जानें राज-काज में क्या है खास

जानें राज-काज में क्या है खास

राजकाज में जाने वो सच्चाई जो ना देखी, ना सुनी

मगर हम चुप नहीं रहेंगे
सूबे में बड़बोले मंत्रियों का कोई सानी नहीं है। एक-दूसरे का पछाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वे न रात देखते हैं और न ही दिन, न स्थान देखते और न ही माहौल। वे कब क्या मुंह खोल दे, ऊपर वाला भी नहीं जानता। अब देखो ना, अलवर वाले एक नेताजी को प्रमोशन से राज में रत्न का तमगा मिलते है, उन्हीं के जिले वाले दूसरे भाई साहब ने उनकी तुलना चोर और खजाने की चाबी से कर दी। झुंझुनूं वाले भाई साहब तो अलवर वाले से एक कदम आगे निकले और सड़कों की तुलना हेमा और कैटरिना के गालों से कर दी। राज का काज करने वाले में चर्चा है कि जोधपुर वाले अशोक जी भाई साहब बड़बोलों को नसीहत देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते, मगर भाई लोग हैं कि मानते ही नहीं, और तो और कुछ न कुछ बोल कर मैसेज दे देते है कि मगर हम चुप नहीं रहेंगे।


नजरें मेवाड़ की ओर
सूबे में इन दिनों भगवा वाले कुछ भाई लोगों की नजरें मेवाड़ की तरफ टिकी हुई हैं। टिके भी क्यों नहीं राज की दो बार कुर्सी संभाल चुकी मैडम का मेवाड़ की धरा पर पगफेरा जो हुआ है। मैडम के पगफेरे के बाद कई भाई लोगों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ गया। उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। भारती भवन वाले भाई साहब भी चिंतन-मंथन में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स में खुसरफुसर है कि अपनी कुर्सी को बचाने के फेर में छोटा भाई और मोटा भाई को रिपोर्ट कार्ड चाहे कुछ भी भेजे, मगर सौ फीसदी सत्य है कि आने वाले राज को लेकर कमल वाली पार्टी के वर्कर्स को वसुंधराजी से कई उम्मीदें हैं।


याद बीते दिनों की
आजकल खाकी वालों पर शनि की दशा है। कभी चौराहे पर तो कभी गली में पिट रहे हैं। और तो और चूड़ियों वाली तक हाथ पैर चला जाती है। बेचारे खाकी वाले भी क्या करे, उनको अपने ऊपर वालों पर भरोसा नहीं है, कब इंक्वायरी बिठा दे। सो पिटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। करे भी तो क्या पुलिस का इकबाल जो खत्म हो गया। अब टाइगर और लॉयन तक दहाड़ मारना भूल गए। पीटर और गामाज के बारे में सोचना तो बेईमानी होगी। विक्टर की मजबूरी जगजाहिर है। उनके काम में खलल की किसी में दम नजर नहीं आ रहा। अब तो खाकी वाले भाई लोग ऊपर वालों से प्रार्थना कर रहे हैं कि कोई उनके बीते दिन लौटा दे ताकि खाकी का इकबाल कायम रहे।

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अनचेलेंज नेता
सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले के दफ्तर में अनचेलेंज नेता को लेकर जोरदार बहस छिड़ी हुई है। बहस भी खुद के नेता की बजाय हाथ वाले अशोक जी भाई साहब को लेकर है। कई सालों से भगवा धारण किए भाई साहब भी कहने लग गए कि सामने वालों में तो जोधपुर वाले भाई साहब ही अनचेलेंज नेता है। चेलेंज करने वाले छोटे पायलट साहब तो अब कबड्डी के ग्राउण्ड में कइयों को आउट करने में लग गए। और बाकी बचे लोगों से खुद की ही नहीं सिमट पा रही।


सपने हुए चूर
लक्ष्मणगढ़ वाले भाई साहब का भी कोई सानी नहीं है। अब केवल पीसीसी चीफ की कुर्सी का बोझ आने के बाद आए बदलाव को पुराने साथी भी नहीं समझ पा रहे हैं। गुजरे जमाने में एक झाड़ी के बेर खाने वाले सखा को उनसे काफी आशा थी। दो चार बार मंशा भी जाहिर की, मगर गोविन्दजी की बात सुनकर सारे सपने चूर हो गए। मास्टरों को संभाल चुके भाई साहब ने धीरे से कान में कह दिया कि आठ नंबर वालों से भी बात कर लेना। गोविन्ददेवजी के हमनाम साहब के इस अचूक बाण से कइयों की गलतफहमी भी दूर हो गई।


एक जुमला यह भी
सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में इन दिनों भगवा वाले भाई लोगों को कोई काम नहीं सूझ रहा। गुजरे जमाने में चर्चा, चिंतन और बैठकों में बिजी रहने वाले भाई लोग भी पौने तीन साल से ठालै बैठे हैं। पूछने पर सच्ची बात उनकी जुबान पर आए बिना नहीं रहती। बेचारे भोले मन से बोल देते है कि जब हमारा काम खुद सामने वाले ही कर रहे हैं, तो हम खामख्वाह पसीने क्यों बहाएं। अभी तो हम यह ढूंढने में पसीना बहा रहे हैं कि हम खुद कितने खेमों में बिखरे पड़े हैं।

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         एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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