केरलम चुनाव में कम अंतर वाली सीटों पर बिगड़ सकता है गेम
समीकरणों में गड़बड़ी होना तय
केरलम विधानसभा चुनाव अपने अंतिम दौर में है और वोटिंग में चंद दिन ही बचे हैं, सियासी दलों ने अपनी अपनी जीत के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है।
केरलम विधानसभा चुनाव अपने अंतिम दौर में है और वोटिंग में चंद दिन ही बचे हैं, सियासी दलों ने अपनी अपनी जीत के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है, लेकिन ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की चल रही जंग का सियासी असर केरलम चुनाव वोटिंग पर पड़ सकता है, इसके चलते कई सीटों में सियासी उल्टफेर हो सकता है, क्योंकि मलयाली के लोग बड़ी संख्या में गल्फ में रहते हैं और जंग के चलते इस बार मतदान करने नहीं आ पा रहे हैं। दुबई, कतर, सउदी अरब, बहरीन सहित सभी खाड़ी देशों में बड़ी तादाद में मलयाली लोग हेल्थ और सर्विस सेक्टर में काम करते हैं, आम तौर पर मलयाली वोटर चुनाव के दौरान केरल आकर मतदान करते हैं, ईरान के साथ चल रही जंग के कारण फिलहाल फ्लाइट के मंहगे टिकट और जॉब पर गहराते संकट के चलते गल्फ में रहने वाले मलियाली वोटरों का इस बार आना मुश्किल है।
केरलम की सभी 140 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल को मतदान है और नतीजे 4 मई को आएंगे, गल्फ देशों में रह रहे मलयाली वोटर्स अमेरिका ईरान युद्ध के कारण यात्रा करने से परहेज ही कर रहे हैं, इसके विधानसभा चुनाव के वोटिंग में हिस्सा लेने की कम संभावना है, जिससे राज्य की कम अंतर से हार जीत वाली सीटों का गेम बदल सकता है।
केरलम की 50 सीटों पर :
केरलम के तकरीबन 22 लाख लोग गल्फ के अलग अलग देशों में नौकरी या कारोबार के लिए रहते हैं, जो केरल के मालाबार इलाके वाली सीटों पर सियासी प्रभाव रखते हैं, कन्नूर से पलक्कड़ तक फैली 50 विधानसभा सीटों पर प्रवासी वोटर्स हमेशा महत्वपूर्ण रोल अदा करते रहे हैं, पिछले कई चुनावों में देखने को मिला है कि अधिकांश एनआरआई वोटिंग के समय आते हैं और अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं, इनके वोटिंग पैटर्न से कई नेताओं की किस्मत बुलंद होती है तो कई का गेम बिगड़ जाता है, गल्फ में रहने वाले ज्यादातर लोग इस बार मतदान के लिए देश नहीं लौटेंगे, इसका सीधा असर वोटिंग पर पड़ने के साथ साथ सीटों के गणित को भी प्रभावित करेगा, केरल की 140 सीटों में से 50 सीटों पर सियासी गेम खराब होने से सत्ता का पूरा समीकरण बदल सकता है।
कम मार्जिन वाली सीटें :
गल्फ में रहने वाले मलयाली वोटर अगर मतदान के लिए नहीं आते हैं, तो सीधा असर कम मार्जिन वाली सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकती है, 2021 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर जीत और हार का फैसला बेहद कम अंतर से हुआ, पेरिनथलमान्ना में जीत हार का अंतर 38 वोट का था तो कुट्टियाडी में 333 वोटों की मार्जिन रही, तनूर, त्रिथला और पलक्कड़ निर्वाचन क्षेत्रों में बहुमत 5,000 से कम था।
कम अंतर वाली विधानसभा सीटों पर मतदान करने आने वाले प्रवासी मतदाताओं के न आने से राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को निराश कर रही है, पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान सांसद शफी परम्बिल सहित अन्य सांसदों द्वारा विदेशों में किए गए प्रचार अभियान बेहद रोचक रहा था, इस बार प्रमुख नेताओं द्वारा वोट मांगने के लिए खाड़ी देशों का दौरा करने की तस्वीर देखने को नहीं मिल रही हैं।
जीत हार का मार्जिन :
केरलम में हमेशा से ही 76 फीसदी मतदान होता रहा है, इस कारण जीत हार का मार्जिन भी बड़ा होता रहा है,उत्तरी केरल में मार्जिन वैसे भी दक्षिण के मुकाबले ज्यादा होती है, हालांकि खाड़ी देशों से आने वाले प्रवासियों का अपना आधार है, जिससे वोटों का अंतर ही कम होगा, कुत्तियाडी सीट पर करीब 16,000 मतदाता हैं, जहां पर पिछली बार जीत का अंतर सिर्फ 333 वोट था, नडापुरम में 12,000 के करीब मतदाता रजिस्टर्ड है, इस सीट पर पिछली बार जीत का अंतर 3,385 वोट ही था, ऐसे ही पय्योली से मेप्पयूर तक कई ऐसे इलाके हैं, जहां पर 40 प्रतिशत एनआरआई मतदाता हैं, अझिकोडे,कुथुपरंबा, कोयिलांडी, कन्नूर, तलिपरंबा, मलप्पुरम, त्रिशूर इत्यादि शामिल है।
जंग के चलते चुनाव पर असर :
युद्ध के कारण हवाई सफर में आई बाधा ने चुनाव प्रचार को भी प्रभावित किया, हालांकि, इस बार खाड़ी देशों में घर घर जाकर प्रचार किया जा रहा है और ऑनलाइन बैठकें आयोजित की जा रही हैं, साथ ही प्रवासी भारतीयों की अपने देश में मतदान करने की इच्छा का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। केएमसीसी और चार्टर्ड उड़ानें हर साल, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की सहयोगी संस्था केरल मुस्लिम कल्चरल सेंटर विभिन्न खाड़ी देशों और अमीरात के प्रवासी मतदाताओं के लिए निर्वाचन क्षेत्र समितियों के तत्वावधान में विशेष उड़ानें आयोजित करती है, इस संस्था के मिडिल ईस्ट में 7 लाख से अधिक सदस्य हैं, चुनाव नजदीक आने पर, निर्वाचन क्षेत्र समितियां खाड़ी देशों में प्रचार अभियान और जनसभाएं आयोजित करती हैं।
समीकरणों में गड़बड़ी होना तय :
युद्ध के चलते गल्फ से भारत आने वाली फ्लाइट के टिकट काफी महंगे हो गए हैं,एक हजार से अधिक उड़ानों के रद्द होने के कारण मलयालियों के लिए 9 अप्रैल के चुनावों के लिए घर लौटना मुश्किल हो गया है।
फ्लाइट के टिकट की कीमत सामान्य कीमत से चार गुना बढ़ जाना भी एक झटका है, हालांकि,स्कूल की छुट्टियां होने के कारण कई प्रवासी परिवार इस समय देश में हैं, उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इससे यूडीएफ के वोटों में आई कमी को पूरा करने में मदद मिलेगी। भारत में ई वोटिंग प्रणाली नहीं है, जबकि फिलीपींस जैसे देश विदेश से मतदान की अनुमति देते हैं। यूएई में हजारों प्रवासी स्थानीय युद्ध की स्थिति और हवाई सेवाओं की अनुपलब्धता के कारण अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करने में असमर्थ हैं, इस बात की चिंता जताई जा रही है कि आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी मतदान के बाद वापस लौट पाएंगे या नहीं। केरलम की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले प्रवासी समुदाय के सामने आने वाले ऐसे संकट आगामी विधानसभा चुनावों के नतीजों में बड़ा बदलाव ला सकते हैं, प्रवासियों की अनुपस्थिति से राजनीतिक समीकरणों में भारी गड़बड़ी होना तय है, खासकर मालाबार क्षेत्र में, जहां हर वोट महत्वपूर्ण है।

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