किताबी शिकंजे में फंसा हमारा आर्ट एंड कल्चर

दुनिया डिजिटल पर और हम कागज पर : उच्च शिक्षा विभाग के दोहरे रवैये से पिछड़ रहा युवा

किताबी शिकंजे में फंसा हमारा आर्ट एंड कल्चर

कहने को सरकारी संस्थाओं में आर्ट एंड कल्चर का पाठ पढ़ाया जा रहा है लेकिन प्रैक्टिकली उन्हें वह नहीं सिखाया जा रहा जिसकी देश विदेश में मांग है।

कोटा। संगीत रूहानियत का अहसास कराती है वहीं, कला का तिलस्माई आईना कारीगरी की अनूठी शैली बयां करता है। पहाड़ों पर खड़े महल, दुर्ग, चट्टानों से अड़िग किले अदभुत वास्तु कला की कहानी कहते हैं।  राजसी वैभव और प्राचीन संस्कृति की खूबसूरत चित्रकला विश्व में ख्यात रहा है।  दुनिया भर को देश-प्रदेश की पहचान कराता हमारा आर्ट एंड कल्चर आज उपेक्षा का शिकार हो रहा है। एक तरफ देश ए आई के बेहतर इस्तेमाल में जुटा है,  डिजीटलाइजेशन की और तेजी से भाग रहा है। वहीं कोटा का हमारा आर्ट और कल्चर टेक्नोलॉजी के युग में भी किताबी ज्ञान से आजाद नहीं हो सका है। कमर्शियल आर्ट, फाइन आर्ट, इंटीरियर डिजाइनिंग, वास्तु, निर्माण, संगीत,चित्रकला, फर्नीचर कला, अब भी डिजीटलाइजेशन की तरफ नहीं बढ़ सकी है।  शिक्षाविदों का मानना है, उच्च शिक्षा विभाग के दोहरे रवैये से युवा कला में पिछड़ रहा है। कहने को सरकारी संस्थाओं में आर्ट एंड कल्चर का पाठ पढ़ाया जा रहा है लेकिन प्रैक्टिकली उन्हें वह नहीं सिखाया जा रहा जिसकी देश विदेश में मांग है।  

कोटा में नहीं सिखाया जाता फाइन आर्ट
फाइन आर्ट को हिन्दी में ललित कला कहा जाता है। यह विभिन्न कला का एक समूह है, जिसमें चित्रकारी, फोटोग्राफी, प्रिंट मेकिंग, मूर्तिकला, विजुअल कम्यूनिकेशन, एनिमेशन, फिल्म स्टडी, क्रिएटिव राइटिंग, प्लास्टिक आर्ट सहित अन्य कलाएं शामिल होती हैं। इनडंस्ट्री आॅल राउंडर आर्टिस्ट को हायर करती है, इसलिए फाइन आर्ट महत्वपूर्ण कोर्स है लेकिन यह कोर्स कोटा संभाग में कहीं भी संचालित नहीं होता। क्योंकि, इसके लिए लैब, लेटेस्ट एक्यूपमेंट व शिक्षकों की आवश्यकता होती है। फाइन आर्ट पूरी तरह डिजीटिलाइजेशन मोड पर संचालित होता है। 

किताबों में कैद फैशन डिजाइनिंग
नाम न छापने की शर्त पर छात्राओं ने बताया कि कॉलेजों में फैशन डिजाइनिंग पाठयक्रम तो खोल दिए लेकिन लैब विकसित नहीं की। आलम यह है, कि कई कॉलेजों में फैशन डिजाइनिंग केवल किताबों में ही पढ़ाई जा रही है, जबकि अन्य बड़े शहरों में  सॉफ्टवेयर की मदद से फैशन को टेक्नोलॉजी का रूप दिया जा रहा है। छात्राओं को बाजार की आवश्यकता, डिजाइन सेंस, कलर कॉम्बीनेशन, कोटा डोरिया, कपड़ा मेटेरियल, ब्लॉक प्रिटिंग व स्किन प्रिटिंग की समझ प्रेक्टिकली रूप से विकसित की जा रही है। वहीं, कॉलेजों में छात्राएं फैशन डिजाइनिंग का कोर्स तो कर लेतीं हैं लेकिन यहां प्रोडक्शन हाउस, एक्सपोर्ट हाउस नहीं है। इसके अलावा ऐसा मार्केट भी नहीं है,जहां छात्राओं को जॉब मिल सके। ऐसे में उन्हें रोजगार के लिए बाहर की ओर रुख करना पड़ता है लेकिन कई छात्राएं बाहर नहीं जा पाती। इस वजह से वे टेलरिंग को ही आजीविका के रूप में चुनना पड़ता है।  

हारमोनियम, सितार और तबले खराब पड़े 
जेडीबी कॉलेज की संगीत स्टूडेंट शिवानी दुबे का कहना है, यहां बीए और एमए में संगीत सिखाया जाता है। लेकिन, छात्राओं को यह तक पता नहीं की उनकी आवाज कैसी है। कॉलेज में साउंड फू्रफ स्टूडियों तो छोड़िए रिकॉर्डिंग सिस्टम तक नहीं है। खुले कक्ष में ही रियाज करना पड़ता है, स्वर में कहां गलती हो रही, वे कैसा गा रहे, इसका अंदाजा तक नहीं लग पाता। ऐसे में गलतियां कैसे सुधरेगी। संगीत की दुनिया में तेजी से टेक्नोलॉजी का विस्तार हुआ। एडवांस इक्यूपमेंट आ चुके हैं लेकिन आज भी हम माइक से आगे नहीं बढ़ पाए। हालात यह हैं, कॉलेज में हारमोनियम, सितार और तबले खराब पड़े हैं। महाविद्यालय में बीए-एमए को मिलाकर 150 से 200 छात्राएं है लेकिन सुविधाओं के अभाव में आधे से भी कम स्टूडेंटस ही आते हैं। 

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पैन टेबलेट की जगह मेन्यूअल हो रही स्केचिंग 
सरकारी कॉलेजों में बरसों से चित्रकला व स्केचिंग आर्ट मेन्यूअली ही सिखाई जा रही है, जबकि, वक्त के साथ पेंटिग्स व स्केचिंग डिजिटलाइजेशन में तब्दील हो चुकी है। कॉलेजों में कागज या कैनवास पर ही चित्र उकेरे जा रहे। जिसमें समय व मेहनत अधिक लगने के बावजूद क्रिएटीविटी नहीं बढ़ रही। जबकि, इंडस्ट्री में 1998 में से ही पैन टेबलेट इंटरोडयूज हो चुका था और 2005 से तेजी से इसका उपयोग होने लगा। पैन टेबलेट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस पर आर्टिस्ट अपनी कल्पनाओं को साकार करने के साथ रचनात्मक वर्कफलो को बढ़ा सकता है। पैन टेबलेट डिजिटल पेंटिंग्स में संशोधन, शेयरिंग, क्रिएटीविटी, समय की बचत, स्टोरेज, ग्लोबलाइजेशन सहित अनेक सुविधा देता है। डिजिटल प्लेटफॉम के जरिए आर्टिस्ट दुनिया के सामने अपनी मेहनत, क्रिएटीविटी को प्रेजेंट करता है, जिससे उन्हें नाम-शौहरत के साथ रोजगार भी मिलता है। क्योंकि, इस प्लेटफॉर्म में पेंटिंग्स बेचने व खरीदने का मार्केट विकसित हो चुका है। 

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एक कमाण्ड से कपड़ा बनकर तैयार
फैशन ग्लैमर की दुनिया है, जो वक्त के साथ डिजीटिलाइजेशन हो चुकी है। दिल्ली, मुंबई, इंदौर सहित देश की कई मेट्रो सिटीज में कम्प्यूटरराइज ऐसी मशीनें हैं, जिसमें एक कमांड देने पर मशीन आॅटोमेटिक कपड़ा तैयार कर देती है। उदारहण के तौर पर एक कमांड के इशारे पर एक से एक हजार शर्ट बनकर तैयार हो जाती है। कपड़े का कोटेशन जैसे कॉटन, लाईलॉन, फ्रेब्रिक सहित अन्य मेटेरियल एक्यूरेसी के साथ डिजाइन में अहम भूमिका निभाता है। कोटा में कल्चर व सोसाइटी के कारण फैशन दबा हुआ है। 
- पूजा राजवंशी, फैशन डिजाइनर   

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साउंड पू्रफ स्टूडियों की जरूरत 
संगीत की दुनिया तेजी से डिजिटलाइजेशन की ओर बढ़ रही है। वक्त के साथ कॉलेज शिक्षा में भी बदलाव होने चाहिए। साउंड थ्यौरी को सॉफटवेयर पर लाने की जरूरत है। कॉलेज में साउंड पू्रफ स्टूडियों, रिकॉर्डिंग व ट्रैक सिस्टम होने चाहिए ताकि स्टूडेंटस आवाज रिकॉर्ड करें तो गलतियों का पता लगे और सुधार हो सके। हर स्वर का मिजाज व साउंड अलग-अलग होता है। माइक पर गीत कैसे गाए जाए, ट्रैक्स कैसे बनते हैं, रिकॉर्डिंग कैसे होती है, यह सिखाने के लिए साउंट पू्रफ रिकॉर्डिंग स्टूडियों का होना जरूरी है।  
- डॉ. रोशन भारती, म्यूजिक प्रोफेसर जेडीबी कॉलेज 

रोजगार से जोड़ता डिजीटल 
पेंटिग्स, स्केचिंग सहित आर्ट के विभिन्न पहलु डिजीटिलाइजेशन का रूप ले चुके हैं। डिजीटल प्लेटफॉर्म न केवल आर्टिस्ट को असीमित कैनवास देता है बल्कि रोजगार से भी जोड़ता है। सरकारी संस्थाओं में आज भी पेंटिंग्स व स्केचिंग मेन्यूअली कैनवास पर ही बनाए जा रहे हैं, जबकि ग्लोबलाइजेशन के दौर में यह डिजीटल हो चुके है। पैन टेबलेट, आर्टिस्ट को कई बाधाओं से दूर कर दुनिया से जोड़ता है। अब तो डिजिटल ब्रश भी चलन में हैं। पेन टैब पॉकिट साइज होता है, कहीं भी बैठकर पेंटिंग्स बनाई जा सकती है।  
- हरमीत सिंह, निदेशक, मैक एनीमेशन अकेडमी कोटा

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