब नदी से हो गई नाले में तब्दील
तीन जिलों के 200 गांवों का होगा पेयजल संकट दूर
कभी वर्षों से राजस्थान के जयपुर एवं अलवर जिले की जीवन दायिनी मानी जाने वाली साहबी नदी अब वक्त के साथ दम तोड़ती जा रही। कभी पानी से लबालब रहने से सैकड़ो गांवों के जलस्तर को ऊंचा रखने वाली साहबी नदी अलवर व जयपुर जिले की कई तहसीलों की जीवन दाहिनी कहलाती थी।
सोडावास(अलवर)। कभी वर्षों से राजस्थान के जयपुर एवं अलवर जिले की जीवन दायिनी मानी जाने वाली साहबी नदी अब वक्त के साथ दम तोड़ती जा रही है। कभी पानी से लबालब रहने से सैकड़ो गांवों के जलस्तर को ऊंचा रखने वाली साहबी नदी अलवर व जयपुर जिले की कई तहसीलों की जीवन दाहिनी कहलाती थी। लेकिन अब यह नदी प्रशासन की लापरवाही कहें या समय का फेर ढाई दशक से अतिक्रमण की चपेट में आकर अपने अस्तित्व को तलाशने को मजबूर है। तेज बारिश में सभी बांध लबालब पानी के भर जाते थे और कहीं नदियां भारी बारिश के चलते अपना रूद्र रूप दिखा रही होती थी।
उनमें साहबी नदी भी अपना रूप रूद्र दिखाया करती थी। लेकिन अब यह पानी की बूंद बूंद के लिए तरस रही है। करीब आधा किलोमीटर चौड़ाई वाली यह नदी जब परवान पर होती थी तो नदी के दोनों तरफ के रास्ते बंद हो जाते थे। अलवर, खैरथल, अजरका व बहरोड़ से आने वाले साधन नदी के उस पार या इस पार ही खड़े हो जाते थे। अब इसको नियति की मार कहें या सरकारी अनदेखी से नदी का भराव क्षेत्र अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुका है। देखते ही देखते नदी में बारिश के पानी के आवक के रास्ते रुक गए हैं और अब सिकुड़ कर नाले के रूप में तब्दील हो चुकी है।
वर्ष 1996 में लबालब रही
ग्रामीणों ने बताया कि अंतिम बार यह नदी में पानी की आवक 1996 में हुई। ग्रामीणो ने बताया कि इस नदी परिक्षेत्र लगने वाले जिलों के स्थानीय जनप्रतिनिधि और सरकार ध्यान दे तो साहबी नदी को ईस्ट कैनाल से जोड़कर जीवन दान मिल सकता है। तीनों जिलों के करीब 200 गांवों में पेयजल संकट दूर हो सकता है। जानकारों ने बताया कि नदी का निकास अजीतगढ़, त्रिवेणी धाम, अमृतसर की पहाड़ियों से निकलकर उत्तर पूर्व की ओर यह नदी सोडावास होकर हरियाणा में प्रवेश कर यमुना में मिलती है। जयपुर, अलवर, कोटपूतली बहरोड़, खैरथल तिजारा के गावों की सीमा पर स्थित लाइफ लाइन कहे जाने वाली साहबी नदी अब कोटपूतली बहरोड, खैरथल तिजारा व अलवर जिले में आती है।

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