हाड़ौती के खिलाड़ियों का राज्य में औसत प्रदर्शन, बच्चों का खेलों में नहीं रूझान

प्रशिक्षकों ने जताई चिंता: महारत दिलाने वालों ने कहा कम उम्र के बच्चों को ग्राउंड पर लाने का हो प्रयास

हाड़ौती के खिलाड़ियों का राज्य में औसत प्रदर्शन, बच्चों का खेलों में नहीं रूझान

कुछ खेलों में खिलाड़ी काफी अच्छा कर रहे हैं लेकिन औसत प्रदर्शन काफी निम्न है। इसका एक सबसे महत्वपूर्ण कारण बच्चों का खेलों के प्रति कम रूझान होना और आगे बढ़ने के लिए शोर्टकट का प्रयोग करना है।

कोटा। हाड़ौती के कई खिलाड़ियों ने कई खेलों में राष्टÑीय और अन्तरराष्टÑीय स्तर पर अपनी पहचान बनाकर शहर और स्वयं का नाम भले ही रोशन किया है, अपना एक अलग मुकाम हासिल किया है लेकिन अभी क्षेत्र के बच्चों और उनके परिजनों का रूझान खेलों की ओर कम ही है। उसका कारण ये है कि आज हर माता-पिता अपने बच्चे को डॉक्टर और इंजीनियर बनाना चाहता है ना कि कोई बड़ा खिलाड़ी और दूसरा खिलाड़ियों को कोई सरकारी प्रोत्साहन और संसाधन नहीं मिलता है।  शायद यहीं कारण है कि हाड़ौती को कई खलों में पदक मिलने के बाद भी क्षेत्र के खिलाड़ियों का राज्य में औसत प्रदर्शन ही है। इसी को लेकर यहां के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने वालों ने चिंता जताई है।  इन प्रशिक्षकों का कहना है कि प्रदेश में हाड़ौती संभाग के खिलाड़ियों का औसत प्रदर्शन काफी चिंता का विषय है। कुछ खेलों में खिलाड़ी काफी अच्छा कर रहे हैं  लेकिन औसत प्रदर्शन काफी निम्न है। इसका एक सबसे महत्वपूर्ण कारण बच्चों का खेलों के प्रति कम रूझान होना और आगे बढ़ने के लिए शोर्टकट का प्रयोग करना है। इनका कहना है कि ये बात सही है कि सुविधाओं का भी अभाव है लेकिन इसी आधार पर खिलाड़ियों का प्रदर्शन निर्भर नहीं करता है।  प्रशिक्षक बताते हैं कि यदि सकारात्मक सोच के साथ नियमानुसार बच्चों को खेलो में उतारा जाए तो हाड़ौती भी अपने प्रदर्शन को उच्च स्तर तक कर सकता है। अच्छे प्रदर्शन के लिए बच्चों की आधारभूत गतिविधि और नेचुरल ग्रोथ पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। छोटे बच्चों को स्किल सिखाने के लिए ज्यादा से ज्यादा उनकी फिजिकल फिटनेस व मोटर डवलपमेंट पर ध्यान दे। फिटनेस के लिए निचले स्तर से ही कार्यक्रम शुरू किए जाए।  उन्होंने बताया कि बच्चों की फिटनेस के लिए माता-पिता या अभिभावकों को बच्चों के लिए उचित एवं पोष्टिक आहार की जानकारी होनी चाहिए। सरकार की ओर से छोटे बच्चों के लिए मैदान विकसित जाए, जहां पर उनके लिए नेचुरल ग्रोथ के लिए भी गतिविधि हो। इसी प्रकार सरकार की ओर से खेलों में छोटे बच्चों की सहभागिता बढ़ाने के लिए भी कार्यकम शुरू किए जाने चाहिए।  प्रशिक्षकों का कहना हैं कि 7 से 12 साल तक के बच्चों के लिए शिविर आयोजित किए जाए तथा उन शिविर में बच्चों के फिटनेस के सभी घटकों को बढ़ाने लिए एक्टिवीटी कराई जाएं। इसके अलावा क्लासिफाइड कोच व शारीरिक शिक्षक से ही ट्रेनिंग दिलवाई जाए। जिससे बच्चों के निचले स्तर के प्रदर्शन को सुधारा जा सकें। 

इनका कहना हैं
कम आयु वर्ग के बच्चों को ज्यादा से ज्यादा ग्राउंड पर लाना चाहिए और उनको उनकी रूचि से जुड़ी गतिविधियां करवाई जाए। मैदान में भी इस तरह के संसाधन उपलब्ध करवाए जाए। 
- राकेश शर्मा, राष्टÑीय पदक विजेता एवं सचिव जिला एथेलेटिक संघ, कोटा। 

हाड़ौती में छोटे बच्चों के लिए कोई खेल नीति नहीं है। इससे यहां कम उम्र में बच्चे तैयार नहीं हो पाते हैं। बच्चों पर पढ़ाई का इतना बोझ होता है कि वे खेल पर ध्यान ही नहीें दे पाते और ना ही उनके माता-पिता उनका ध्यान पढ़ाई से हटाकर खेल की ओर दिलवाते हैं। बच्चा अगर कम उम्र में गाउंड पर आए तो परिणाम बड़े आ सकते हैं लेकिन बड़ी उम्र में कोई अभ्यास के लिए आएगा तो बड़े परिणाम निकलना मुश्किल है। 
- अशोक गौतम, सचिव, जिला वुशू संघ।

माता-पिता 8 से 10 साल की उम्र में बच्चों को पूरा सहयोग करें। उनको ग्राउंड तक लाने का प्रास करें। उनकी डाइट का पूरा प्रबन्ध करे। क्योंकि नो फाइट विदाउट डाइट। मैंने स्वंय ने 8 साल की उम्र से खेलना प्रारम्भ किया था। नेशनल में 12 गोल्ड मैडल, एशिया लेवल पर 1 गोल्ड तथा 1 कांस्य तथा आॅल इंडिया रेल्वे के लिए 8 गोल्ड मैडल जीते है। 
- रविन्द्र कुमार, अन्तरराष्टÑीय खिलाड़ी, कुश्ती। 

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किसी भी खेल की पाठशाला कम उम्र से ही प्रारम्भ करवाई जानी चाहिए। छोटे बच्चों के लिए शिविर लगाए जाने चाहिए। उनको सिखाया जाना चाहिए। उनको से बताया जाना चाहिए कि किसने खेल में किस तरह से नाम कमाया है ताकि वो मोटिवेट हो सकें। जहां-जहां एसोसिएशन है वहां उनकी ओर से कैंप लगाया जाना चाहिए। 
- देवी सिंह,सचिव जिला बॉक्सिंग संघ। 

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कुछ खेलों में मैडल मिले है लेकिन अभी भी हम काफी पिछे हैं। व्यक् ितगत प्रतिस्पर्द्धा में बहुत कम मैडल आए है। जबकि खिलाड़ी की पहचान ही उसी से बनती है। स्कूलों के बच्चों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जितने खिलाड़ी होंगे उतनी ही प्रतिसपर्द्धा बढ़ेगी और बच्चे निकलकर सामने आएंगे। हाड़ौती के बच्चों को टूर्नामेंट और कोच की जरुरत हैं।
- गौरव सैन झाला, सचिव, जिला तीरंदाजी संघ। 

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पहले बच्चों को सुविधाएं नहीं मिलती थी लेकिन अब कुछ सुविधाएं मिलने लगी है लेकिन अभी भी कई चीजों की दरकार है। बच्चों को मोटिवेशन करने की जरुरत है। उनको स्कूली स्तर पर खेलों के बारे में बताया, समझाया जाना चाहिए। 
- चचंल कुंथल, खिलाड़ी।

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