अफगान संकट

अफगान संकट

भारत द्वारा बुधवार को आयोजित दो दिवसीय तीसरी क्षेत्रीय सुरक्षा बैठक में ईरान व रूस सहित पांच एशियन गणराज्य देशों के सुरक्षा सलाहकारों ने भाग लिया।

भारत द्वारा बुधवार को आयोजित दो दिवसीय तीसरी क्षेत्रीय सुरक्षा बैठक में ईरान व रूस सहित पांच एशियन गणराज्य देशों के सुरक्षा सलाहकारों ने भाग लिया। चीन और पाकिस्तान को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन दोनों देशों ने बैठक में भाग नहीं लिया। यह बैठक भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से बड़ी उपलब्धि ही मानी जाएगी। भारत, ईरान, रूस के अलावा कजाखस्तान, किरगिस्तान, ताजिकस्तान, तुर्केमिस्तान और उजबेकिस्तान के सुरक्षा प्रमुखों को एक मंच पर लाने में सफल रहा। चीन और पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गए और यह प्रमाणित भी हो गया कि दोनों देश तालिबानी आतंकवाद के हिमायती हैं। चीन के साथ-साथ अमेरिका भी अफगानिस्तान के मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं। मगर ये हालात लंबे समय तक नहीं बने रहेंगे। क्योंकि तालिबान अन्तत: आतंकवाद की परिभाषा को ही अपना ईमान मानते लगते हैं। लेकिन भारत ने एशियाई देशों के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक बुलाकर साफ कर दिया है कि वह अफगानिस्तान जैसे संकटग्र्रस्त देश को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास करेगा। अब तक माना जा रहा था कि अफगानिस्तान के मुद्दे पर भारत निर्णायक पहल करने से बच रहा है और ‘देखो व इंतजार करो’ की नीति पर चल रहा है। इससे लगा था कि अफगानिस्तान को लेकर भारत कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है। लेकिन अब इतने मुल्कों ने भारत के आग्र्रह को स्वीकार कर अफगानिस्तान के मुद्दे पर संयुक्त रूप से चर्चा की। दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा बैठक में यह चिंता उभर कर आई कि अफगानिस्तान की जमीन से चलने वाली आतंकी गतिविधियां, कट्टरतावाद और नशीले पदार्थों की तस्करी से कैसे निपटा जाए। इस बैठक के बाद सभी देशों ने जारी घोषणा पत्र में सामूहिक स्वर में आतंकवाद के खतरे से निपटने के लिए एकजुट होकर काम करने पर सहमति जताई। ये सभी देश समझते हैं कि अफगानिस्तान की चुनौतियों का सामना नहीं किया तो क्षेत्रीय शांति खतरे में पड़ जाएगी। अफगानिस्तान के मानवीय संकट को समझते हुए कोई भी देश तालिबान से टकराव नहीं चाहता, बल्कि उसकी मदद करना चाहते हैं और यही दिल्ली सुरक्षा बैठक का मुख्य उद्देश्य भी है। भारत लंबे समय से अफगानिस्तान के विकास में बड़ा भागीदार रहा है और उसने अरबों रुपए का निवेश कर वहां बड़े-बड़े निर्माण के काम किए हैं। क्षेत्रीय देशों की चिंताओं को तालिबानी सरकार को भी समझना चाहिए और दुनिया की मुख्य धारा के साथ जुड़कर अफगानिस्तान को नया सभ्य स्वरूप देना चाहिए।

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