जयराम रमेश का इस्लामाबाद एमओयू को लेकर केंद्र पर प्रहार, बोले- यह सरकार की विदेश नीति के लिए गंभीर झटका

सरकार अब भी इजराइल की नीतियों के समर्थन में खड़ी

जयराम रमेश का इस्लामाबाद एमओयू को लेकर केंद्र पर प्रहार, बोले- यह सरकार की विदेश नीति के लिए गंभीर झटका
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने अमेरिका–ईरान 14-सूत्रीय इस्लामाबाद एमओयू को मोदी सरकार की विदेश नीति के लिए बड़ा झटका बताया। उन्होंने कहा कि इससे पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका मजबूत हुई है और भारत की रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है। रमेश ने इजरायल और अमेरिका की नीतियों पर भी सवाल उठाते हुए सरकार पर तुष्टिकरण और कूटनीतिक विफलता का आरोप लगाया।

नई दिल्ली। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14-सूत्रीय इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (एमओयू) को लेकर केंद्र सरकार की विदेश नीति पर प्रहार करते हुए कहा है कि यह केन्द्र सरकार के लिये एक बड़ा झटका है। उन्होंने कहा कि इस समझौते को इस्लामाबाद एमओयू कहा जाना पाकिस्तान की बढ़ती क्षेत्रीय और वैश्विक भूमिका को दर्शाता है और यह केन्द्र सरकार की विदेश नीति के लिए गंभीर झटका है। रमेश ने कहा कि वर्ष 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग कर दिया था, लेकिन अब पाकिस्तान पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है, जिसके भारत के लिए गंभीर निहितार्थ हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि यह एमओयू अपने शब्दों और भावना के अनुरूप लागू होता है, तो यह एक महत्वपूर्ण प्रगति होगी, हालांकि इसके मेमोरेंडम ऑफ मिसअंडरस्टैंडिंग में बदलने की भी आशंका बनी हुई है। उनके अनुसार, अगले 60 दिन इस समझौते की सफलता के लिहाज से बेहद अहम होंगे। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि इस समझौते से ईरान को कई महत्वपूर्ण और अप्रत्याशित लाभ मिले हैं और उसने अपने प्रतिरोध एवं दृढ़ता का परिचय दिया है। उन्होंने कहा कि खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों ने सावधानी के साथ इस समझौते का स्वागत किया है, लेकिन वे अपने रणनीतिक संबंधों की भी समीक्षा कर सकते हैं।

रमेश ने इसे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कूटनीतिक हार बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार अब भी इजराइल की नीतियों के समर्थन में खड़ी हैं। उन्होंने कहा कि इजरायल के प्रति सरकार का यह रुख भारत के हितों के लिए महंगा साबित हो रहा है। उन्होंने अमेरिका की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ शुरू किये गये सैन्य अभियान अपने घोषित उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सके हैं। इसके साथ ही उन्होंने सरकार पर अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रति तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार की विदेश नीति की आलोचना की।

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