यह मेरा इंडिया, इसलिए टूटती है सड़के....

देश में मजबूत सड़कों पर भारी सरकारी व्यवस्था

यह मेरा इंडिया, इसलिए टूटती है सड़के....

कोटा समेत देश के किसी भी राज्य के शहरी क्षेत्र में जाने पर वहां बहुत कम सड़कें ऐसी मिलेंगी जो ठीक हों।

कोटा। देश का कोई भी बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा शहर हो। वहां सड़कों का जाल तो बिछा दिया लेकिन हालत यह है कि सरकारी व्यवस्था ऐसी बनी है कि सड़कें न तो लम्बे समय तक चल पा रही हैं और न ही मजबूत बन रही है। जिससे हर साल सड़कों पर करोड़ों-अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी देश की सड़कें सुरक्षित नहीं है। यह हालात तब है जब भारत में भी ऐसी तकनीक है जिसके आधार पर सड़क निर्माण हो तो  25 साल तक टूटे ही नहीं।  विश्व में सिंगापुर स्पेन,मलेशिया जर्मनी ऐसे देश है जहां सड़कें सबसे मजबूत व टिकाऊ हैं। कोटा समेत देश के किसी भी राज्य के शहरी क्षेत्र में जाने पर वहां बहुत कम सड़कें ऐसी मिलेंगी जो ठीक हों। एक दो साल में ही सड़कें बिखर जाती हैं। फिर चाहे वह शहरी सड़क हो या हाइवे की। इससे दुर्घटनाओं का खतरा बना हुआ है। सड़क टूटने और फिर बनने का आखिर क्या है। नवज्योति ने जब इस मामले को देखा तो पूरा खेल सामने आ गया। पढ़िये विशेष रिपोर्ट हर साल बन रही सड़कें फिर भी टूटी हुई: देश के अधिकतर शहरों में हर साल सड़कें बनाई जा रही हैं। कोटा में भी पहले जहां सार्वजनिक निर्माण विभाग शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक की सडकें बनाता था। वहीं अब शहरी क्षेत्र में यह काम नगर विकास न्यास कर रहा है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय व राज्य मार्ग की सड़कें स्टेट हाइवे व एनएचआई करवा रहा है। कोटा समेत अधिकतम शहरों में हर साल सड़कें बनाई जा रही हैं। लेकिन उसके बाद भी सड़कों की हालत उतनी बेहतर नहीं है । 

देश में 5 से 10 साल सड़कों की लाइफ
सड़क बनाने वाले विभागों का कहना है कि भारत में सड़कों की लाइफ 5 से 10 साल ही आंकी जाती है। डामर की सड़क 5 साल और सीसी रोड 10 साल के हिसाब से बनाई जा रही है। उसके बाद  सड़कें सुरक्षित  रहना बहुत मुश्किल है। जबकि डामर ही सड़कें भारत में तो हर साल बरसात में खराब हो रही है। सीसी रोड भी एक बार खोदने पर खराब हो रही हैं। 

25 साल तक रह सकती हैं सड़कें
केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने गत दिनों एक साक्षात्कार में कहा था कि देश में ऐसी तकनीक है जिससे कम से कम 25 साल के लिए सड़कें बनाई जा सकती हैं। लेकिन अधिकारी और संवेदक नहीं बनने देना चाहते। पेचवर्क व मरम्मत के नााम पर और ओएण्डएम के नाम पर करोड़ों-अरबों का खेल होने से सड़कें बार-बार खराब हो रही हैं। 

उच्चतम सड़क गुणवत्ता सूचकांक
देश                सड़कों की गुणवत्ता रैंक     वैश्विक रैंक    
सिंगापुर                    6.5                      1
नीदरलैंड                    6.4                     2
स्विजरलैंड                 6.3                      3
हागकॉंग                    6.1                      4
जापान                      6.1                      5
भारत                        4.5                     46

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विभागों में समन्वय का अभाव
कोटा जैसे शहर में आए दिन सड़कें टूटने का कारण विभागों में समन्वय का अभाव है। बिजली के तार, केबल, गैस पाइप लाइन और सीवरेज व नाली निर्माण समेत कई ऐसे काम हैं जो सड़क बनने से पहले होने चाहिए। लेकिन इन कामों से संबंधित विभागों में समंवय का अभाव होने से सड़क बनने के बाद कभी केबल के नाम पर तो कभी गैस लाइन के नाम  पर सड़कों को बार-बार खोदा जा रहा है। सड़क पहले बनाई जाती है फिर तोड़ी जाती है। ऐसे में पब्लिक का पैसा जाया होता है जब कि बनाने वाले और स्वीकृति देने वाले अपना खेल करते रहते हैं। 
- रिटायर्ड़ इंजीनियर श्री कांत वषिष्ट 

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सड़क निर्माण यानी भ्रष्टाचार का खेल
कमीशन का खेल 
जिस तरह से शहरों में विकास हो रहा है और वाहनों की गति बढ़ रही है। उसमें मजबूत व सुरक्षित सड़कें होना आवश्यक है। लेकिन सड़कें बनाने में कमीशन का खेल अधिक है। सड़कें बनाने में 5 से 40 फीसदी राशि तो कमीशन में ही बंट जाती है। ऊपर से नीचे तक चलने वाले कमीशन से बची 60 फीसदी राशि से सड़कें बनती है। ऐसे में कम बजट में बनने वाली सड़कें न तो मजबूत होंगी और न ही टिकाऊ। सड़कें बनने के बाद विभागों में तालमेल का अभाव होने से बची हुई कसर बार-बार सड़कों को खोदकर पूृरी की जा रही है। जिससे 5 साल की सड़क 1 साल भी नहीं चल पाती। जबकि विदेशों में कमीशन का नहीं सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है। 
- प्रमोद शर्मा एडवोकेट्र

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संवेदकों के भरोसे बन रही सड़कें
कोटा शहर हो या देश का कोई भी प्रदेश अधिकतर जगहों पर सड़क निर्माण के ठेके होते हैं। ठेकेदार कम टेंडर में ठेके ले लेते हैं। सरकारी व्यवस्था में कम टेंडर वाले को ठेका देने का प्रावधान है। ऐसे में अधिकारी ठेका देने के बाद संवेदक के भरोसे ही सड़क निर्माण छोड़ देते हैं। सड़क बनने के बाद बिल पास करने से पहले एक बार देखकर औपचारिकता करते हैं। जबकि इंजीनियरों की मौजूदगी में सड़क निर्माण होना चाहिए। ऐसे में मैटेरियल की क्वालिटी व क्वांटिटी सही नहीं होने से भी सड़कें समय से पहले खराब हो रही हैं।
 - मोहित नागर, खेड़ली फाटक 

कम बजट की सड़कें और तकनीक की कमी
देश में अधिकतर डामर व सीसी रोड बनाए जा रहे हैं। डामर सड़क की लाइफ 5 साल व सीसी रोड की 10 साल मानी जाती है। देश में कम बजट की सड़कें बनाई जा रही हैं और वह भी कम से कम समय में पूरी करने का दबाव रहता है। जबकि जितनी अधिक बजट की सड़क होगी उतनी क्वालिटी की होगी। एक समय के बाद सड़कें खराब होती ही हैं। जबकि विदेशों में अधिक बजट की और हाई तकनीक से सड़कें बनाई जा रही हैं। वैसी तकनीक अभी देश के हर शहर में नहीं है।  
- सुनील गर्ग, संवेदक, पीडब्ल्यूडी

नियमित मेंटेनेंस की कमी
सड़कों की एक निर्धारित लाइफ होती है। उस  समय सीमा के बाद सड़क खराब होने लगती है। यदि समय-समय पर सड़कों की मेंटेंनेंस व कारपेट होती रहे तो 5 साल के लिए बनने वाली सड़क 10 साल तक और 10 साल के लिए बनने वाली सड़क 15 से 20 साल भी चल सकती है। सड़क निर्माण से पहले ड्रेनेज सिस्टम सही होना चाहिए। यदि उसमें कमी रह गई तो उससे डामर सड़क में पानी भरने पर वह जल्दी खत्म हो जाती है।   सरकार भी हर साल सड़क निर्माण व मरम्मत पर इसीलिए खर्चा करतीे है लेकिन वह मेंटेन नहीं होने से भी सड़कें समय से पहले खराब हो जाती हैं।  
- धीरेन्द्र माथुर, रिटायर्ड मुख्य अभियंता, सार्वजनिक निर्माण विभाग 

देश में जिस तकनीक से सड़कें बन रही हैं उसमें डामर की लाइफ 5 साल और सीसी रोड की दस साल आंकी जाती है। उसके बाद समय-समय पर उनकी मेंटनेंस जरूरी हो जाती है। मेंटेनेंस व कारपेट से सड़कों की लाइफ को अधिक किया जा सकता है। लेकिन कई बार सड़कें बनने के बाद किसी ने किसी विभाग द्वारा उन्हें खोदने से भी उनकी मजबूती समय से पहले ही खत्म हो जाती है।  जबकि विदेशों में इस तरह की समस्या नहीं होने से वहां हो सकता है अधिक समय तक सड़कें  मेंटेन रहती होंगी। गारंटी पीरियड में संवेदक की और उसके बाद विभाग की जिम्मेदारी हो जाती है। मौसम की मार भी सड़कों को समय से पहले खराब कर देती है। 
 - आर.के. सोनी, अधीक्षण अभियंतासार्वजनिक निर्माण विभाग 

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