एमएसएमई को समय पर मिले भुगतान
फैसला श्रमिकों के हित में एक सकारात्मक कदम
हाल ही में लेबर कोड में यह निर्णय दिया गया है कि कर्मचारियों को समय पर वेतन देना प्रत्येक नियोक्ता की अनिवार्य जिम्मेदारी है।
हाल ही में लेबर कोड में यह निर्णय दिया गया है कि कर्मचारियों को समय पर वेतन देना प्रत्येक नियोक्ता की अनिवार्य जिम्मेदारी है। यह फैसला श्रमिकों के हित में एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है, विशेषकर एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) क्षेत्र के संदर्भ में। वर्तमान स्थिति यह है कि वर्ष 2024 में सरकारों और निजी कंपनियों द्वारा एमएसएमई का लगभग 7.34 लाख करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। ऐसी परिस्थितियों में एमएसएमई को कर्मचारियों का वेतन समय पर देने के लिए बैंकों से ऋण लेना पड़ेगा, जिस पर उन्हें अतिरिक्त ब्याज भी चुकाना होगा। यह एक विडंबनापूर्ण स्थिति है कि जिन उद्यमों की मेहनत और पूंजी पहले से ही बाजार में फंसी हुई है, उन्हें उसी धन के लिए बैंक को ब्याज देना पड़ेगा, जबकि यह भी सुनिश्चित नहीं होता कि बकाया राशि उन्हें समय पर या पूरी मिलेगी भी। एमएसएमई देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। ये न केवल बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध कराती हैं, बल्कि क्षेत्रीय और समान विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि एमएसएमई आर्थिक रूप से कमजोर होंगी, तो देश की समग्र आर्थिक मजबूती और सामाजिक संतुलन भी प्रभावित होगा और देश में समान और सतत विकास संभव नहीं है।
आज बकाया भुगतान, विलंबित भुगतान और चेक बाउंस जैसी समस्याएं एमएसएमई के लिए आम हो चुकी हैं। इन मामलों में कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया अत्यंत धीमी और जटिल होती है, जिससे उद्यमों का कैश फ्लो बुरी तरह प्रभावित होता है। इसका सीधा असर कर्मचारियों के वेतन, उत्पादन और व्यवसाय की स्थिरता पर पड़ता है।
अत: यह अत्यंत आवश्यक है कि सरकार एक मजबूत, पारदर्शी और समयबद्ध पेमेंट इकोसिस्टम विकसित करे, जिससे एमएसएमई को तय समयसीमा के भीतर भुगतान सुनिश्चित हो सके। जब एमएसएमई को समय पर उनका पैसा मिलेगा, तभी कर्मचारियों को समय पर वेतन देने के लिए उन्हें बार-बार बैंक ऋण लेने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
-नरेन्द्र चौधरी
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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