कांग्रेस का हमला: ग्रेट निकोबार परियोजना में पर्यावरण, आदिवासी अधिकार और पारदर्शिता नदारद, इन विषयों पर जवाब देने में वह विफल रही सरकार

कांग्रेस ने पर्यावरण और अधिकारों पर उठाए सवाल

कांग्रेस का हमला: ग्रेट निकोबार परियोजना में पर्यावरण, आदिवासी अधिकार और पारदर्शिता नदारद, इन विषयों पर जवाब देने में वह विफल रही सरकार

जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार विकास परियोजना को पारिस्थितिक आपदा करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने लेदरबैक कछुओं के आवास, आदिवासी अधिकारों और पारदर्शिता को दरकिनार किया है। राहुल गांधी की यात्रा के बाद, कांग्रेस ने पेड़ों की कटाई और पर्यावरणीय मंजूरी में हितों के टकराव पर सरकार से जवाब मांगा है।

नई दिल्ली। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना में मोदी सरकार ने पर्यावरण, आदिवासियों के अधिकार, वित्तीय व्यवहार्यता और पारदर्शिता को पूरी तरह नजरअंदाज किया है और इन चिंताओं का जवाब देने में वह विफल रही है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने रविवार को सोशल मीडिया एक्स पर एक बयान में कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की गत 28 अप्रैल की ग्रेट निकोबार यात्रा से सरकार विचलित हुई है, इसलिए उसने एक मई को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ध्यान भटकाने की कोशिश की है। सरकार संभावित पर्यावरणीय संकट से ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है।

जयराम रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप पारिस्थितिकी दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और विशिष्ट क्षेत्र है। वहां गत पांच वर्षों में पक्षियों, सांपों, गिको (छिपकली) और केकड़ों सहित लगभग 50 नयी प्रजातियां खोजी गई हैं। गैलाथिया खाड़ी, जहां बंदरगाह प्रस्तावित है, तटीय विनियमन क्षेत्र-1-ए में आती है और यह लेदरबैक कछुओं का प्रमुख प्रजनन स्थल है। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया में भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं पर दबाव डाला गया और बाद में इन्हीं को परियोजना से जुड़े कार्य सौंपे गए, जिससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि पेड़ों की कटाई के आंकड़ों को लेकर सरकार के अलग-अलग दावे सामने आए हैं और अब तक इसमें स्पष्टता नहीं है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर भिन्न आंकड़े दिए जाने से स्थिति संदिग्ध हो जाती है। उन्होंने प्रतिपूरक वनीकरण के प्रस्ताव को पर्यावरणीय दृष्टि से अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि निकोबार जैसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्र की भरपाई भिन्न भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षारोपण से नहीं की जा सकती और यह पर्यावरणीय सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि गैलाथिया खाड़ी को पहले वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था, लेकिन बाद में परियोजना के लिए इसे अधिसूचना से हटाकर इसकी श्रेणी बदली गई।

आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि निकोबारी समुदाय ने परियोजना को लेकर चिंता जताई है और शोंपेन जैसे संवेदनशील समुदाय की सहमति की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों की प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की गई। परियोजना की वित्तीय व्यवहार्यता पर सवाल उठाते हुए श्री रमेश ने कहा कि प्रस्तावित हवाई अड्डे और परियोजना के अन्य दावे अव्यावहारिक प्रतीत होते हैं और इससे जुड़े कई व्यावहारिक प्रश्न अनुत्तरित हैं। उन्होंने पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि परियोजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और सूचना के अधिकार के तहत भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसे परियोजना से जोड़ना उचित नहीं है और इस पर संसद में व्यापक चर्चा होनी चाहिए।

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