आंसुओं से लिखी सफलता की इबारत : झाड़ू-पौंछा लगाने वाली और मजदूर की बेटियों ने बोर्ड में रचा इतिहास

किसी की मां नहीं तो किसी के पिता नहीं, फिर भी नहीं टूटा हौसला

आंसुओं से लिखी सफलता की इबारत : झाड़ू-पौंछा लगाने वाली और मजदूर की बेटियों ने बोर्ड में रचा इतिहास

गरीबी, दर्द , अभावों से लड़कर और जिम्मेदारियों के बीच बेटियां बनीं बोर्ड टॉपर ।

कोटा । किसी के हाथ में किताबों से पहले झाड़ू थी, कोई मां के बिना घर संभालते हुए पढ़ी तो किसी ने पिता की मौत के बाद टूटते परिवार को संभाला। मजदूर और किसान की बेटियां अभावों से लड़ती रही। लेकिन, हालातों के आगे हार नहीं मानी। संघर्ष, चुनौतियों और अभावों से जूझते हुए इन बेटियों ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर खुद को साबित किया। उन्होंने साबित कर दिया कि सफलता के लिए महंगे स्कूल, कोचिंग और सुविधाएं जरूरी नहीं, बल्कि मेहनत, लगन और आत्मविश्वास जरूरी है।

बिन मां की बेटी कृष्णा ने मैकेनिक पिता का नाम किया रोशन

कृष्णा ने संघर्ष और चूनौतियों से लड़ खुद को साबित किया। बिन मां की बेटी कृष्णा ने 10वीं बोर्ड में 90 प्रतिशत अंकों के साथ सभी विषयों में डिक्टेशन हासिल की है। पिता वेल्डिंग का काम करते हैं। परिवार की माली हालत और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा का दामन थामे रखा। राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय अंबेडकर नगर कुन्हाड़ी की छात्रा के पिता विपिन कुमार बताते हैं, कृष्णा तीन भाई बहन है। स्कूल से आने के बाद घर का काम और बुजुर्ग दादी की सार-संभाल करती है। दिन में थोड़ा समय पढ़ाई के लिए मिलता तो शाम को फिर से घर के काम में लग जाती। रात को 4 घंटे पढ़ती और साथ में छोटे भाई को भी पढ़ाती। परीक्षा के दौरान बीमार हो गई फिर भी कृष्णा ने हार नहीं मानी और परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

 

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पिता की मृत्यु से टूटी फिर संभली अब बोर्ड में किया नाम रोशन

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कुन्हाड़ी निवासी सरकारी स्कूल की छात्रा रंजिता का जीवन चुनौतियों और संघर्षों से भरा रहा। वर्ष 2024 में पिता का अचानक देहांत होने से वह टूट गई। मां हॉस्टल में झाडू-पौंछा कर परिवार का पेट पालती है। ऐसी विकट परिस्थितियों में भी रंजिता ने हार नहीं मानी और नियमित 4 घंटे पढ़ाई कर परीक्षा में 81 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल किए। साथ ही सभी 6 विषयों में विशेष योग्यता हासिल कर गार्गी पुरस्कार में चयनित हुई। प्रिंसिपल अर्पणा शर्मा कहती हैं, अभावों से जूझते हुए भी रंजिता ने मुकाम हासिल किया है। अब वह साइंस लेकर मेडिकल फिल्ड में जाना चाहती है।

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मजदूर की बेटी ने किया स्कूल टॉप

राजकीय बालिका उच्च माध्मिक विद्यालय कुन्हाड़ी की छात्रा सोनाक्षी ने 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल कर परिवार का नाम रोशन किया। उनके पिता विशू प्रताप मजदूरी करते हैं और मां इसी स्कूल में पोषाहार बनाती है। मां ममता मेघवाल बताती हैं, घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। किराए से कमरा लेकर रहते हैं। एक ही कमरे में परिवार के 6 सदस्य रहते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद सोनाक्षी ने सफलता की इबारत लिखी। बेटी आगे इंजीनियर बनना चाहती है।

 

इलेक्ट्रीशियन की बेटी ने रचा इतिहास

महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय सुल्तानपुर की छात्रा दिव्या नागर ने बोर्ड परीक्षा में 96.83 प्रतिशत अंक हासिल कर पूरे ब्लॉक में टॉपर रही है। दिव्या के पिता सुरेश इलेक्ट्रीक की दुकान पर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि स्कूल के बाद बेटी घर के काम में मां का हाथ बटाती है। रात को 4 घंटे नियमित पढ़ाई करती है और छोटे बहन-भाई को भी पढ़ाती है। बुजुर्ग दादी की अक्सर तबीयत खराब रहती है, जिससे घर का माहौल भी अशांत हो जाता है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दिव्या ने खुद को साबित करके दिखाया। बेटी सरकारी टीचर बनना चाहती है।

काश्तगार की बेटी ने बढ़ाया पिता का मान

सुल्तानपुर के सरकारी स्कूल की छात्रा फिजा खानम ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में 92.67 प्रतिशत अंक प्राप्त कर परिवार का मान बढ़ाया। फिजा के पिता दिलभर खान काश्तगार हैं, जो दूसरों की जमीन जोतकर आजिविका चलाते हैं। उन्होंने बताया कि घर से स्कूल की दूरी एक किमी है। बेटी रोजाना पैदल स्कूल जाती है। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है, विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उसने पढ़ाई जारी रखी। 5 घंटे नियमित पढ़ाई करती और घर का काम भी संभालती। बेटी ने 600 में 556 अंक प्राप्त किए हैं।

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