लोकतंत्र के 75 वर्ष पूरे, अब भी पेड़ की छांव में पढ़ने को मजबूर भारत का भविष्य

बीस का स्टाफ जिनमें से 5 शिक्षक अन्यत्र डेपुटेशन पर

लोकतंत्र के 75 वर्ष पूरे, अब भी पेड़ की छांव में पढ़ने को मजबूर भारत का भविष्य
नांता का ऐतिहासिक स्कूल सामुदायिक भवन में सिमटा।

कोटा। कहने को तो सरकार शिक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है। राेज नये प्रयोग के लिये पुरा महकमा और आला तंंत्र भले ही दौड़धूप करता दिखता हो, लेकिन नान्ता के देश कि आजादी के बाद से चला आ रहा स्कूल जिम्मेदाराें की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रहा है। नान्ता महल के नाम से विख्यात यह स्कूल अब अपनी मूल पहचान खोकर गांव से बाहर एक सामुदायिक केंद्र में संचालित हो रहा है।

दो कमरों व 1 हाल में 6 कक्षाएं बाकि पेड़ों के नीचे लग रही
विडंबना देखिए की 12वीं तक के इस स्कूल में 441 छात्र नामांकित हैं, लेकिन उनके बैठने के लिए कक्षा-कक्षों का भारी अभाव है। नगर निगम और केडीए के जिस सामुदायिक भवन में यह स्कूल चल रहा है, वह सुविधाओं से युक्त बताया जाता है, लेकिन स्कूल के हिस्से में महज दो कमरे ही आए हैं। बाकी की पढ़ाई एक बड़े हॉल और खुले आसमान के नीचे हो रही है।

जैसे जैसे धूप वैसे ही सरकती कतारें
खुले में पढ़ने को मजबूर यहां के विद्यार्थियों की पीड़ा यह है कि कमरों के अभाव में 6 कक्षाओं के बच्चों को तपती धूप और खुले आसमान के नीचे पेड़ों की छांव में लंबी कतारों में बैठकर पढ़ना पड़ रहा है। सुबह तो ठीक है लेकिन जैसे जैसे सुर्य देव आसमान में चढ़ते है वैसे ही छात्र दिवार की और सरकते जाते है।

स्टाफ की कमी और डेपुटेशन का खेल
स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कुल 20 पदों का स्टाफ स्वीकृत है, लेकिन वर्तमान में स्थिति चिंताजनक है यहां कार्यरत स्टाफ 20 है जिनमें से 5 शिक्षक अन्यत्र डेपुटेशन पर हैं। वर्तमान में बच्चों को पढ़ाने के लिए केवल 12 अध्यापक ही पर उपलब्ध हैं।

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प्यास बुझाने को बोरिंग का पानी, सामने  है पानी की टंकी
सुविधाओं का अभाव सिर्फ बैठने की जगह तक ही सीमित नहीं है। स्कूल के ठीक सामने जलदाय विभाग की पानी की टंकी स्थित है और मुख्य पाइपलाइन भी वहीं से गुजर रही है। इसके बावजूद, स्कूली बच्चों को मजबूरन बोरिंग का पानी पीना पड़ रहा है। नगर निगम क्षेत्र में होने के बाद भी स्वच्छ पेयजल का न मिलना प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।

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बढ़ता नामांकन, घटती सुविधाएं
स्कूल की स्थिति खराब होने के बावजूद शिक्षकों की मेहनत का परिणाम है कि इस सत्र में 50 से अधिक नए दाखिले हुए हैं। बच्चों और अभिभावकों का विश्वास तो बढ़ रहा है, लेकिन संसाधनों की कमी उनके भविष्य पर भारी पड़ रही है।

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 मुझे यहां आए अभी अधिक समय नहीं हुआ है। यह सच है कि कक्षा-कक्षों और संसाधनों की कमी है, लेकिन उपलब्ध सीमित संसाधनों में हम बेहतर प्रबंधन करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
- निधि नामा, स्कूल प्रिंसिपल 

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