लापता बच्चों की बढ़ती संख्या एक सामाजिक संकट

जागरूकता को भी मजबूत करना

लापता बच्चों की बढ़ती संख्या एक सामाजिक संकट

बच्चों के लापता होने की घटनाएं अब केवल आपराधिक आंकड़ों की चर्चा नहीं रह गई हैं, बल्कि यह उस सामाजिक संकट का संकेत बन चुकी हैं जो विकास, असमानता और अपराध के त्रिकोण से पैदा हो रहा है।

बच्चों के लापता होने की घटनाएं अब केवल आपराधिक आंकड़ों की चर्चा नहीं रह गई हैं, बल्कि यह उस सामाजिक संकट का संकेत बन चुकी हैं जो विकास, असमानता और अपराध के त्रिकोण से पैदा हो रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच देश में 33,577 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 7,777 अब तक नहीं मिल पाए हैं। उपलब्ध सरकारी सूचनाओं के अनुसार 2020 के बाद से लगभग 3 लाख बच्चे भारत में लापता हुए, जिनमें से करीब 36,000 बच्चों का अब तक कोई पता नहीं चल सका है। यह स्थिति बताती है कि भारत में बच्चों के लापता होने की समस्या आकस्मिक नहीं बल्कि संरचनात्मक है। बच्चों का गायब होना अक्सर मानव तस्करी, बाल श्रम, यौन शोषण, अवैध गोद लेने और संगठित अपराध से जुड़ा होता है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से देशभर के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह पता लगाने को कहा है कि क्या इसके पीछे संगठित आपराधिक नेटवर्क काम कर रहे हैं।

राज्यवार आंकड़ों का विश्लेषण :

यदि राज्यवार आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि बच्चों के लापता होने की समस्या कुछ क्षेत्रों में अधिक केंद्रित है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में 19,145 बच्चों के लापता होने का आंकड़ा इस संकट की गंभीरता को स्पष्ट करता है, जबकि मध्यप्रदेश में भी हजारों बच्चे हर वर्ष लापता होते हैं। इन आंकड़ों को समझने के लिए केवल पुलिस या प्रशासनिक अक्षमता को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की भौगोलिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की निकटता और मानव तस्करी के सक्रिय मार्ग इस समस्या को जटिल बनाते हैं। कई मामलों में बच्चों को रोजगार, शिक्षा या बेहतर जीवन का लालच देकर शहरों में ले जाया जाता है और बाद में उन्हें घरेलू काम, कारखानों या यौन शोषण के नेटवर्क में धकेल दिया जाता है।

विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार :

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विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार भारत में लाखों बच्चे आज भी बाल श्रम और शोषण के जाल में फंसे हुए हैं और हजारों को हर वर्ष इन परिस्थितियों से बचाया जाता है। उदाहरण के लिए 2024-25 के दौरान विभिन्न अभियानों में 44,902 बच्चों को शोषण और बाल श्रम से मुक्त कराया गया। इससे स्पष्ट है कि बच्चों के लापता होने की घटनाएं अक्सर एक बड़े अपराध नेटवर्क से जुड़ी होती हैं। दूसरी ओर कई मामलों में किशोर बच्चे स्वयं घर छोड़कर चले जाते हैं। पुलिस के अनुसार 12 से 18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लापता होने के अधिकांश मामलों में पारिवारिक विवाद, प्रेम संबंध या सामाजिक दबाव जैसे कारण भी पाए जाते हैं। इसलिए यह समस्या केवल अपराध या अपहरण का परिणाम नहीं है, बल्कि समाज में बढ़ते तनाव, पारिवारिक विघटन और किशोर मनोविज्ञान की अनदेखी का भी परिणाम है।

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बच्चों को निशाना बनाते हैं :

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लापता बच्चों में लड़कियों की संख्या कई राज्यों में अधिक पाई जाती है। कई अध्ययन बताते हैं कि कुछ क्षेत्रों में लापता बच्चों में 60 से 70 प्रतिशत तक लड़कियां होती हैं, जो लैंगिक असमानता और यौन शोषण के खतरे की ओर संकेत करता है। इसका संबंध केवल अपराध से नहीं बल्कि सामाजिक संरचना से भी है। भारत के कई हिस्सों में लड़कियों की शिक्षा, सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर अभी भी अनेक सामाजिक बाधाएं मौजूद हैं। कई बार बाल विवाह, घरेलू हिंसा या परिवार के भीतर के दबाव से बचने के लिए भी किशोरियां घर छोड़ देती हैं। वहीं दूसरी ओर अपराधी गिरोह विशेष रूप से गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के बच्चों को निशाना बनाते हैं। उदाहरण के लिए कई राज्यों से लड़कियों को झूठे रोजगार के वादे के साथ महानगरों में लाया जाता है और बाद में उन्हें घरेलू काम या अन्य शोषणकारी परिस्थितियों में फंसा दिया जाता है।

जागरूकता को भी मजबूत करना :

कई मामलों में अवैध गोद लेने और शिशु तस्करी के नेटवर्क भी सामने आए हैं, यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि बच्चों के लापता होने की समस्या केवल पुलिस कार्यवाही से समाप्त नहीं हो सकती। इसके लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र और सामुदायिक जागरूकता को भी मजबूत करना होगा। भारत में बच्चों के लापता होने की समस्या का समाधान तभी संभव है जब इसे व्यापक सामाजिक और नीतिगत दृष्टिकोण से देखा जाए। सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा की कमी बच्चों को सबसे अधिक असुरक्षित बनाती है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत डेटा प्रणाली, बेहतर जांच तंत्र और सीमा पार निगरानी की आवश्यकता है। इसके साथ समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। परिवारों में संवाद की कमी, बच्चों पर बढ़ता मानसिक दबाव और डिजिटल दुनिया के प्रभाव ने किशोरों की समस्याओं को और जटिल बना दिया है। अंततः यह समझना होगा कि किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चों पर निर्भर करता है। यदि हजारों बच्चे हर वर्ष बिना किसी सुराग के गायब हो रहे हैंए तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक चेतना की भी परीक्षा है। इसलिए बच्चों की सुरक्षा को कानूनए नीति और समाज . तीनों स्तरों पर सर्वोच्च प्राथमिकता देना ही इस समस्या का वास्तविक समाधान हो सकता है।

-देवेन्द्रराज सुथार
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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