जानें राज काज में क्या है खास
चर्चा में फिर से ऑड एण्ड ईवन
भगवा वाले भाई लोगों का भी कोई सानी नहीं। जब मन में आए तभी हर किसी को उपमा देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उस समय वे न आगा सोचते हैं और न पीछा।
अब उपमा पुजारी और भगवान की :
भगवा वाले भाई लोगों का भी कोई सानी नहीं। जब मन में आए तभी हर किसी को उपमा देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उस समय वे न आगा सोचते हैं और न पीछा। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर दायीं तरफ बने कमरे में बैठने वाले भाई लोग सिर्फ उपमा देने का ही काम करते हैं। उनको ट्रेनिंग भी इसी बात की है। अब देखो न गुजरे जमाने में दोनों गुजरातियों की जोड़ी मोटा भाई और छोटा भाई बताकर फेमस किया था तो अब दोनों का पुजारी और भगवान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। ठिकाने पर आने वाले हर किसी को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि अमित भाई ऐसे पुजारी हैं, जो साम, दाम, दण्ड और भेद से नमोजी को भगवान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। गांधीजी की बराबरी के लिए रही सही कसर श्री राम की कृपा से आने वाले तीन साल में पूरी कर देंगे।
चर्चा में फिर से ऑड एण्ड ईवन :
गुजरे जमाने में लालकिले की नगरी में काले कोट और खाकी वाले भाई लोगों ने एक-दूसरे पर भाटे बरसाए थे, तब मफलर वाले केजरीवाल भाई साहब का एक फार्मूला काफी चर्चा में आया था। इन दिनों इस फार्मूले की चर्चा पिंकसिटी में न्याय के सबसे बड़े मंदिर के साथ ही पीएचक्यू में भी जोरों पर है। चर्चा भी क्यों न हो खुद को भगवान के बराबर मानने वाले सफेद कोट वाले भाई साहब ने सलाह ही ऐसी दे डाली। सूबे के सबसे बड़े अस्पताल में बाउंसर लगाने के बाद तीनों रंगों के कोट वाले कढ़ी के साथ कचोरी का जायका ले रहे थे, तभी बड़े डॉक्टर ने सलाह दी कि गुलाबीनगरी में तो खाकी और काले कोट वालों पर ऑड और ईवन का सिस्टम लागू कर देना चाहिए, ताकि हमें मेडिकल रिपोर्ट बनाने में ज्यादा माथा नहीं लगाना पड़े। एक दिन खाकी वाले भाई लोग कुटेंगे, तो दूसरे दिन काले कोट वाले भाई।
तरीका-ए-मैसेज :
इन दिनों राज के एक रत्न का बात करने का तरीका काफी फैमस हो रहा है। राज का काज करने वालों के साथ पार्टी के वर्कर भी अब उन्हें मैसेज वाले मंत्रीजी के नाम से जानने लगे है। षेखावाटी की माटी में जन्मे राज के यह रत्न खो-खो के बड़े शौकीन और मालधडी से मारने में माहिर है। चर्चा है कि वे मोबाइल पर बात करने के बजाय सिर्फ टेक्स्ट मैसेज को ही तवज्जो देते हैं। अब बेचारे वो भी क्या करे, उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है। एक बार मोबाइल टेप के फेर में आकर बिना मतलब पसीने बहा चुके हैं। सो दूध का जला हुआ छाछ भी फूक-फूककर पीता है।
नेताजी उवाच :
नेताजी के मुंह से कब क्या निकल जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। भरोसा भी क्यों करें, वो नेता ही क्या जो उवाच नहीं करे, चाहे उसका अर्थ कुछ भी निकले। अर्थ निकालने वाले अपने हिसाब से निकालते रहे, उसका नेताजी पर कोई असर भी नहीं पड़ता। अब देखो ना राज के एक रत्न का एक दौरे में माडसाहबों को लेकर ऐसा उवाच निकला कि उनसे पिण्ड छुड़ाना मुश्किल हो गया। नेताजी को कतई उम्मीद नहीं थी कि उनके उवाच इतना असर दिखेगा कि गाड़ी में बैठकर भागने में ही भलाई समझी। और तो और दो सौ कोस से भी दिन रात सफाई देनी पड़ गई। अब बड़बोले नेताजी को कौन समझाए कि रतनगढ़ वाले भाभड़ा जी सीख लेते तो, यह दिन नहीं देखने पड़ते। बाबोसा के राज में नंबर दो की कुर्सी संभालने वाले हरि जी भाई साहब को तीस साल पहले अपने श्रीमुख से निकले शब्दों को कई सालों तक भुगतना पड़ा था।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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