ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी
भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर संकट
ओएनजीसी और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों को तेल के नए क्षेत्रों की खोज, डीप-सी और शेल ऑयल एक्सप्लोरेशन पर जोर देना चाहिए। वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में एथेनॉल ब्लेंडिंग, इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को तेजी से आगे बढ़ाना होगा। स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व को विस्तृत करना होगा।
रूस-यूक्रेन युद्ध और अब इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष ने वैश्विक स्तर पर तेल, गैस, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। चीन ने रेयर अर्थ मिनरल्स दुर्लभ खनिज की आपूर्ति रोक कर चुनौती खड़ी कर दी है। जिसका भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर संकट खड़ा हो गया है। वहीं, इन युद्धों से सबक लेते हुए रक्षा क्षेत्र में देश को विदेशी निर्भरता की जगह स्वदेशी ड्रोन, मिसाइल, लेजर अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण में नवीनतम तकनीक विकसित करते हुए आत्मनिर्भर बनाना होगा। इस क्रम में गहन अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा देने की जरूरत है। यदि ऐसा हुआ तो मौजूदा परिस्थितियां भारत को न केवल आर्थिक रूप से बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन साधने की दृष्टि से अहम बना सकती हैं। इसके लिए बहुआयामी और दीर्घकालिक रणनीति बनाकर उसे ठोस रूप देना होगा। तेल-गैस और उर्वरक के घरेलू उत्पादन पर जोर देना जरूरी है। ओएनजीसी और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों को तेल के नए क्षेत्रों की खोज, डीप-सी और शेल ऑयल एक्सप्लोरेशन पर जोर देना चाहिए। वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में एथेनॉल ब्लेंडिंग, इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को तेजी से आगे बढ़ाना होगा। स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व को विस्तृत करना होगा।
गैस के घरेलू उत्पादन के लिए केजी-बेसिन जैसे क्षेत्रों का विकास और गैस खोज में निजी निवेश को बढ़ावा देना होगा। वन नेशन, वन गैस ग्रिड, पाइपलाइन और एलएनजी टर्मिनल्स जैसे बुनियादी ढांचे विकसित करने होंगे। इसके अलावा हरित ऊर्जा के क्षेत्र में सौर एवं पवन और छोटे न्यूक्लियर पावर प्लांट निर्माण पर जोर देना चाहिए। यूरिया, फॉस्फेट, पोटाश खाद फर्टिलाइजर के घरेलू उत्पादन पर जोर देना होगा। इस क्रम में बंद पड़े उर्वरक संयंत्रों को पुनर्जीवित करने, ग्रीन हाइड्रोजन आधारित खाद उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। इफको जैसी संस्थाओं के जरिए नैनो यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों का उत्पादन बढ़ाना होगा। खेती में कम रासायनिक प्रयोग के साथ जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा। मोरक्को, रूस जैसे देषों से उर्वरक आपूर्ति की वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल की नीति बनानी होगी। इनकी बैटरी के लिए लिथियम, कोबाल्ट जैसे दुर्लभ खनिजों की जरूरत के लिए घरेलू खनन पर जोर देना होगा। हाल ही केंद्र सरकार ने इस साल के बजट में चार रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने का फैसला लिया है। इसके क्रियान्वयन पर जोर देना होगा। अमेरिकी नेतृत्व में बने मिनरल सिक्यूरिटी पार्टनरशिप संगठन एमएसपी ने भारत को सदस्य बनाया है।
जो महत्वपूर्ण कदम है। जम्मू-कश्मीर में लिथियम भंडार की खोज हुई है। उसके खनन के लिए जरूरी नीतियों में सुधार करना जरूरी है। विदेशों में खनिज ब्लॉक्स खरीदने पड़ें तो उसके भी प्रयास करने होंगे। बैटरी और ई-वेस्ट से ऐसे खनिजों की पुनर्प्राप्ति योजना पर भी जोर देना चाहिए। भारत फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड है, लेकिन एपीआई एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स के लिए चीन पर निर्भर है। एपीआई उत्पादन के तहत पीएलआई प्रॉडक्शन लिंक इंसेटिव योजना, एपीआई पार्कों की स्थापना करनी होगी। नीतियों में सुधार, तकनीकी निवेश, वैश्विक साझेदारी से ह्मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को मूर्त रूप देना होगा।

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