ह्यूमिड हीटवेव सेहत के लिए बेहद खतरनाक, कुछ ही घंटों में हो सकता है हीटस्ट्रोक : अध्यन्न

साइलेंट किलर: केरल के तटीय इलाकों के लिए 'ह्यूमिड हीटवेव' की चेतावनी

ह्यूमिड हीटवेव सेहत के लिए बेहद खतरनाक, कुछ ही घंटों में हो सकता है हीटस्ट्रोक : अध्यन्न

वैज्ञानिकों ने केरल के तटीय क्षेत्रों में ह्यूमिड हीटवेव (उमस भरी लू) को लेकर अलर्ट जारी किया है। अध्ययन के अनुसार, मानसून के दौरान बारिश रुकने पर गर्मी और नमी का जानलेवा मेल हीटस्ट्रोक का कारण बन सकता है। पसीना न सूखने से शरीर ठंडा नहीं हो पाता, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

तिरुवनंतपुरम। केरल के तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए वैज्ञानिकों ने एक जरूरी चेतावनी जारी की है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, मानसून के दौरान जब बारिश रुकती है, तो उस समय पड़ने वाली उमस भरी गर्मी (ह्यूमिड हीटवेव) सेहत के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है। ब्रिटेन की 'यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग' के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में की गयी एक रिसर्च में बताया गया है कि तटीय क्षेत्रों में अब केवल बढ़ता तापमान ही बड़ी बात नहीं है, बल्कि गर्मी और नमी का जो मेल बन रहा है, वह शरीर के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

आम तौर पर चलने वाली लू के मुकाबले यह उमस वाली गर्मी इसलिए ज्यादा घातक है क्योंकि हवा में नमी अधिक होने की वजह से शरीर का पसीना नहीं सूख पाता। जब पसीना नहीं सूखता, तो शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता। ऐसे में तापमान बहुत ज्यादा न होने पर भी इंसान को कुछ ही घंटों में हीटस्ट्रोक हो सकता है या दिल पर दबाव बढ़ सकता है। अध्ययन के मुख्य लेखक डॉ. अक्षय देवरस ने बताया कि केरल के तटीय जिले अंदरूनी इलाकों के मुकाबले इस खतरे की चपेट में ज्यादा हैं। खासकर जब मानसून के दौरान बारिश का दौर थमता है, तब यह जोखिम और भी बढ़ जाता है।

इस खतरे को मापने के लिए वैज्ञानिकों ने 'वेट-बल्ब' तापमान का इस्तेमाल किया है। यह एक ऐसा पैमाना है जो बताता है कि गर्मी और नमी का स्तर कब इतना बढ़ गया है कि पसीना निकलना भी बेकार हो जाए और इंसान की जान जोखिम में पड़ जाए। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अध्ययन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ऐसी उमस वाली गर्मी का पता करीब एक महीना पहले ही लगाया जा सकता है। अगर प्रशासन को इसकी जानकारी समय पर मिल जाए, तो वह बचाव के इंतजाम कर सकता है।

इस समय का उपयोग अस्पतालों में तैयारी करने, आम लोगों के लिए 'कूलिंग सेंटर' बनाने, स्कूलों के समय में बदलाव करने और बिजली की सप्लाई बेहतर करने के लिए किया जा सकता है। यह पूरी रिपोर्ट 1940 से 2023 तक के यानी पिछले 84 सालों के मौसम और बारिश के आंकड़ों को परखने के बाद तैयार की गई है। वैज्ञानिकों ने मानसून के आने और रुकने के सैकड़ों चरणों का बारीकी से विश्लेषण किया है। इस खास शोध में 'यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स', 'यूके मेट ऑफिस' और भारत के 'उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान' ने भी हाथ बटाया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में लोग लू के बारे में तो जानते हैं, लेकिन इस उमस भरी गर्मी को गंभीरता से नहीं लेते। जबकि यह कहीं ज्यादा जानलेवा हो सकती है। इसलिए इसके प्रति लोगों को जागरूक करना और सही सरकारी नीतियां बनाना बहुत जरूरी है।

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