पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन: लोककला जगत ने खोया अमूल्य नक्षत्र, पंडवानी गायन को दिलाई वैश्विक पहचान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने व्यक्त किया गहरा शोक

पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन: लोककला जगत ने खोया अमूल्य नक्षत्र, पंडवानी गायन को दिलाई वैश्विक पहचान
छत्तीसगढ़ की विश्वप्रसिद्ध पंडवानी लोकगायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रायपुर एम्स में निधन हो गया। महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करने वाली 70 वर्षीय तीजन बाई ने तड़के अंतिम सांस ली। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे कला जगत की अपूरणीय क्षति बताया है।

रायपुर। देश की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वह 72 वर्ष की थीं और लंबे समय से अस्वस्थ चल रही थीं। उन्होंने रविवार सुबह लगभग 3:15 बजे अंतिम सांस ली। प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने एम्स अस्पताल पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन कर आज सुबह श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस अवसर पर मंत्रिमंडल के कई सदस्य भी उपस्थित रहे। सभी ने दिवंगत लोककलाकार को श्रद्धांजलि देने के साथ उनके परिजनों से भेंट कर शोक संवेदना व्यक्त की।

गौरतलब है कि डॉ. तीजन बाई ने पंडवानी गायन की परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाते हुए छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई। महाभारत की कथाओं को अपनी सशक्त वाणी, प्रभावशाली अभिनय और विशिष्ट प्रस्तुति शैली के माध्यम से उन्होंने जीवंत बनाया। उनकी प्रस्तुतियों ने भारत के अलावा एशिया, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों के दर्शकों को प्रभावित किया तथा छत्तीसगढ़ की लोककला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठा दिलाई।

भारतीय लोककला में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण तथा 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कला शिरोमणि सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डी.लिट. (डॉक्टरेट) की उपाधि से भी अलंकृत किया था। डॉ. तीजन बाई के निधन को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और भारतीय लोककला के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उन्होंने अपनी साधना और अद्वितीय कला के बल पर पंडवानी को गांव की चौपाल से विश्व मंच तक पहुंचाकर लोक परंपरा को नई पहचान दिलाई। उनके निधन से लोककला जगत ने अपना एक अमूल्य नक्षत्र खो दिया है।

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