विशेषज्ञ बोले- लोग समझें, फ्री नहीं टैक्स पेयर के पैसों से मिलती हैं हमें दवाएं
दवा का सॉल्ट एक पर मानसिकता में फेर
कोटा के सरकारी अस्पतालों में इलाज, जांच और दवाएं मुफ्त हैं, लेकिन ‘फ्री’ मानसिकता सिस्टम पर भारी पड़ रही है। अधूरी दवाएं, घरों में स्टॉक, बेवजह जांचें और मशीनों पर बढ़ता दबाव करोड़ों के टैक्स पैसे को बर्बाद कर रहा है। विशेषज्ञों का सुझाव—5-10 रुपये का प्रतीकात्मक शुल्क जिम्मेदारी बढ़ा सकता है।
कोटा। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को इलाज मुफ्त, जांच मुफ्त, दवाएं भी मुफ्त। मुफ्त के नाम पर सरकार हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन लोगों की मुफ्त की मानसिकता व्यवस्था पर भारी पड़ रही है। न सरकारी कारिन्दे इसे गंभीरता से लेते और न ही पीड़ित। वास्तव में यह कोई मुफ्त का पैसा नहीं है बल्कि हमारा और आपका ही यह पैसा है। टैक्स पेयर का पैसा है। जिसे खर्च करने में गंभीरता नहीं बरती जा रही। मुफ्त की मानसिकता का प्रभाव, व्यवस्था में सुधार और छोटा सा बदलाव कैसे चिकित्सा सेवाओं को बेहतर बना सकता है, इसके जवाब विशेषज्ञों की रोशनी में नवज्योति ने तलाशे। पेश है खास रिपोर्ट...
अभी क्या हो रहा : घरों पर दवाओं का स्टोर
सरकारी अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मुफ्त को लेकर लोगों की मानसिकता इस कदर हावी है कि एक बार डॉक्टर को दिखाने के बाद मरीज निर्धारित अवधि की दवा लेकर जाता है,लेकिन खाता कुछ ही दिन है। लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से वही मरीज अस्पताल पहुंच नई दवाएं ले लेता है। इस वजह से घरों में अनावश्यक दवाओं का स्टॉक जमा हो रहा है, जिससे सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कृत्रिम कमी पैदा हो रही है। इसका सीधा असर सरकारी खजाने और आम जनता के टैक्स के पैसों पर पड़ रहा है।
दवा का सॉल्ट एक पर मानसिकता में फेर
नि:शुल्क और शुल्क यह शब्द लोगों की मानसिकता पर गहरा असर डालता है। मरीज बाजार से कैमिस्ट के यहां से महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदता है तो उन्हें संभालकर रखता है, एक्सपायरी का ध्यान रखता है और नियमित सेवन भी करता है। लेकिन इसी सॉल्ट की सरकारी अस्पतालों से मिलने वाली मुफ्त दवाओं के प्रति नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। क्योंकि ब्रांडेड के नाम पर जेब से पैसा लगा होता है।
यूं हजारों की क्वांटिटी में बेकार होती दवाएं
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, शहर के 4 बड़े अस्पताल एमबीएस, मेडिकल कॉलेज अस्पताल, जेकेलोन व रामपुरा जिला अस्पताल में प्रतिदिन औसतन ओपीडी 3 हजार होती है। यदि, चारों अस्पातालों की ओपीडी को जोड़ लिया जाए तो करीब 12 हजार मरीज प्रतिदिन अस्पतालों में इलाज को पहुंचते हैं। अब एक मरीज को औसतन 5 दिन की दवाएं पर्चे पर लिखी जाती है तो 12 हजार मरीज की 5 दिन की दवा से गुणा करें तो दवाओं की क्वांटिटी 60 हजार से ज्यादा होगी क्योंकि, इनमें कई दवाएं सुबह-शाम तो दिन में तीन बार की होगी। अब यदि, 12 हजार मरीज 4 दिन दवा का सेवन करता है और 1 दिन की भी छोड़ देता है तो यह भी 12 हजार दवाएं बचेंगी, जिनका उपयोग नहीं हुआ और यह दवाएं पड़ी-पड़ी वेस्ट हो जाएगी।
5 अस्पताल, 100 तरह की जांचें प्रतिदिन 10 हजार से ज्यादा होती जांचें
मेडिकल कॉलेज से संबद्ध पांच बड़े सरकारी अस्पतालों में 100 तरह की जांचें की जाती हैं, जिनमें औसतन 10 हजार जांचें प्रतिदिन नि:शुल्क होती है। न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल की बात करें तो प्रतिदिन 100 सोनोग्राफी, 70 से 80 एमआरआई, 50 से 60 सीटी स्कैन होती है। अब यदि, सोनोग्राफी की बात करें तो एनएमसीएच, जेकेलोन, एमबीएस और रामपुरा जिला अस्पातल में पर-डे 100 सोनोग्राफी के हिसाब से 400 जांचे होती है। वहीं, एक मरीज की सीबीसी जांच में ही 15 तरह की जांचें शामिल होती हैं। इतनी बड़ी मात्रा में जांचें हो रही है, जिसका मुख्य कारण नि:शुल्क होना है। बड़ी मात्रा में जांचों के कारण मशीनों पर आवश्यकता से ज्यादा लोड पड़ता है, जिसका असर मशीनों के खराब होने के रूप में पड़ता है। हाल ही में एनएमसीएच में एमआरआई मशीन चलते-चलते बंद हो गई थी।
क्या कहते हैं लोग
सरकार जनता के टैक्स के पैसों से इलाज और दवाएं उपलब्ध कराती है। मुफ्त के नाम पर इसका नुकसान पूरे सिस्टम को होता है। जिसका इलाज किया जा रहा है उससे थोड़ा ही सही लेकिन कुछ एमाउंट लिया जाना चाहिए। अस्पतालों में बची हुई दवाओं के लिए मेडिसिन डोनेशन बॉक्स जरूर लगने चाहिए।
-शोएब खान, सामाजिक कार्यकर्ता
जांचें व दवाओं पर मामूली शुल्क लगने से मरीज की जेब पर खास फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन अस्पतालों को प्रतिदिन हजारों रुपए की आय होगी। यह पैसा माह में लाखों में तब्दील होगा। इस व्यवस्था से हर अस्पताल के पास अपना फंड हो सकेगा, जिससे अस्पतालों में बेहतर मशीनें, जांच व मरीजों की सुविधाओं में विस्तार किया जा सकता है।
-जुगराज राठौर, सचिव रेसपा कोटा
मुफ्त इलाज को पेशेंट गंभीरता से नहीं लेता। वह उसकी कद्र नहीं समझता। देखने में आता है कि मरीज कैमिस्ट र्की महंगी दवाओं का पूरा कोर्स करते हैं, लेकिन सरकारी दवाओं को बीच में छोड़ देते हैं।
-अजय कुशवाह, बोरखेड़ा
मुफ्त कुछ नहीं होता यह टैक्स पेयर का पैसा है। इसे सबको समझना चाहिए। पैशेंट की जेब से जब थोड़ा भी पैसा निकलता है तो वह इलाज और दवाओं के नाम पर अपव्यय नहीं करता है। यह आम मानसिकता का मामला है।
-पूरण बैरवा, सुल्तानपुर
यह पॉलिसी मेटर है, सरकार के स्तर का मामला है। सरकार के स्तर पर ही बात की जा सकती है।
-डॉ. आशुतोष शर्मा, अधीक्षक मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल।
हां करोड़ों रुपए मेडिकल पर खर्च होते हैं। वास्तव में यह मामला सरकारी पालिसी से जुड़ा है। हम कुछ नहीं कह सकते। निर्णय राज्य स्तर पर होता है।
9 जगदीश सोनी, जॉइंट डायरेक्टर चिकित्सा स्वास्थ्य।
सरकारी अस्पतालों में 1500 प्रकार की आती दवाएं
कोटा के ड्रग वेयर हाउस में जयपुर से करीब 1500 प्रकार की दवाएं और मेडिकल इक्यूमेंट करोड़ों रुपए की लागत से पहुंचते हैं। स्थानीय खरीद अलग है। इन्हें जिलेभर के सरकारी अस्पतालों में उनकी डिमांड के अनुरूप वितरित की जाती है। इनमें मौसमी बीमारियों, बीपी, शुगर, आनुवांशिक रोगों की दवाओं की खपत सबसे अधिक है। लेकिन अनावश्यक उठाव और दवाओं की बर्बादी के कारण कई बार अस्पतालों में जरूरतमंद मरीजों को समय पर दवाएं नहीं मिल पातीं।
मामूली शुल्क से बदल सकती है अस्पतालों की दशा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दवा वितरण पूरी तरह मुफ्त रखने के बजाय प्रतीकात्मक रूप से 5 या 10 रुपए का शुल्क तय कर दिया जाए तो लोगों की मानसिकता में बदलाव आ सकता है। मामूली शुल्क से मरीजों और तीमारदारों की जेब पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा, लेकिन दवाओं के प्रति जिम्मेदारी और उपयोग की गंभीरता बढ़ेगी। साथ ही अस्पतालों को मिलने वाला राजस्व मरीज सुविधाओं के विस्तार, उपकरणों और व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने में उपयोग किया जा सकता है।

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