स्थानीय निकायों में प्रशासक व्यवस्था से प्रभावित हुए आमजन के कार्य, फ्री होल्ड पट्टे के प्रकरण अटके
सैकड़ों फ्री होल्ड आवेदन लंबित हो गए
नगर परिषद और नगर पालिकाओं में निर्वाचित बोर्ड न होने के कारण निर्णय प्रक्रिया धीमी हो गई है, जिसका सीधा असर नागरिक सुविधाओं और प्रशासनिक सेवाओं पर पड़ रहा है।
जयपुर। प्रदेश के ढाई सौ से अधिक स्थानीय निकायों में निर्वाचित बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासक नियुक्त किए जाने से आमजन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होने लगे हैं। नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं में निर्वाचित बोर्ड न होने के कारण निर्णय प्रक्रिया धीमी हो गई है, जिसका सीधा असर नागरिक सुविधाओं और प्रशासनिक सेवाओं पर पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या फ्री होल्ड पट्टों के आवेदनों को लेकर सामने आई है। अब तक इन आवेदनों पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों—महापौर, सभापति और पालिका अध्यक्ष—के हस्ताक्षर से आदेश जारी होते थे, लेकिन प्रशासक व्यवस्था लागू होने के बाद यह प्रक्रिया बाधित हो गई और सैकड़ों फ्री होल्ड आवेदन लंबित हो गए।
इससे नागरिकों को न केवल आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, बल्कि संपत्ति से जुड़े कानूनी कार्य भी अटक गए हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए स्वायत्त शासन विभाग ने हस्तक्षेप करते हुए नई व्यवस्था लागू की है। विभाग ने आदेश जारी कर फ्री होल्ड पट्टों के आवेदनों पर हस्ताक्षर करने की जिम्मेदारी प्रशासकों के बजाय नगरीय निकायों के आयुक्तों और अधिशासी अधिकारियों को सौंप दी है। विभाग का मानना है कि वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को यह दायित्व देने से निर्णय प्रक्रिया तेज होगी और लंबे समय से लंबित प्रकरणों का त्वरित समाधान संभव हो सकेगा। सरकार का तर्क है कि आयुक्त और अधिशासी अधिकारी तकनीकी व प्रशासनिक रूप से सक्षम होते हैं, जिससे पारदर्शिता और कार्यकुशलता बनी रहेगी। इस निर्णय से आमजन को राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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