मैं केरल हूं...पहले त्रावणकोर फिर केरल और अब केरलम की ओर: अब संसद के दोनों सदनों में पास होगा प्रस्ताव, इसके बाद राष्टÑपति की अंतिम मंजूरी से मिलेगा नया नाम
केरल अब हुआ 'केरलम': सांस्कृतिक गौरव की नई पहचान
प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने केरल का नाम बदलकर केरलम करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। 1956 में 'त्रावणकोर-कोचीन' से 'केरल' बना यह राज्य अब अपनी भाषाई और ऐतिहासिक जड़ों की ओर लौट रहा है। अनुच्छेद 3 के तहत विधानसभा और संसद की सहमति से यह बदलाव अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक बड़ा कदम है।
डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता केंद्रीय कैबिनेट ने मंगलवार को केरल का नाम बदलकर केरलम करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी राज्य का नाम बदला गया हो, साल 1956 से पहले केरल का नाम त्रावणकोर कोचीन था, जिसे बदलकर कर केरल कर दिया गया। केरल के नाम को बदलने का प्रस्ताव राज्य विधानसभा में 2024 में सर्वसम्मति से पारित होने के बाद आज मोदी कैबिनेट ने इस पर मुहर लगी दी है।
क्यों बदले जाते हैं नाम?
किसी भी राज्य का नाम यूं ही नहीं बदला जाता, इसके पीछे कई राजनीतिक और सांस्कृतिक कारण होते हैं। नामकरण में बहुधा संस्कृति एवं इतिहास के प्रेरक तत्व शामिल होते हैं। नाम महत्वपूर्ण है। नाम और रूप मिलकर परिचय बनते हैं। ऋग्वेद के ज्ञान सूक्त में कहा गया है कि, किसी पदार्थ का नाम रखकर परिचय करना ज्ञान की शुरूआत है। वास्तविक ज्ञान शब्द अर्थ के गर्भ में छिपा रहता है। ज्ञानी लोग तप बल से वाणी का अभिप्राय प्राप्त करते हैं। राज्यों और शहरों के नाम बदलने के पीछे सांस्कृतिक इतिहास भी होते हैं। केरलम के संबंध में भी यही स्थिति है। केरलम नाम से राज्य के वाम विचार वाले मुख्यमंत्री का लगाव दिखाई पड़ता है। नाम को लेकर भारत और सारी दुनिया में गहन आकर्षण है। भले ही शेक्सपियर ने कहा हो कि नाम में क्या रखा है, लेकिन सच्चाई यही है कि नाम से फर्क पड़ता है।
केरल का इतिहास
केरल का सर्वप्रथम अभिलेखीय उल्लेख तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के एक शिलालेख में पाया जाता है, जिसमें इसे चेरास (केरलपुत्र) के रूप में वर्णित किया गया है। यह शिलालेख सम्राट अशोक ने बनवाया था। अशोक के समय में दक्षिण भारत के चार स्वतंत्र राज्यों में से एक के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। आठवीं शताब्दी में आदि शंकाराचार्य का जन्म मध्य केरल के कालडी में हुआ था। उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में यात्रा की और अद्वैत वेदांत के व्यापक और प्रभावशाली सिद्धांत की रचना की।
1498 में पुर्तगाली यात्री वास्को डी गामा ने अफ्रीका के केप आॅफ गुड होप के चारे ओर नाव से यात्रा कर कोझिकोड़ के लिए एक समुद्री मार्ग खोज लिया। उनकी नौसेना ने यहां पुर्तगाली किले और छोटी बस्तियां भी बनाई, जिसके बाद से भारत में यूरोपीय प्रभाव की शुरूआत हुई। केरल में डट, फ्रांसीसी और ब्रिटिश यूरोपीय व्यापारिक हित प्रमुखता से उभरे।
1741 में, डचों ने त्रावणकोर के राजा मातंर्डा वर्मा ने पराजित किया। इस हार के बाद, डच सैन्य कमांडरों को मातंर्डा वर्मा ने बंधक बना लिया और उन्हें त्रावणकोर की सेना को आधुनिक यूरोपीय हथियारों का प्रशिक्षण देने के लिए बाध्य किया। 18वीं शताब्दी के अंत तक, केरल पर अधिकांश प्रभाव अंग्रेजों का था।
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो त्रावणकोर ने शुरू में ही खुद को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की मांग की, हालांकि, त्रावणकोर के तत्कालीन राजा चिरिथा थिरुनल बलराम वर्मा ने कई दौर की बातचीत के बाद त्रावणकोर को भारत में शामिल करने के एक समझौता किया और शांतिपूर्वक भारत में शामिल कर लिया गया।
केरल राज्य का गठन 1956 में पूर्व त्रावणकोर-कोचीन राज्य, मालाबार जिले और मद्रास राज्य के दक्षिण कनारा जिले के कासरगोड तालुक से हुआ था। इसे मलयालम में केरलम कहा जाता है। केरल के नाम को केरलम करने पर आज केंद्रीय कैबिनेट ने राज्य सरकार के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है।
राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया
भारत में किसी राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 3 और 4 के तहत होती है, जिसमें राज्य विधानसभा और संसद दोनों की मंजूरी आवश्यक है। सबसे पहले, राज्य सरकार विधानसभा में प्रस्ताव पास करती है, फिर केंद्र सरकार की अनुमति से संसद में नाम बदलने का विधेयक साधारण बहुमत से पारित किया जाता है और राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी मिलती है।
नाम बदलने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया
राज्य प्रस्ताव : संबंधित राज्य की विधानसभा में नाम बदलने का प्रस्ताव पेश किया जाता है और इसे बहुमत से पारित किया जाता है।
केंद्र सरकार की मंजूरी : राज्य का प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजा जाता है, जो अन्य एजेंसियों से एनओसी लेकर प्रस्ताव की समीक्षा करता है।
राष्ट्रपति की सिफारिश : यदि केंद्र सरकार सहमत है, तो वह राष्ट्रपति के पास प्रस्ताव भेजती है, जो इसे विचार के लिए विधानसभा को भेज सकते हैं।
संसद में विधेयक : संसद में संविधान के अनुच्छेद 3 और 4 के तहत नाम बदलने का विधेयक पेश किया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में साधारण बहुमत से पारित होना अनिवार्य है।
राष्ट्रपति के हस्ताक्षर : संसद से पास होने के बाद, विधेयक को अंतिम मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जिसके हस्ताक्षर के बाद राज्य का नाम आधिकारिक रूप से बदल जाता है। इसके बाद, केंद्र और राज्य सरकार के दस्तावेजों, मानचित्रों, और विभागों (डाक, रेलवे) में नया नाम अपडेट किया जाता है।

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