जानलेवा बनते जा रहे हैं कीटनाशक

चिंतनीय और खतरनाक संकेत 

जानलेवा बनते जा रहे हैं कीटनाशक

आजकल कीटनाशक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का कारण बनते जा रहे हैं।

आजकल कीटनाशक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम का कारण बनते जा रहे हैं। हालिया शोध और अध्ययनों से यह खुलासा हुआ है कि इनकी वजह से दिनोंदिन कैंसर, थायरॉइड, हार्मोन दबाव, उच्च रक्तचाप, उच्च स्तरीय कोलेस्ट्राल में बढ़ोतरी, लिवर और अल्सरेटिव कोलाइटिस का जोखिम गंभीर रूप से बढ़ता जा रहा है। इसकी अहम वजह विषाक्त पदार्थों का व्यापक संपर्क है जिसका खुलासा बेंगलूर स्थित आंतरिक स्वास्थ्य स्टार्टअप माइक्रोबायोटेक्स द्वारा किए गये नवीनतम अध्ययन में हुआ है। देखा गया है और शोध अध्ययन इसके प्रमाण हैं कि कीटनाशकों के संपर्क में आने से वयस्कों की तुलना में अक्सर शिशु और बच्चे ज्यादा और जल्दी प्रभावित होते हैं क्योंकि एक तो वह अधिक संवेदनशील होते हैं और उनके अंग, तंत्रिका तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली अभी विकसित हो रही होती है। बच्चे कीटनाशकों को शरीर से बाहर निकालने और अवशोषित करने में भी कम सक्षम होते हैं। यहां इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि कीटनाशक विषाक्तता के प्रति अधिक संवेदनशील होने के साथ बच्चों का व्यवहार और उनकी शारीरिक संरचना उन्हें वयस्कों की तुलना में कीटनाशकों के अधिक संपर्क में आने का कारण बनती है।

हवा में मौजूद कीटनाशक :

अधिकांश कीटनाशक त्वचा के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं और बच्चों की त्वचा का क्षेत्रफल उनके आकार के अनुपात में वयस्कों की तुलना में अधिक होता है। फिर बच्चों की श्वसन दर अधिक होती है, इसलिए वे हवा में मौजूद कीटनाशकों को वयस्कों की तुलना में जल्दी ग्रहण करते हैं। चूंकि बच्चे वयस्कों की तुलना में आनुपातिक रूप से अधिक भोजन और पानी का सेवन करते हैं और कीटनाशक अवशेषों को भी अधिक ग्रहण करते हैं। फर्श, खेल के मैदान के साथ बच्चों का अधिक संपर्क होने के कारण, बच्चों का व्यवहार भी कीटनाशकों के संपर्क में आने की उनकी संभावनाओं को बढ़ाता है। कीटनाशकों के संपर्क में आने से कैंसर, तंत्रिका सम्बंधी विकार जैसे पार्किंसंस, प्रजनन क्षमता में कमी, बच्चों में मानसिक व शारीरिक विकास में कमी जैसे स्वास्थ्य जोखिम अहम हैं। इसके अलावा तात्कालिक स्वास्थ्य प्रभावों में आंखों, नाक, गले व त्वचा में जलन, चुभन, खुजली, चकत्ते आना, छाले, मतली व चक्कर आना, दस्त, सांस लेने में दिक्कत और विषाक्तता जैसी समस्यायें आमतौर पर पाई जाती हैं।

भूजल व पर्यावरणीय :

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अस्थमा से पीड़ित लोगों पर कुछ खास प्रतिक्रिया होती है जबकि मस्तिष्क, स्तन, प्रोस्टेट व कोलन कैंसर, अल्जाईमर, गर्भपात, बांझपन और पार्किंसंस आदि का खतरा गंभीर स्तर तक रहता है। हां पायरेथ्रिन, पाइरेथ्राइडए आर्गेमेंफास्फेट और कार्बोमाट आदि रसायनिक कीटनाशक मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर हानिकारक गैसों की तरह असर करते हैं। इससे तंत्रिका संकेतों का संचरण बाधित होता है। नतीजतन सीने व मांसपेशियों में दर्द, सांस लेने में ज्यादा परेशानी और कोमा की स्थिति आ सकती है और मृत्यु भी हो सकती है। तंत्रिका तंत्र में विषमता के चलते अक्सर समूची दुनिया में लाखों लोग प्रभावित होते हैं। बंगलुरू स्थित आंतरिक स्वास्थ्य स्टार्टअप माइक्रोबायोटेक्स के नवीनतम अध्ययन के मुताबिक भारत में आबादी के 78 फीसदी शहरी लोग तीन या तीन से ज्यादा कीटनाशकों के अवशेषों के संपर्क में पाये गये हैं, जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रहे हैं। अध्ययन में विषाक्त पदार्थों के व्यापक संपर्क का खुलासा हुआ है जो दैनिक खाद्य उपभोग, प्लास्टिक के उपयोग, भूजल व पर्यावरणीय प्रदूषण के जरिये शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। इसके अलावा 54 फीसदी नमूनों में एंटीबायोटिक्स की मौजूदगी पाई गई है।

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चिंतनीय और खतरनाक संकेत :

अध्ययन के मुताबिक 39 फीसदी लोग स्टेराइड के संपर्क में पाये गये जो एंडोक्राइन व्यवधान और कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं। 38 फीसदी लोग फारएवर कैमिकल्स के टैस्ट में पॉजिटिव पाये गये। अध्ययन का निष्कर्ष है कि विषाक्त पदार्थों का व्यापक संपर्क दैनिक खाद्य उपभोग, प्लास्टिक के उपयोग, भूजल और पर्यावरणीय प्रदूषण के माध्यम से शरीर से हो रहा है मायक्रोबायोटेक्स द्वारा नयी विषाक्तता पहचान क्षमता के तहत नौ भारतीय राज्यों और 14 शहरों में शहरी आबादी के नमूनों का विश्लेषण करने पर खुलासा हुआ है कि कीटनाशकों, एंटीबायोटिक्स, स्टेराइड ग्रोथ रेग्युलेटरी और फारएवर केमिकल्स के प्रति महत्वपूर्ण संपर्क है जो 200 से अधिक भारतीयों के रक्त के नमूनों पर आधारित है। यह अध्ययन इस बात का प्रमाण है कि प्राणी मात्र के शरीर में कीटनाशक किस तरह जहर घोल रहे हैं। इनके अवशेष मानव शरीर में फलों एवं सब्जियों के जरिये प्रवेश करते हैं और स्नायु तंत्र को प्रभावित करते हैं। यही नहीं कीटनाशकों का अत्याधिक प्रयोग पानी के स्रोत और मिट्टी के प्रदूषित होने में अहम भूमिका निबाहता है। नतीजतन पारिस्थितिक तंत्र को भारी नुकसान होता है। इसके चलते मित्र कीट, मधुमक्खियों और पक्षियों खासकर गौरय्या की तादाद में खासी कमी आ रही है। यह बेहद चिंतनीय और खतरनाक संकेत है। इसलिए जरूरी है कि कीटनाशकों का छिड़काव करते समय मास्क, दस्ताने और सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक कपड़े पहनें। फलों और सब्जियों का इस्तेमाल करने से पहले उनको अच्छी तरह धो लें। इसके अलावा जैविक खेती और प्राकृतिक कीट नियंत्रण के तरीकों का इस्तेमाल करना ही श्रेयस्कर है। इसके बाद भी यदि आपको ऐसा लगता है कि आप कीटनाशक विषाक्तता के शिकार हुये हैं तो ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

-ज्ञानेन्द्र रावत
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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